मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

22-23 दिसंबर 1949 की रात ऐसे पहुंचे रामलला बाबरी मस्जिद के 'गर्भ-गृह' में

ichowk.in पर 22 दिसंबर 2017 को प्रकाशित लेख- 

उस सुबह पौ फटने के साथ ही यह बात जंगल में लगी आग की तरह फैल रही थी कि भगवान राम प्रकट हो गए हैं. भक्तगण भये प्रगट कृपालागाने लगे.

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी / हर्षित महतारी मुनि मनहारी अद्भुत रूप विचारी. अयोध्या और अयोध्या के लोगों के लिए गोस्वामी तुलसीदास की ये चौपाइयां नई नहीं हैं. अयोध्या के साढ़े आठ हजार छोटे-बड़े मंदिरों, मठों और आश्रमों में करीब चार सौ वर्षों से हर सुबह इन्हें गाया बजाया जाता है. लेकिन 23 दिसंबर 1949 की सुबह अयोध्या में इन चौपाइयों के एक अलग ही मायने थे. उस सुबह पौ फटने से पहले से ही यह बात जंगल में लगी आग की तरह फैल रही थी कि भगवान राम प्रकट हो गए हैं. रघुकुल कुलभूषण बाल रूप में जन्मभूमि स्थान मंदिर के गर्भ-गृह में पधार चुके हैं और भक्तगण भये प्रगट कृपालागा रहे हैं.
प्रकट हुए भगवान!
सुबह सात बजे के करीब जब अयोध्या थाने के एस.एच.ओ. रामदेव दुबे रुटीन जांच के दौरान वहां पहुंचे तब तक प्राकट्य-स्थल के पास सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी, जो दोपहर तक बढ़कर करीब 5000 तक पहुंच गई. अयोध्या के आसपास के गांवों में इसकी घोषणा कर दी गई थी. मंदिरों में शंख बजाए गए थे और श्रद्धालुओं की भीड़ बालरूप में प्रकट हुए कृपालु भगवान के दर्शन के लिए टूट पड़ी थी. पुलिस और प्रशासन भौंचक्का था.
राम का प्राकट्य किसी आम मंदिर में नहीं हुआ था. मर्यादा पुरुषोत्तम के बालरूप की मूर्ति उस मस्जिद में प्रकट हुई थी, जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था और जिसके बारे में यह कहानी आम थी कि इसे भगवान राम के प्राचीन मंदिर को तोड़कर बनाया गया था. रख-रखाव की कमी के चलते दिनोंदिन खंडहर में बदलती जा रही वह मस्जिद उन दिनों सिर्फ शुक्रवार को जुमे की नमाज के लिए खुलती थी. बाकी दिन उस ओर इक्का-दुक्का लोगों का ही आना-जाना होता था. उसी मस्जिद की दीवार के बाहरी हिस्से में 21 फुट गुना 17 फुट का एक चबूतरा था, जिसे राम चबूतरा के नाम से जाना जाता था. वहां राम के बालरूप की एक मूर्ति विराजमान थी, जिनके दर्शन के लिए तब उतने ही लोग जुटते थे जितने अयोध्या के किसी भी दूसरे मंदिर, मठ या आश्रम में जुटते थे. लेकिन रामलला के प्राकट्य ने सब कुछ बदल दिया. 


