शुक्रवार, 3 मार्च 2017

बिल्डर के आगे घुटना टेक जीडीए

गाजियाबाद में बिल्डर का कानून चलता है या सरकार का? गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) के अफसर-कर्मचारी बिल्डर से पगार पाते हैं या सरकार से? अगर बिल्डर सैलरी नहीं देता तो फिर बिल्डर के आगे घुटना टेक कैसे हो जाता है प्राधिकरण? यही सवाल आपके मन में भी उठेंगे जब आप यह चिट्ठी पढ़ेंगे। चिट्ठी लिखी है जीडीए के सेक्रेट्री रवींद्र गोडबोले ने और चिट्ठी लिखी गई है यूपी के सीएम ऑफिस में विशेष कार्य अधिकारी जगदेव सिंह को। इस चिट्ठी की कॉपी उत्तर प्रदेश सरकार के आवास एवं शहरी नियोजन के सेक्रेट्री को भी भेजी गई है। 



गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के सचिव रवींद्र गोडबोले ने लिखित रूप से स्वीकार किया है कि एक बिल्डर (अजनारा इंडिया) उनकी बात नहीं मान रहा। बिल्डर जीडीए के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा। गोडबोले आईएएस अफसर हैं। क्या लिखना है और क्या नहीं लिखना, यह अच्छी तरह से जानते होंगे। उन्हें अपने अधिकारों का भी पता होगा। जीडीए के सेक्रेट्री को यह जरूर मालूम होगा कि पूरे गाजियाबाद में होने वाले किसी भी बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन को उनका प्राधिकरण नियंत्रित करता है। प्राधिकरण ही नक्शे पास करता है और बिल्डिंग मैटेरियल क्वालिटी पर भी नज़र रखता है। वह चाहे तो बिल्डर पर कार्रवाई कर सकता है, जुर्माना लगा सकता है। कंस्ट्रक्शन रोकने का अधिकार भी जीडीए के पास है। तो फिर कार्रवाई करने की जगह उसने हाथ क्यों खड़े कर दिए?

क्या किसी बिल्डर में इतनी जुर्रत हो सकती है कि वह सरकारी आदेशों को भी ठेंगा दिखा दे? वह भी तब जबकि आदेश सीधे-सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर दिया गया हो और मुख्यमंत्री कार्यालय से उसकी मॉनिटरिंग भी हो रही हो।

जीडीए ने जिस बिल्डर के आगे सरेंडर कर दिया है, उसका नाम है अजनारा इंडिया। अजनारा की गिनती एनसीआर के बड़े बिल्डरों में होती है। लेकिन यह बिल्डर ग्राहकों के साथ मनमानी के लिए भी उतना ही बदनाम है। मामला गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की अजनारा इंटीग्रिटी सोसाइटी से जुड़ा है। करीब 1200 करोड़ रुपये की इस सोसाइटी में बिल्डर की मनमानियों से तंग आए लोगों ने बार-बार जीडीए से मदद की गुहार लगाई। कई बार मीटिंगें हुईं, लेकिन बिल्डर पर कोई असर नहीं पड़ा। अंत में अजनारा इंटीग्रिटी अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास अपनी शिकायतें भेजीं। सीएम ऑफिस के दखल के बाद 15 दिसंबर 2016 को जीडीए में बैठक हुई। उस बैठक में अजनारा इंडिया के डायरेक्टर प्रमोद गुप्ता को भी बुलाया गया, लेकिन प्रमोद गुप्ता ने अपना प्रतिनिधि भेजकर काम चला लिया।




15 दिसंबर 2016 की बैठक में बिल्डर को कई निर्देश दिए गए। इनमें 10 दिनों के अंदर पार्किंग अलॉट करने, विजिटर्स पार्किंग की जगह तय करने, रिहाइशी टॉवर्स पर एविएशन लाइट और लाइट कंडक्टर लगाने और बेसमेंट में इमरजेंसी लाइट लगाने जैसे आदेश शामिल थे। बिल्डर को एओए के साथ बैठकर सोसाइटी की बाकी समस्याएं सुलझाने का भी निर्देश दिया गया। लेकिन महीनों बीत गए, बिल्डर ने प्राधिकरण के एक भी निर्देश नहीं माना। जीडीए ने बिल्डर को रिमाइंडर भी भेजा, फिर भी कोई आदेश नहीं माना गया।

फरवरी 2017 में मुख्यमंत्री कार्यालय से जब इस मामले की प्रगति पूछी गई तो जीडीए ने अपने हाथ खड़े कर दिए। प्राधिकरण के सचिव रवींद्र गोडबोले ने यूपी शासन को बताया कि बिल्डर उनके किसी भी निर्देश को नहीं मान रहा और शिकायतकर्ता न्याय पाने के लिए न्यायालय जाने को स्वतंत्र है। न्यायालय की शरण में जाने का विकल्प तो पहले से खुला था। अगर कोर्ट ही आखिरी रास्ता है तो फिर प्राधिकरण का ढोंग क्यों? ऐसा क्यों होता है कि बिल्डर के फायदे की योजनाएं बनाने, नक्शे पास करने, कंप्लीशन सर्टिफिकेट देने जैसे काम तो प्राधिकरण पूरी तत्परता से कर देता है। लेकिन जब आम लोगों को होने वाली समस्याएं सामने आती हैं तो प्राधिकरण घुटने टेक देता है।


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