ichowk.in पर 22 दिसंबर 2017 को प्रकाशित लेख-
उस सुबह पौ फटने के साथ ही यह बात जंगल में लगी
आग की तरह फैल रही थी कि भगवान राम प्रकट हो गए हैं. भक्तगण ‘भये
प्रगट कृपाला’ गाने लगे.
भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी /
हर्षित महतारी मुनि मनहारी अद्भुत रूप विचारी. अयोध्या और
अयोध्या के लोगों के लिए गोस्वामी तुलसीदास की ये चौपाइयां नई नहीं हैं. अयोध्या
के साढ़े आठ हजार छोटे-बड़े मंदिरों, मठों और आश्रमों में करीब चार सौ
वर्षों से हर सुबह इन्हें गाया बजाया जाता है. लेकिन 23 दिसंबर 1949 की सुबह
अयोध्या में इन चौपाइयों के एक अलग ही मायने थे. उस सुबह पौ फटने से पहले से ही यह
बात जंगल में लगी आग की तरह फैल रही थी कि भगवान राम प्रकट हो गए हैं. रघुकुल
कुलभूषण बाल रूप में जन्मभूमि स्थान मंदिर के गर्भ-गृह में पधार चुके हैं और
भक्तगण ‘भये प्रगट कृपाला’ गा रहे हैं.
प्रकट हुए भगवान!
सुबह सात बजे के करीब जब अयोध्या थाने के
एस.एच.ओ. रामदेव दुबे रुटीन जांच के दौरान वहां पहुंचे तब तक प्राकट्य-स्थल के पास
सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी, जो दोपहर तक बढ़कर करीब 5000 तक पहुंच
गई. अयोध्या के आसपास के गांवों में इसकी घोषणा कर दी गई थी. मंदिरों में शंख बजाए
गए थे और श्रद्धालुओं की भीड़ बालरूप में प्रकट हुए कृपालु भगवान के दर्शन के लिए
टूट पड़ी थी. पुलिस और प्रशासन भौंचक्का था.
राम का प्राकट्य किसी आम मंदिर में नहीं हुआ
था. मर्यादा पुरुषोत्तम के बालरूप की मूर्ति उस मस्जिद में प्रकट हुई थी, जिसे
बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था और जिसके बारे में यह कहानी आम थी कि इसे
भगवान राम के प्राचीन मंदिर को तोड़कर बनाया गया था. रख-रखाव की कमी के चलते
दिनोंदिन खंडहर में बदलती जा रही वह मस्जिद उन दिनों सिर्फ शुक्रवार को जुमे की
नमाज के लिए खुलती थी. बाकी दिन उस ओर इक्का-दुक्का लोगों का ही आना-जाना होता था.
उसी मस्जिद की दीवार के बाहरी हिस्से में 21 फुट गुना 17 फुट का एक चबूतरा था,
जिसे
राम चबूतरा के नाम से जाना जाता था. वहां राम के बालरूप की एक मूर्ति विराजमान थी,
जिनके
दर्शन के लिए तब उतने ही लोग जुटते थे जितने अयोध्या के किसी भी दूसरे मंदिर,
मठ
या आश्रम में जुटते थे. लेकिन रामलला के प्राकट्य ने सब कुछ बदल दिया.
मूर्ति पुरानी, कहानी
नई
23 दिसंबर 1949 की सुबह बाबरी मस्जिद के मुख्य
गुंबद के ठीक नीचे वाले कमरे में वही मूर्ति प्रकट हुई थी, जो कई दशकों या
सदियों से राम चबूतरे पर विराजमान थी और जिनके लिए वहीं की सीता रसोई या कौशल्या
रसोई में भोग बनता था. राम चबूतरा और सीता रसोई निर्मोही अखाड़ा के नियंत्रण में
थे और उसी अखाड़े के साधु-संन्यासी वहां पूजा-पाठ आदि विधान करते थे. पूर्व
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने अपनी किताब 'अयोध्याः 6
दिसंबर 1992' में उस एफ.आई.आर. का ब्यौरा दिया है, जो
23 दिसंबर 1949 की सुबह लिखी गई थी। एस.एच.ओ. रामदेव दुबे ने भारतीय दंड संहिता की
धारा 147/448/295 के तहत जो एफ.आई.आर. दर्ज की, उसमें लिखाः
"रात में 50-60 लोग ताला तोड़कर और दीवार फांदकर मस्जिद में घुस गए और वहां
उन्होंने श्री रामचंद्रजी की मूर्ति की स्थापना की. उन्होंने दीवार पर अंदर और
बाहर गेरू और पीले रंग से 'सीताराम' आदि भी लिखा. उस
समय ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबल ने उन्हें ऐसा करने से मना किया लेकिन उन्होंने
उसकी बात नहीं सुनी. वहां तैनात पी.ए.सी. को भी बुलाया गया, लेकिन उस समय तक
वे मंदिर में प्रवेश कर चुके थे."