मूर्ति पुरानी, कहानी नई
23 दिसंबर 1949 की सुबह बाबरी मस्जिद के मुख्य गुंबद के ठीक नीचे वाले कमरे में वही मूर्ति प्रकट हुई थी, जो कई दशकों या सदियों से राम चबूतरे पर विराजमान थी और जिनके लिए वहीं की सीता रसोई या कौशल्या रसोई में भोग बनता था. राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़ा के नियंत्रण में थे और उसी अखाड़े के साधु-संन्यासी वहां पूजा-पाठ आदि विधान करते थे. पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने अपनी किताब 'अयोध्याः 6 दिसंबर 1992' में उस एफ.आई.आर. का ब्यौरा दिया है, जो 23 दिसंबर 1949 की सुबह लिखी गई थी। एस.एच.ओ. रामदेव दुबे ने भारतीय दंड संहिता की धारा 147/448/295 के तहत जो एफ.आई.आर. दर्ज की, उसमें लिखाः "रात में 50-60 लोग ताला तोड़कर और दीवार फांदकर मस्जिद में घुस गए और वहां उन्होंने श्री रामचंद्रजी की मूर्ति की स्थापना की. उन्होंने दीवार पर अंदर और बाहर गेरू और पीले रंग से 'सीताराम' आदि भी लिखा. उस समय ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल ने उन्हें ऐसा करने से मना किया लेकिन उन्होंने उसकी बात नहीं सुनी. वहां तैनात पी.ए.सी. को भी बुलाया गया, लेकिन उस समय तक वे मंदिर में प्रवेश कर चुके थे."
नायर का फैसला
बात अयोध्या की थी, लेकिन अयोध्या तक सीमित नहीं रही. यह लखनऊ पहुंची और फिर दिल्ली. सब ओर हड़कंप मच गया. दिल्ली में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पंडित जवाहर लाल नेहरू थे और गृह मंत्रालय लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास था. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत थे और गृह मंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री.
देश का संविधान तब लागू नहीं हुआ था. संविधान का धर्मनिरपेक्ष ढांचा भी खड़ा नहीं हुआ था. फिर भी देश चला रहे नेता किसी दुविधा में नहीं थे. देश और प्रदेश की सरकारों ने यह तय किया कि अयोध्या में जो हुआ, वह उचित नहीं हुआ. दोनों समुदायों की परस्पर सहमति से या अदालत के आदेश से विवाद का हल निकले, यह तो उचित है, लेकिन धोखे से किसी दूसरे समुदाय के पूजा-स्थल पर कब्जा कर लेना तब की सरकारों को ठीक नहीं लगा. दोनों ही सरकारों ने तय किया कि अयोध्या में पूर्व स्थिति बहाल की जाए.
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने फैजाबाद के जिलाधिकारी और उप-आयुक्त के.के.के. नायर को लिखित आदेश दिया कि अयोध्या में पूर्व स्थिति बहाल की जाए यानि रामलला की मूर्ति को मस्जिद से निकालकर फिर से राम चबूतरे पर रख दिया जाए. यह आदेश 23 दिसंबर 1949 को ही दोपहर ढाई बजे नायर तक पहुंचा दिया गया. मुख्य सचिव का आदेश था कि इसके लिए बल प्रयोग भी करना पड़े तो संकोच न किया जाए. लेकिन के.के.के. नायर ने सरकार का आदेश मानने से मना कर दिया.
नायर से हारी सरकार
के.के.के. नायर ने मुख्य सचिव भगवान सहाय को जो जवाब भेजा उसमें बताया कि 'रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह से निकालकर राम चबूतरे पर ले जाना संभव नहीं है. ऐसा करने से अयोध्या, फैजाबाद और आसपास के गांवों-कस्बों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. जिला प्रशासन के अधिकारियों, यहां तक कि पुलिस वालों की जान की गारंटी भी नहीं दी जा सकती. नायर ने सरकार को बताया कि अयोध्या में ऐसा पुजारी मिलना असंभव है जो विधिपूर्वक रामलला की मूर्तियों को गर्भ-गृह से हटाने को तैयार हो और इसके लिए अपने इहलोक के साथ-साथ परलोक को भी बिगाड़े. ऐसा करने से पुजारी का मोक्ष संकट में पड़ जाएगा और कोई भी पुजारी ऐसा करने को तैयार नहीं होगा.'
उत्तर प्रदेश की पंत सरकार नायर के तर्कों से सहमत नहीं हुई. उसने दोबारा आदेश दिया की पुरानी स्थिति बहाल की जाए. जवाब में के.के.के. नायर ने 27 दिसंबर 1949 को दूसरी चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने इस्तीफे की पेशकश की. साथ ही सरकार के लिए एक रास्ता भी सुझा दिया. नायर ने सरकार को सलाह दी कि विस्फोटक हालात को काबू में करने के लिए इस मसले को कोर्ट पर छोड़ा जा सकता है. कोर्ट का फैसला आने तक विवादित ढांचे के बाहर एक जालीनुमा गेट लगाया जा सकता है, जहां से श्रद्धालु रामलला के दर्शन तो कर सकें, लेकिन अंदर प्रवेश ना कर सकें. रामलला की नियमित पूजा और भोग लगाने के लिए नियुक्त पुजारियों की संख्या तीन से घटाकर एक की जा सकती है और विवादित ढांचे के आसपास सुरक्षा का घेरा सख्त करके उत्पातियों को वहां फटकने से रोका जा सकता है.

नेहरू और पंत, दोनों ने नायर का इस्तीफा स्वीकार करने की बजाय उनके सुझावों पर अमल किया. इस तरह रामलला की मूर्ति बाबरी मस्जिद के गर्भ-गृहमें रह गई और उस विवाद के बीज पड़ गए जिसने आगे चलकर देश की राजनीतिक-धार्मिक दिशा बदल दी.

