शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

यह मोदी का मैदान नहीं!

iChowk.in पर 6 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित लेख-

मैदान भी मेरा, हथियार भी मेरा, पहला वार भी मेरा और विजय भी मेरी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हिसाब से मुद्दे चुनते हैं. अपने हिसाब से समय का चुनाव करते हैं और अपने मुद्दों पर ही टिके रहते हैं. मंच चुनावी हो या सरकारी, मोदी भटकते नहीं. उन्हें दूसरे किसी मुद्दे की तरफ खींचा जाए, तब भी वे उस मुद्दे पर लौट आते हैं जहां वे होना चाहते हैं.

आक्रामकता और अप्रत्याशितता प्रधानमंत्री की खासियत है. वे विरोधियों को चौंका देते हैं. अपनी आक्रामकता से उन्हें पराजित कर देते हैं. विरोधी यदि उन पर वार करें तो भी पलटवार करते हुए आक्रामक हो जाने में मोदी को महारत हासिल है. वे घोर राजनीतिक प्रधानमंत्री हैं. उनकी इस खूबी के सभी कायल हैं. लेकिन पहली बार सरकार के माथे पर पसीना है. एक हफ्ते पहले तक जोर-शोर से जिस न्यू इंडिया का दावा किया जा रहा था, वह कपूर की तरह हवा हो चुका है. 

आंकड़े प्रधानमंत्री के साथ हैं!

कड़क चाय की तरह कड़वी गोली देने वाले प्रधानमंत्री को सफाई देनी पड़ रही है कि सब ठीक-ठाक है. पीएम मोदी ने आंकड़े दिखाकर बताया है कि हालात उतने बुरे नहीं, जितने कि निराशावादी लोग बताने की कोशिश कर रहे हैं. सरकार नई सड़कें बना रही है. नई रेलवे लाइन बिछा रही है. कारें पहले से ज्यादा बिक रही हैं. ट्रैक्टर की बिक्री भी बढ़ी है. पहले से कहीं ज्यादा लोग हवाई जहाजों में सफर कर रहे हैं. निर्यात भी बढ़ रहा है. कीमतें काबू में हैं. सबसे बड़ी उपलब्धि ये कि सरकार का राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है, जिससे शेयर बाजार के निवेशक बम-बम हैं.

पीएम ने आंकड़े दिखाकर बताया है कि देश की जीडीपी विकास दर कोई पहली बार गिरी हो, ऐसा भी नहीं है. यूपीए की पिछली सरकार के दौरान विकास दर कम से कम 8 बार 5.7 फीसदी से नीचे आई थी और ऐतिहासिक रूप से देखें तो भारत की विकास दर 0.2 फीसदी के स्तर पर भी आ चुकी है. यानी अभी जो हो रहा है, वह अनोखा नहीं है और ऐसा होता रहा है. शायद आगे भी होगा. इतने आंकड़े गिनाने के बाद भी प्रधानमंत्री के लिए सब कुछ ठीक नहीं है.

मैदान में अपने ही डटे हैं

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में पहली बार ऐसा हो रहा है कि मोदी अपनी मनपंसद जमीन पर नहीं लड़ रहे. अब जो लड़ाई लड़ी जा रही है उसका मैदान नरेंद्र मोदी ने नहीं, बल्कि उनके उन विरोधियों ने तय किया है, जिन्हें मोदी महाभारत के पात्र शल्य की उपाधि देकर खारिज कर रहे हैं. हालांकि मोदी प्रधानमंत्री ने अब भी यही कहा है कि मैं वर्तमान की चिंता में भविष्य नहीं बिगड़ने दूंगा’, लेकिन पीएम को अब वर्तमान के बारे में भी सोचना पड़ रहा है. पहली बार सरकार जनता को राहत देने के उपायों पर चर्चा कर रही है. 

वित्त मंत्री अरुण जेटली के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर 11 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई. तब सरकार की ओर से कहा गया था कि कमजोर अर्थव्यवस्था को टॉनिक देने के लिए यह उपाय जरूरी है. इसी तर्क के आधार पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की मांग कई बार खारिज कर दी गई. अब पहली बार उसमें 2 रुपये की कटौती की गई है. राज्य सरकारों से भी कहा जा रहा है कि वे पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करें, जिससे तेल के बढ़ते दाम से लोगों को राहत मिल सके. 

