आप अपनी बालकनी में क्या लगाते हैं? आंखों को सुकून देने वाला कोई पौधा। मनी प्लांट, कोई
हैंगिंग प्लांट, विंड चाइम या फिर कोई फेंग शुई। क्या आपने किसी को अपनी बालकनी
में किसी के लिए गाली या अपशब्द लिखकर टांगते हुए देखा है? गाली भी ऐसे व्यक्ति के लिए जो दबंग हो और पैसे वाला भी। वह
चाहे तो शारीरिक रूप से भी नुकसान पहुंचा सकता है। घर पर गुंडे भेज सकता है। फर्जी
मुकदमे में फंसा सकता है। ऐसा कुछ ना भी करे तो भी कई दूसरे तरीकों से जीना मुहाल
कर सकता है।
लेकिन कहते हैं ना मरता क्या नहीं करता। घर में बीमार कर देने वाले पानी की
सप्लाई हो, बिजली का कनेक्शन बार-बार काट दिया जाए और जनरेटर की महंगी बिजली
खरीदने के लिए मजबूर किया जाए तो आदमी क्या करे? कितने दिन चुप रहे? पिछले डेढ़ साल से बिल्डर से मिन्नतें करते-करते, हाथ जोड़ते-जोड़ते
जब वे थक गए तो गाजियाबाद के करीब 700 परिवारों ने अपनी बालकनी में यही लिखकर टांग
दिया कि उनका बिल्डर चोर, चीटर है, फ्रॉड है। इसी बात के पोस्टर उन्होंने अपनी
गाड़ियों में भी चिपका दिए। इससे उनकी बालकनी और कार की रौनक चली गई। उनके मकान की
कीमत घटने लगी। घर पर बिल्डर के गुंडे धमकने लगे। परिवार वालों को भी धमकियां मिलने
लगीं। बिल्डर के खिलाफ लोगों ने सड़क पर प्रदर्शन किया तो वहां भी गुंडे आ धमके और
टेंट उखाड़ दिया। लोगों ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के दरबार में हाजिरी
लगाई तो वहां अफसर ने बड़े प्यार से बात की। रेजीडेंट्स की तकलीफ सुनी। मदद का
भरोसा भी दिया। लेकिन उसी अफसर के मातहत जूनियर इंजीनियर मौके का मुआयना करने आए
तो उनके बोल बदल गए।
अब किसने क्या लिया, किसने क्या दिया- ये अलग बात है। लेकिन रेजीडेंट्स को कुछ
नहीं मिला। सरकारी 'सहयोग' से उत्साहित
बिल्डर ने मनमानी का दूसरा चैप्टर शुरू कर दिया है। सोसाइटी की जिस जमीन पर
हरियाली का वादा किया गया था, वहां गाड़ियों के लिए पार्किंग बनाई जा रही है। वैसे
दिखावे के लिए उस जमीन पर घास भी लगी हुई है। यानी हरियाली की हरियाली और पार्किंग
की पार्किंग। बिल्डर ने फ्लैट बेचते वक्त अपने ब्रोशर में जो नक्शा दिखाया था,
उसमें और असली सोसाइटी में आकाश-पाताल का नहीं, तो भी जमीन-आसमान का अंतर है। बिल्डर
का कहना है कि नक्शे में बदलाव किया गया है। लेकिन किसकी सहमति से? क्या प्राधिकरण की सहमति से? और खरीदारों की सहमति? क्या किसी से पूछा गया? बिल्डर की मनमानियों की जांच करने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या अकेले रेजीडेंट्स की? या फिर जिला प्रशासन, विकास प्राधिकरण, नगर निगम और सरकारी
इंजीनियरों की भी कोई जवाबदेही बनती है?