#Ayodhya #BabriMasjid #KKKNair #23Dec1949 #RamJanmaBhoomi 

पूरा लेख ichowk.in पर यहां पढ़ा जा सकता है-- https://www.ichowk.in/society/how-statue-of-lord-ram-appeared-inside-the-babri-masjid-in-1949/story/1/9251.html

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

यह मोदी का मैदान नहीं!

iChowk.in पर 6 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित लेख-

मैदान भी मेरा, हथियार भी मेरा, पहला वार भी मेरा और विजय भी मेरी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हिसाब से मुद्दे चुनते हैं. अपने हिसाब से समय का चुनाव करते हैं और अपने मुद्दों पर ही टिके रहते हैं. मंच चुनावी हो या सरकारी, मोदी भटकते नहीं. उन्हें दूसरे किसी मुद्दे की तरफ खींचा जाए, तब भी वे उस मुद्दे पर लौट आते हैं जहां वे होना चाहते हैं.

आक्रामकता और अप्रत्याशितता प्रधानमंत्री की खासियत है. वे विरोधियों को चौंका देते हैं. अपनी आक्रामकता से उन्हें पराजित कर देते हैं. विरोधी यदि उन पर वार करें तो भी पलटवार करते हुए आक्रामक हो जाने में मोदी को महारत हासिल है. वे घोर राजनीतिक प्रधानमंत्री हैं. उनकी इस खूबी के सभी कायल हैं. लेकिन पहली बार सरकार के माथे पर पसीना है. एक हफ्ते पहले तक जोर-शोर से जिस न्यू इंडिया का दावा किया जा रहा था, वह कपूर की तरह हवा हो चुका है. 

आंकड़े प्रधानमंत्री के साथ हैं!

कड़क चाय की तरह कड़वी गोली देने वाले प्रधानमंत्री को सफाई देनी पड़ रही है कि सब ठीक-ठाक है. पीएम मोदी ने आंकड़े दिखाकर बताया है कि हालात उतने बुरे नहीं, जितने कि निराशावादी लोग बताने की कोशिश कर रहे हैं. सरकार नई सड़कें बना रही है. नई रेलवे लाइन बिछा रही है. कारें पहले से ज्यादा बिक रही हैं. ट्रैक्टर की बिक्री भी बढ़ी है. पहले से कहीं ज्यादा लोग हवाई जहाजों में सफर कर रहे हैं. निर्यात भी बढ़ रहा है. कीमतें काबू में हैं. सबसे बड़ी उपलब्धि ये कि सरकार का राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है, जिससे शेयर बाजार के निवेशक बम-बम हैं.

पीएम ने आंकड़े दिखाकर बताया है कि देश की जीडीपी विकास दर कोई पहली बार गिरी हो, ऐसा भी नहीं है. यूपीए की पिछली सरकार के दौरान विकास दर कम से कम 8 बार 5.7 फीसदी से नीचे आई थी और ऐतिहासिक रूप से देखें तो भारत की विकास दर 0.2 फीसदी के स्तर पर भी आ चुकी है. यानी अभी जो हो रहा है, वह अनोखा नहीं है और ऐसा होता रहा है. शायद आगे भी होगा. इतने आंकड़े गिनाने के बाद भी प्रधानमंत्री के लिए सब कुछ ठीक नहीं है.

मैदान में अपने ही डटे हैं

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में पहली बार ऐसा हो रहा है कि मोदी अपनी मनपंसद जमीन पर नहीं लड़ रहे. अब जो लड़ाई लड़ी जा रही है उसका मैदान नरेंद्र मोदी ने नहीं, बल्कि उनके उन विरोधियों ने तय किया है, जिन्हें मोदी महाभारत के पात्र शल्य की उपाधि देकर खारिज कर रहे हैं. हालांकि मोदी प्रधानमंत्री ने अब भी यही कहा है कि मैं वर्तमान की चिंता में भविष्य नहीं बिगड़ने दूंगा’, लेकिन पीएम को अब वर्तमान के बारे में भी सोचना पड़ रहा है. पहली बार सरकार जनता को राहत देने के उपायों पर चर्चा कर रही है. 

वित्त मंत्री अरुण जेटली के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर 11 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई. तब सरकार की ओर से कहा गया था कि कमजोर अर्थव्यवस्था को टॉनिक देने के लिए यह उपाय जरूरी है. इसी तर्क के आधार पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की मांग कई बार खारिज कर दी गई. अब पहली बार उसमें 2 रुपये की कटौती की गई है. राज्य सरकारों से भी कहा जा रहा है कि वे पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करें, जिससे तेल के बढ़ते दाम से लोगों को राहत मिल सके. 