जीएसटी काउंसिल मीटिंग में जीएसटी की लंबी और थकाऊ प्रक्रिया में ढील देने के उपाय सुझाए गए. छोटे कारोबारियों को राहत देने के लिए हर महीने रिटर्न भरने की जगह तीन महीने में एक बार रिटर्न भरने की छूट दी गई. दो लाख रुपये तक की खरीद पर पैन की अनिवार्यता खत्म कर दी गई. सर्राफा व्यापारियों को मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट से बाहर कर दिया गया. खास बात यह रही कि पहल खुद केंद्र सरकार की ओर से हुई. लब्बोलुआब यह कि सरकार ने माना कि जनता परेशान है और उसे कुछ राहत देने की जरूरत है.


संघ में भी चिंता है!

सरकार के समर्थक यह दावे कर रहे हैं कि यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे इक्के-दुक्के लोग पद न मिलने की खुन्नस में अनर्गल बातें कर रहे हैं. अरुण शौरी के बारे में कहा जा रहा है कि वे वित्त मंत्री बनना चाहते थे, जबकि यशवंत सिन्हा ब्रिक्स बैंक के चेयरमैन न बनाए जाने से नाराज़ है. दोनों ही नेताओं ने इससे इंकार किया है. मगर अर्थव्यवस्था के हालात पर सिर्फ यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी मोदी विरोध में नहीं खड़े हैं.


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके साथी संगठन, जैसे किसान संघ और भारतीय मजदूर संघ भी सरकार से नाराज़ हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी, दोनों में एक समान प्रभाव रखने वाले अर्थशास्त्री एस. गुरुमूर्ति ने यशवंत सिन्हा से भी पहले सरकार को चेता दिया था। गुरुमूर्ति ने 23 सितंबर को चेन्नई में कहा था कि अर्थव्यवस्था की गेंद धरातल के पत्थर से टकराकर बस ऊपर उछलने ही वाली है. गुरुमूर्ति के इस बयान में सरकार के लिए उम्मीद है, लेकिन यह चेतावनी भी है कि अर्थव्यवस्था की हालत पहले से पतली हुई है. अर्थव्यवस्था की गेंद धरातल के पत्थर से टकराकर उछले, यह सरकार की जिम्मेदारी है. अगर गेंद नहीं उछली तो भविष्य अंधकारमय है, देश के लिए भी और व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री के लिए भी.


पूरा लेख यहां पढ़ें- http://www.ichowk.in/politics/modi-is-always-known-for-his-tough-decisions-and-he-knows-how-to-tackle-them/story/1/8508.html 

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

मुट्ठी भर गांधी विरोधी बहुसंख्य समर्थकों को चिढ़ा रहे हैं

iChowk.in पर 2 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित लेख
मुट्ठी भर गांधी विरोधी बहुसंख्य समर्थकों को चिढ़ा रहे हैं
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि गांधी को चाहने वाले उन्हें नकारने वालों के मुकाबले संख्या में कई गुना ज्यादा हैं. फिर भी कुछ लोग राष्ट्रपिता के बारे में अनाप-शनाप लिख-बोल रहे हैं और गांधी को मानने वाले चुप हैं.