जीएसटी काउंसिल मीटिंग में जीएसटी की लंबी और थकाऊ प्रक्रिया में ढील देने के उपाय सुझाए गए. छोटे कारोबारियों को राहत देने के लिए हर महीने रिटर्न भरने की जगह तीन महीने में एक बार रिटर्न भरने की छूट दी गई. दो लाख रुपये तक की खरीद पर पैन की अनिवार्यता खत्म कर दी गई. सर्राफा व्यापारियों को मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट से बाहर कर दिया गया. खास बात यह रही कि पहल खुद केंद्र सरकार की ओर से हुई. लब्बोलुआब यह कि सरकार ने माना कि जनता परेशान है और उसे कुछ राहत देने की जरूरत है.


संघ में भी चिंता है!

सरकार के समर्थक यह दावे कर रहे हैं कि यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे इक्के-दुक्के लोग पद न मिलने की खुन्नस में अनर्गल बातें कर रहे हैं. अरुण शौरी के बारे में कहा जा रहा है कि वे वित्त मंत्री बनना चाहते थे, जबकि यशवंत सिन्हा ब्रिक्स बैंक के चेयरमैन न बनाए जाने से नाराज़ है. दोनों ही नेताओं ने इससे इंकार किया है. मगर अर्थव्यवस्था के हालात पर सिर्फ यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी मोदी विरोध में नहीं खड़े हैं.


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके साथी संगठन, जैसे किसान संघ और भारतीय मजदूर संघ भी सरकार से नाराज़ हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी, दोनों में एक समान प्रभाव रखने वाले अर्थशास्त्री एस. गुरुमूर्ति ने यशवंत सिन्हा से भी पहले सरकार को चेता दिया था। गुरुमूर्ति ने 23 सितंबर को चेन्नई में कहा था कि अर्थव्यवस्था की गेंद धरातल के पत्थर से टकराकर बस ऊपर उछलने ही वाली है. गुरुमूर्ति के इस बयान में सरकार के लिए उम्मीद है, लेकिन यह चेतावनी भी है कि अर्थव्यवस्था की हालत पहले से पतली हुई है. अर्थव्यवस्था की गेंद धरातल के पत्थर से टकराकर उछले, यह सरकार की जिम्मेदारी है. अगर गेंद नहीं उछली तो भविष्य अंधकारमय है, देश के लिए भी और व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री के लिए भी.


पूरा लेख यहां पढ़ें- http://www.ichowk.in/politics/modi-is-always-known-for-his-tough-decisions-and-he-knows-how-to-tackle-them/story/1/8508.html 

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

मुट्ठी भर गांधी विरोधी बहुसंख्य समर्थकों को चिढ़ा रहे हैं

iChowk.in पर 2 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित लेख
मुट्ठी भर गांधी विरोधी बहुसंख्य समर्थकों को चिढ़ा रहे हैं
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि गांधी को चाहने वाले उन्हें नकारने वालों के मुकाबले संख्या में कई गुना ज्यादा हैं. फिर भी कुछ लोग राष्ट्रपिता के बारे में अनाप-शनाप लिख-बोल रहे हैं और गांधी को मानने वाले चुप हैं.


 महात्मा गांधी भारत के सबसे बड़े ब्रांड हैं. राष्ट्रपिता की जयंती राष्ट्रीय उत्सव है. 15 अगस्त और 26 जनवरी के बाद 2 अक्टूबर को ही सबसे ज्यादा सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत होती है. साल 2017 भी अलग नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी के महत्वाकांक्षी स्वच्छता ही सेवाकार्यक्रम को 2 अक्टूबर से जोड़ा गया है. शहर-शहर रैलियां हो रही हैं. सफाई और स्वच्छता कार्यक्रम हो रहे हैं. दो साल बाद गांधीजी के जन्म के 150 साल पूरे हो रहे हैं और उसे बड़े पैमाने पर सेलिब्रेट करने की सरकारी योजना का एलान हो चुका है. लेकिन क्या गांधीजी को सब लोग उतना ही सम्मान दे रहे हैं, जितना ऊपर-ऊपर दिख रहा है? या गांधी के देश में उनका हत्यारा नाथूराम गोडसे भी पूजा जाने लगा है?
यदि आप सोशल मीडिया के किसी माध्यम से जुड़े हैं तो गांधी और गोडसे से जुड़े संदेशों से आपका वास्ता जरूर पड़ा होगा. खास तौर पर वॉट्सऐप और फेसबुक जैसे माध्यमों पर ऐसे मैसेज कॉमन होने लगे हैं. पसंद हो तो शेयर अवश्य करो; असली हिंदू हो तो सबको भेजो; कायर नहीं हो तो फॉरवर्ड करो; हिंदू मां की कोख से पैदा हुए तो फॉरवर्ड जरूर करो; इन जैसे भड़काऊ संदेशों के साथ आने वाली कविताओं और अधकचरे इतिहास मिले संदेशों में एक बात कॉमन होती है. वह यह कि भारत में अब तक बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ अत्याचार हुआ है. कांग्रेस और दूसरे तमाम राजनीतिक दल इस देश में मुसलमानों के लिए काम करते हैं. यहां तक कि गांधीजी का दिल भी मुसलमानों के लिए धड़कता था और अगर एक 'सच्चे हिंदू' नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या ना कर दी होती तो हिंदुस्तान के लोग काशी पूजने की जगह काबा में नमाज पढ़ रहे होते.

गोडसे को हीरो बनाने वाले कौन हैं?
पढ़ने वाला विश्वास करे या न करे, इन संदेशों में कहानी बनाकर यह बताने की पुरजोर कोशिश की जाती है कि नाथूराम गोडसे ने गांधी को मारकर हिंदुओं पर बड़ा उपकार किया. दावा किया जाता है कि देश बंटवारे के बाद गांधीजी पाकिस्तान को ज्यादा जमीन देना चाहते थे. पाकिस्तान को देश का पूरा खजाना दे देना चाहते थे और हिंदुस्तान की सेना के तोप-गोले भी पाकिस्तान को दे देना चाहते थे. यह भी दावा किया जाता है कि गांधीजी कौरवों की तरफ से लड़ने वाले भीष्म पितामह जैसे हो गए थे और पाकिस्तान की ओर से हिदुस्तान से लड़ रहे थे.
सोशल मीडिया पर इसी तरह के कुछ दूसरे मैसेज भी आते हैं, जिनमें यह बताया पूछा जाता है कि अगर गांधीजी ने ही आजादी दिलाई तो भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने क्या किया? नेताजी सुभाष चंद्र बोस किसके लिए लड़े?
ये पोस्ट कौन भेजते हैं? वे कोई अनजान लोग नहीं हैं. संभव है कि आप उनमें से बहुतों को व्यक्तिगत रूप से जानते हों. कोई आपके मुहल्ले में रहता होगा. कोई आपके स्कूल, कॉलेज का सहपाठी हो सकता है. कोई आपके शहर का हो सकता है. कोई आपके दफ्तर का हो सकता है. लेकिन वे इन संदेशों के क्रिएटर नहीं हैं. वो सिर्फ फॉरवर्ड करने वाले हैं. वे उस प्रचार तंत्र के संदेशवाहक हैं जिनके बारे में वे खुद नहीं जानते कि वे किसका संदेश फैला रहे हैं और उसका मकसद क्या है.
सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट करने वालों के प्रोफाइल और उनकी टाइमलाइन में झांकें तो कुछ बातें साफ हो जाती हैं. एक तो ये कि वे अलग-अलग व्यवसायों से जुड़े लोग हैं. कोई अपनी दुकान चलाता है, कोई नौकरी करता है, कोई छात्र है, कोई रिटायर है और किसी का पार्टटाइम जॉब है. लेकिन उनकी कुछ बातें कॉमन हैं. सभी हिंदू धर्म के स्वयंभू संरक्षक हैं और अपनी टाइमलाइन पर ऐसे पोस्ट जरूर शेयर करते हैं जिनमें भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने, मुसलमानों-ईसाइयों को देश से बाहर करने और एक सच्चे हिंदू प्रधानमंत्री के हाथों में ही देश के सुरक्षित होने की बात होती है. आई एम फॉर मोदी, मोदी फॉर इंडिया, वी सपोर्ट नरेंद्र मोदी, नेशनलिस्ट इंडियन, राष्ट्रवादी हिंदू... ये सब कुछ ऐसे पेज हैं, जहां के पोस्ट शेयर करना ये नहीं भूलते.