 महात्मा गांधी भारत के सबसे बड़े ब्रांड हैं. राष्ट्रपिता की जयंती राष्ट्रीय उत्सव है. 15 अगस्त और 26 जनवरी के बाद 2 अक्टूबर को ही सबसे ज्यादा सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत होती है. साल 2017 भी अलग नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी के महत्वाकांक्षी स्वच्छता ही सेवाकार्यक्रम को 2 अक्टूबर से जोड़ा गया है. शहर-शहर रैलियां हो रही हैं. सफाई और स्वच्छता कार्यक्रम हो रहे हैं. दो साल बाद गांधीजी के जन्म के 150 साल पूरे हो रहे हैं और उसे बड़े पैमाने पर सेलिब्रेट करने की सरकारी योजना का एलान हो चुका है. लेकिन क्या गांधीजी को सब लोग उतना ही सम्मान दे रहे हैं, जितना ऊपर-ऊपर दिख रहा है? या गांधी के देश में उनका हत्यारा नाथूराम गोडसे भी पूजा जाने लगा है?
यदि आप सोशल मीडिया के किसी माध्यम से जुड़े हैं तो गांधी और गोडसे से जुड़े संदेशों से आपका वास्ता जरूर पड़ा होगा. खास तौर पर वॉट्सऐप और फेसबुक जैसे माध्यमों पर ऐसे मैसेज कॉमन होने लगे हैं. पसंद हो तो शेयर अवश्य करो; असली हिंदू हो तो सबको भेजो; कायर नहीं हो तो फॉरवर्ड करो; हिंदू मां की कोख से पैदा हुए तो फॉरवर्ड जरूर करो; इन जैसे भड़काऊ संदेशों के साथ आने वाली कविताओं और अधकचरे इतिहास मिले संदेशों में एक बात कॉमन होती है. वह यह कि भारत में अब तक बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ अत्याचार हुआ है. कांग्रेस और दूसरे तमाम राजनीतिक दल इस देश में मुसलमानों के लिए काम करते हैं. यहां तक कि गांधीजी का दिल भी मुसलमानों के लिए धड़कता था और अगर एक 'सच्चे हिंदू' नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या ना कर दी होती तो हिंदुस्तान के लोग काशी पूजने की जगह काबा में नमाज पढ़ रहे होते.

गोडसे को हीरो बनाने वाले कौन हैं?
पढ़ने वाला विश्वास करे या न करे, इन संदेशों में कहानी बनाकर यह बताने की पुरजोर कोशिश की जाती है कि नाथूराम गोडसे ने गांधी को मारकर हिंदुओं पर बड़ा उपकार किया. दावा किया जाता है कि देश बंटवारे के बाद गांधीजी पाकिस्तान को ज्यादा जमीन देना चाहते थे. पाकिस्तान को देश का पूरा खजाना दे देना चाहते थे और हिंदुस्तान की सेना के तोप-गोले भी पाकिस्तान को दे देना चाहते थे. यह भी दावा किया जाता है कि गांधीजी कौरवों की तरफ से लड़ने वाले भीष्म पितामह जैसे हो गए थे और पाकिस्तान की ओर से हिदुस्तान से लड़ रहे थे.
सोशल मीडिया पर इसी तरह के कुछ दूसरे मैसेज भी आते हैं, जिनमें यह बताया पूछा जाता है कि अगर गांधीजी ने ही आजादी दिलाई तो भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने क्या किया? नेताजी सुभाष चंद्र बोस किसके लिए लड़े?
ये पोस्ट कौन भेजते हैं? वे कोई अनजान लोग नहीं हैं. संभव है कि आप उनमें से बहुतों को व्यक्तिगत रूप से जानते हों. कोई आपके मुहल्ले में रहता होगा. कोई आपके स्कूल, कॉलेज का सहपाठी हो सकता है. कोई आपके शहर का हो सकता है. कोई आपके दफ्तर का हो सकता है. लेकिन वे इन संदेशों के क्रिएटर नहीं हैं. वो सिर्फ फॉरवर्ड करने वाले हैं. वे उस प्रचार तंत्र के संदेशवाहक हैं जिनके बारे में वे खुद नहीं जानते कि वे किसका संदेश फैला रहे हैं और उसका मकसद क्या है.
सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट करने वालों के प्रोफाइल और उनकी टाइमलाइन में झांकें तो कुछ बातें साफ हो जाती हैं. एक तो ये कि वे अलग-अलग व्यवसायों से जुड़े लोग हैं. कोई अपनी दुकान चलाता है, कोई नौकरी करता है, कोई छात्र है, कोई रिटायर है और किसी का पार्टटाइम जॉब है. लेकिन उनकी कुछ बातें कॉमन हैं. सभी हिंदू धर्म के स्वयंभू संरक्षक हैं और अपनी टाइमलाइन पर ऐसे पोस्ट जरूर शेयर करते हैं जिनमें भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने, मुसलमानों-ईसाइयों को देश से बाहर करने और एक सच्चे हिंदू प्रधानमंत्री के हाथों में ही देश के सुरक्षित होने की बात होती है. आई एम फॉर मोदी, मोदी फॉर इंडिया, वी सपोर्ट नरेंद्र मोदी, नेशनलिस्ट इंडियन, राष्ट्रवादी हिंदू... ये सब कुछ ऐसे पेज हैं, जहां के पोस्ट शेयर करना ये नहीं भूलते.