प्रधानमंत्री मोदी के गांधी
यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की तारीफ करने वाला हर व्यक्ति सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का मेंबर है या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक है. वजह स्वयं प्रधानमंत्री मोदी हैं, जो राष्ट्रपिता के प्रति अगाध श्रद्धा दिखाने में कभी परहेज नहीं करते. मोहनदास करमचंद गांधी दुनिया भर में भारत की यूएसपी हैं. प्रधानमंत्री मोदी भी जानते हैं कि गांधी के नाम पर उन्हें जितना समर्थन मिल सकता है, उतना किसी और के नाम पर नहीं. इसलिए अपने प्रधानमंत्रित्व के पहले वर्ष से ही वे गांधी के करीब दिखने लगे थे. 15 अगस्त 2014 को लालकिले की प्राचीर से अपने पहले भाषण में मोदी ने स्वच्छता मिशन शुरू करने का एलान किया और 2 अक्टूबर 2014 को उसकी शुरुआत भी कर दी. उसी साल न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन के अपने ऐतिहासिक कार्यक्रम में भी मोदी ने सबसे ज्यादा वक्त गांधी को ही दिया. प्रधानमंत्री मोदी अहमदाबाद में बापू के साबरमती आश्रम में विश्व नेताओं की अगवानी करते हैं. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे को वे गांधी की स्मृतियों से वाकिफ करा चुके हैं.

आखिर माजरा क्या है?
1974 में जर्मनी के पॉलिटिकल साइंस के दो प्रोफेसरों- एलिजाबेथ नोएल और न्यूमैन ने एक थ्योरी दी थी. पॉलिटिकल साइंस और मास कम्युनिकेशन में इस थ्योरी को स्पाइरल ऑफ साइलेंस थ्योरीके नाम से जाना जाता है. यह थ्योरी कहती है कि राजनीतिक संदेशों में कई बार मैसेज भेजने वाले और मैसेज प्राप्त करने वालों के विचार अलग होते हैं. आक्रामक प्रचार करने वाले संख्या में कम होते हैं, लेकिन उनके मैसेज की कारपेट बॉम्बिंग ऐसी होती है कि बहुसंख्यक लोग उनकी राय से सहमत न होते हुए भी चुप रह जाते हैं. उन्हें इस बात का डर लगने लगता है कि वो कम संख्या में हैं और अगर उन्होंने अपनी राय जाहिर की तो बहुसंख्यक लोग उन्हें नकार देंगे. धीरे-धीरे लोग चुप रहने लगते हैं और पब्लिक स्पेस में वह विचार हावी होने लगता है, जिसे मुट्ठी भर लोग प्रसारित कर रहे होते हैं.
तो क्या गांधी और गोडसे के बारे में भी ऐसा ही हो रहा है? ऐसा संभव हो सकता है. इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि गांधी को चाहने वाले उन्हें नकारने वालों के मुकाबले संख्या में कई गुना ज्यादा हैं. फिर भी कुछ लोग राष्ट्रपिता के बारे में अनाप-शनाप लिख-बोल रहे हैं और गांधी को मानने वाले चुप हैं. यह स्थिति स्पाइरल ऑफ साइलेंस थ्योरीके सच होने की पुष्टि करता है.
इसका परिणाम यही होगा कि गांधी विरोधियों के विचार पब्लिक स्पेस में हावी हो जाएंगे और गांधी को चाहने वाले कुछ बोलने से भी डरने लगेंगे. वह ऐसी स्थिति होगी, जिसके बारे में अभी सोचने से भी डर लगता है. लेकिन सच यही है कि अभी डरेंगे तो आगे बोल नहीं पाएंगे.

पूरा लेख यहां पढ़ें- 
http://www.ichowk.in/society/mahatma-gandhi-is-abused-on-social-media-by-godse-supporters/story/1/8463.html 



शुक्रवार, 3 मार्च 2017

बिल्डर के आगे घुटना टेक जीडीए

गाजियाबाद में बिल्डर का कानून चलता है या सरकार का? गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) के अफसर-कर्मचारी बिल्डर से पगार पाते हैं या सरकार से? अगर बिल्डर सैलरी नहीं देता तो फिर बिल्डर के आगे घुटना टेक कैसे हो जाता है प्राधिकरण? यही सवाल आपके मन में भी उठेंगे जब आप यह चिट्ठी पढ़ेंगे। चिट्ठी लिखी है जीडीए के सेक्रेट्री रवींद्र गोडबोले ने और चिट्ठी लिखी गई है यूपी के सीएम ऑफिस में विशेष कार्य अधिकारी जगदेव सिंह को। इस चिट्ठी की कॉपी उत्तर प्रदेश सरकार के आवास एवं शहरी नियोजन के सेक्रेट्री को भी भेजी गई है। 



गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के सचिव रवींद्र गोडबोले ने लिखित रूप से स्वीकार किया है कि एक बिल्डर (अजनारा इंडिया) उनकी बात नहीं मान रहा। बिल्डर जीडीए के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा। गोडबोले आईएएस अफसर हैं। क्या लिखना है और क्या नहीं लिखना, यह अच्छी तरह से जानते होंगे। उन्हें अपने अधिकारों का भी पता होगा। जीडीए के सेक्रेट्री को यह जरूर मालूम होगा कि पूरे गाजियाबाद में होने वाले किसी भी बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन को उनका प्राधिकरण नियंत्रित करता है। प्राधिकरण ही नक्शे पास करता है और बिल्डिंग मैटेरियल क्वालिटी पर भी नज़र रखता है। वह चाहे तो बिल्डर पर कार्रवाई कर सकता है, जुर्माना लगा सकता है। कंस्ट्रक्शन रोकने का अधिकार भी जीडीए के पास है। तो फिर कार्रवाई करने की जगह उसने हाथ क्यों खड़े कर दिए?

क्या किसी बिल्डर में इतनी जुर्रत हो सकती है कि वह सरकारी आदेशों को भी ठेंगा दिखा दे? वह भी तब जबकि आदेश सीधे-सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर दिया गया हो और मुख्यमंत्री कार्यालय से उसकी मॉनिटरिंग भी हो रही हो।

जीडीए ने जिस बिल्डर के आगे सरेंडर कर दिया है, उसका नाम है अजनारा इंडिया। अजनारा की गिनती एनसीआर के बड़े बिल्डरों में होती है। लेकिन यह बिल्डर ग्राहकों के साथ मनमानी के लिए भी उतना ही बदनाम है। मामला गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की अजनारा इंटीग्रिटी सोसाइटी से जुड़ा है। करीब 1200 करोड़ रुपये की इस सोसाइटी में बिल्डर की मनमानियों से तंग आए लोगों ने बार-बार जीडीए से मदद की गुहार लगाई। कई बार मीटिंगें हुईं, लेकिन बिल्डर पर कोई असर नहीं पड़ा। अंत में अजनारा इंटीग्रिटी अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास अपनी शिकायतें भेजीं। सीएम ऑफिस के दखल के बाद 15 दिसंबर 2016 को जीडीए में बैठक हुई। उस बैठक में अजनारा इंडिया के डायरेक्टर प्रमोद गुप्ता को भी बुलाया गया, लेकिन प्रमोद गुप्ता ने अपना प्रतिनिधि भेजकर काम चला लिया।




15 दिसंबर 2016 की बैठक में बिल्डर को कई निर्देश दिए गए। इनमें 10 दिनों के अंदर पार्किंग अलॉट करने, विजिटर्स पार्किंग की जगह तय करने, रिहाइशी टॉवर्स पर एविएशन लाइट और लाइट कंडक्टर लगाने और बेसमेंट में इमरजेंसी लाइट लगाने जैसे आदेश शामिल थे। बिल्डर को एओए के साथ बैठकर सोसाइटी की बाकी समस्याएं सुलझाने का भी निर्देश दिया गया। लेकिन महीनों बीत गए, बिल्डर ने प्राधिकरण के एक भी निर्देश नहीं माना। जीडीए ने बिल्डर को रिमाइंडर भी भेजा, फिर भी कोई आदेश नहीं माना गया।

फरवरी 2017 में मुख्यमंत्री कार्यालय से जब इस मामले की प्रगति पूछी गई तो जीडीए ने अपने हाथ खड़े कर दिए। प्राधिकरण के सचिव रवींद्र गोडबोले ने यूपी शासन को बताया कि बिल्डर उनके किसी भी निर्देश को नहीं मान रहा और शिकायतकर्ता न्याय पाने के लिए न्यायालय जाने को स्वतंत्र है। न्यायालय की शरण में जाने का विकल्प तो पहले से खुला था। अगर कोर्ट ही आखिरी रास्ता है तो फिर प्राधिकरण का ढोंग क्यों? ऐसा क्यों होता है कि बिल्डर के फायदे की योजनाएं बनाने, नक्शे पास करने, कंप्लीशन सर्टिफिकेट देने जैसे काम तो प्राधिकरण पूरी तत्परता से कर देता है। लेकिन जब आम लोगों को होने वाली समस्याएं सामने आती हैं तो प्राधिकरण घुटने टेक देता है।


#GDA #Ajnara #AjnaraIntegrity #CheaterAjnara #Ghaziabad #RNE 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