प्रधानमंत्री मोदी के गांधी
यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की तारीफ करने वाला हर व्यक्ति सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का मेंबर है या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक है. वजह स्वयं प्रधानमंत्री मोदी हैं, जो राष्ट्रपिता के प्रति अगाध श्रद्धा दिखाने में कभी परहेज नहीं करते. मोहनदास करमचंद गांधी दुनिया भर में भारत की यूएसपी हैं. प्रधानमंत्री मोदी भी जानते हैं कि गांधी के नाम पर उन्हें जितना समर्थन मिल सकता है, उतना किसी और के नाम पर नहीं. इसलिए अपने प्रधानमंत्रित्व के पहले वर्ष से ही वे गांधी के करीब दिखने लगे थे. 15 अगस्त 2014 को लालकिले की प्राचीर से अपने पहले भाषण में मोदी ने स्वच्छता मिशन शुरू करने का एलान किया और 2 अक्टूबर 2014 को उसकी शुरुआत भी कर दी. उसी साल न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन के अपने ऐतिहासिक कार्यक्रम में भी मोदी ने सबसे ज्यादा वक्त गांधी को ही दिया. प्रधानमंत्री मोदी अहमदाबाद में बापू के साबरमती आश्रम में विश्व नेताओं की अगवानी करते हैं. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे को वे गांधी की स्मृतियों से वाकिफ करा चुके हैं.

आखिर माजरा क्या है?
1974 में जर्मनी के पॉलिटिकल साइंस के दो प्रोफेसरों- एलिजाबेथ नोएल और न्यूमैन ने एक थ्योरी दी थी. पॉलिटिकल साइंस और मास कम्युनिकेशन में इस थ्योरी को स्पाइरल ऑफ साइलेंस थ्योरीके नाम से जाना जाता है. यह थ्योरी कहती है कि राजनीतिक संदेशों में कई बार मैसेज भेजने वाले और मैसेज प्राप्त करने वालों के विचार अलग होते हैं. आक्रामक प्रचार करने वाले संख्या में कम होते हैं, लेकिन उनके मैसेज की कारपेट बॉम्बिंग ऐसी होती है कि बहुसंख्यक लोग उनकी राय से सहमत न होते हुए भी चुप रह जाते हैं. उन्हें इस बात का डर लगने लगता है कि वो कम संख्या में हैं और अगर उन्होंने अपनी राय जाहिर की तो बहुसंख्यक लोग उन्हें नकार देंगे. धीरे-धीरे लोग चुप रहने लगते हैं और पब्लिक स्पेस में वह विचार हावी होने लगता है, जिसे मुट्ठी भर लोग प्रसारित कर रहे होते हैं.
तो क्या गांधी और गोडसे के बारे में भी ऐसा ही हो रहा है? ऐसा संभव हो सकता है. इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि गांधी को चाहने वाले उन्हें नकारने वालों के मुकाबले संख्या में कई गुना ज्यादा हैं. फिर भी कुछ लोग राष्ट्रपिता के बारे में अनाप-शनाप लिख-बोल रहे हैं और गांधी को मानने वाले चुप हैं. यह स्थिति स्पाइरल ऑफ साइलेंस थ्योरीके सच होने की पुष्टि करता है.
इसका परिणाम यही होगा कि गांधी विरोधियों के विचार पब्लिक स्पेस में हावी हो जाएंगे और गांधी को चाहने वाले कुछ बोलने से भी डरने लगेंगे. वह ऐसी स्थिति होगी, जिसके बारे में अभी सोचने से भी डर लगता है. लेकिन सच यही है कि अभी डरेंगे तो आगे बोल नहीं पाएंगे.

पूरा लेख यहां पढ़ें- 
http://www.ichowk.in/society/mahatma-gandhi-is-abused-on-social-media-by-godse-supporters/story/1/8463.html