Kan Kan me Bhagwan

A tug of war is always there between different sects, tenets, faiths and beliefs under the ambit of Hinduism. The search for the right path to meet Paramatma or God and to get liberated from the cycle of births and deaths is always on. Karma or bhakti, yajna or tapa, grandeur or simplicity- these questions stir Hindus' mind right from the date of first civilization in Indus valley.
Vedas, Purans, Upnishads and Brahmins discuss different ways to attain 'Moksha'. In the Battle of Mahabharata, Partha (Arjuna) asks same question to Lord Krishna- 'which way is superior?' In the course of Srimad Bhagavad Gita, Krishna describes 3 ways to liberation. First, the way of action or Karma, second the way of knowledge or Jnana. and third the way of devotion or Bhakti.
In these three ways, bhakti or devotion appears to be the path most recommended in the Gita. It emphasizes loving devotion to one’s chosen God or Goddess. And for love, no material is required, not even akshat (intact rice), pushpa (flower) and naivedy (offerings made to the deity). In the epic of Mahabharata, Draupadi pleased Krishna with a small leaf of holy basil (tulsi) only. Same story of devotion and dedication is there in Ramayana, where Lord Rama gets satisfied with berries offered by Shabari.
Hindus made huge devalayas (abode for deities), in North and in South, in planes and at peaks of mountains. They offered gold, gems, wood and clothes all best in their possession, for God. Shri Anantha Padmanabhaswamy temple in Thiruvananthapuram and Tirumala Venkateswara temple in Tirupathi are best suited examples. But holy scriptures say there is no difference between God residing in the golden abode and the God worshpied by poors in their homes. If Lord Vishnu is there in the huge idol of Shree Anantha Padmanabha, same Lord is there in a small Shaligram Shila. Jagannath is Dinanath and Dinanath is Jagannath. No difference.
One of the basic belief of Hinduism say 'Kan Kan men Bhagwan.' Vedas accepted one God. 'Eka brahma dvitiya nasti'. There is no second. God cannot be two. God is one. And God is impartial. No matter what you offer for him, he judge you from the purity of your heart, your devotion, your truth and your love for others. You may appease God only by your love, devotion and dedication, not by your offerings, no matter how costly they are. Demon King Bali (or Mahabali) got 'Moksha' only when he offered his head (arrogance) for Lord Vishnu’s feet, not by offering his entire kingdom and gold. As Manna De describes in a popular filmi song, 'Mala ghumane se woh nahin milta/Bhasmi lagane se woh nahi hilta.'
Saint Tulsidas has said, 'Kalyug Kewal Naam Adhara, Simar-Simar Nar Utarahin Para.' In Kaliyug only chanting of God’s name is enough to sail the human beings through the deep sea of the world. For a Hindu, chanting too is not required if your heart is pure. Here is a story, from the mythology itself.
Narada, the Dev Rishi is arguably the greatest of Lord Vishnu’s many devotees. Thanks to numerous TV serials, all we know him as continuous chanter of ‘Narayan… Narayan.’ Once he went to Vaikuntha, Vishnu’s abode in the heavens and asked, 'Who is your favorite devotee?' Lord Vishnu names a poor farmer as his favorite devotee. The next day, Narada shadows the farmer as he works hard in his fields. Throughout the day, Narada doesn’t get any glimpse of the farmer’s extraordinary devoutness. Narada asks him, 'When and how many times do you pray to or think about Prabhu?' The farmer replies “Once in the morning, once in the evening, and as many times during the day as I can during my time in the fields.'
Narada returns only to complain, 'The farmer thinks about you a mere 5-6 times a day while I think and sing paeans to you every single waking minute. How could you possibly consider the farmer to be a more superior devotee than me'. Vishnu, then materializes a pot, filled it with oil and places it on Narada’s head. He then commands him to walk a round of Kshirsagar without spilling a single drop of oil.
On his returning, Vishnu asks, 'So Narada, how many times did you think about me during your walk? Narada replies, “Not even once! How could I when all my attention was on the pot and ensuring that not a drop would spill?' Vishnu then consoles Narada, 'The farmer works hard in his fields all day, yet he finds time to think about me a few times. You, on the other hand, couldn’t think of me even once!'
'Mann changaa to kathauti me Ganga' and 'Yatha shakti tatha bhakti'- these proverbs are not new. Hindus swear by these principles for centuries. This flexibility is the real power of Hinduism. It can bend (according to devotee's belief), thats why any force couldn't break it. Rituals are ok, but when try to bind it (in rituals), that will harm the faith only.

(Written on 26th March 2015)