नायर का फैसला
बात अयोध्या की थी, लेकिन अयोध्या
तक सीमित नहीं रही. यह लखनऊ पहुंची और फिर दिल्ली. सब ओर हड़कंप मच गया. दिल्ली
में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पंडित जवाहर लाल नेहरू थे और गृह मंत्रालय लौहपुरुष
सरदार वल्लभ भाई पटेल के पास था. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ
पंत थे और गृह मंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री.
देश का संविधान तब लागू नहीं हुआ था. संविधान
का धर्मनिरपेक्ष ढांचा भी खड़ा नहीं हुआ था. फिर भी देश चला रहे नेता किसी दुविधा
में नहीं थे. देश और प्रदेश की सरकारों ने यह तय किया कि अयोध्या में जो हुआ,
वह
उचित नहीं हुआ. दोनों समुदायों की परस्पर सहमति से या अदालत के आदेश से विवाद का
हल निकले, यह तो उचित है, लेकिन धोखे से किसी दूसरे समुदाय के
पूजा-स्थल पर कब्जा कर लेना तब की सरकारों को ठीक नहीं लगा. दोनों ही सरकारों ने
तय किया कि अयोध्या में पूर्व स्थिति बहाल की जाए.
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान
सहाय ने फैजाबाद के जिलाधिकारी और उप-आयुक्त के.के.के. नायर को लिखित आदेश दिया कि
अयोध्या में पूर्व स्थिति बहाल की जाए यानि रामलला की मूर्ति को मस्जिद से निकालकर
फिर से राम चबूतरे पर रख दिया जाए. यह आदेश 23 दिसंबर 1949 को ही दोपहर ढाई बजे
नायर तक पहुंचा दिया गया. मुख्य सचिव का आदेश था कि इसके लिए बल प्रयोग भी करना
पड़े तो संकोच न किया जाए. लेकिन के.के.के. नायर ने सरकार का आदेश मानने से मना कर
दिया.
नायर से हारी
सरकार
के.के.के. नायर ने मुख्य सचिव भगवान सहाय को जो
जवाब भेजा उसमें बताया कि 'रामलला की मूर्तियों को गर्भगृह से
निकालकर राम चबूतरे पर ले जाना संभव नहीं है. ऐसा करने से अयोध्या, फैजाबाद
और आसपास के गांवों-कस्बों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है. जिला
प्रशासन के अधिकारियों, यहां तक कि पुलिस वालों की जान की गारंटी भी
नहीं दी जा सकती. नायर ने सरकार को बताया कि अयोध्या में ऐसा पुजारी मिलना असंभव
है जो विधिपूर्वक रामलला की मूर्तियों को गर्भ-गृह से हटाने को तैयार हो और इसके
लिए अपने इहलोक के साथ-साथ परलोक को भी बिगाड़े. ऐसा करने से पुजारी का मोक्ष संकट
में पड़ जाएगा और कोई भी पुजारी ऐसा करने को तैयार नहीं होगा.'
उत्तर प्रदेश की पंत सरकार नायर के तर्कों से
सहमत नहीं हुई. उसने दोबारा आदेश दिया की पुरानी स्थिति बहाल की जाए. जवाब में
के.के.के. नायर ने 27 दिसंबर 1949 को दूसरी चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने इस्तीफे
की पेशकश की. साथ ही सरकार के लिए एक रास्ता भी सुझा दिया. नायर ने सरकार को सलाह
दी कि विस्फोटक हालात को काबू में करने के लिए इस मसले को कोर्ट पर छोड़ा जा सकता
है. कोर्ट का फैसला आने तक विवादित ढांचे के बाहर एक जालीनुमा गेट लगाया जा सकता
है, जहां से श्रद्धालु रामलला के दर्शन तो कर सकें, लेकिन
अंदर प्रवेश ना कर सकें. रामलला की नियमित पूजा और भोग लगाने के लिए नियुक्त
पुजारियों की संख्या तीन से घटाकर एक की जा सकती है और विवादित ढांचे के आसपास
सुरक्षा का घेरा सख्त करके उत्पातियों को वहां फटकने से रोका जा सकता है.
नेहरू और पंत, दोनों ने नायर
का इस्तीफा स्वीकार करने की बजाय उनके सुझावों पर अमल किया. इस तरह रामलला की
मूर्ति बाबरी मस्जिद के ‘गर्भ-गृह’ में रह गई और उस
विवाद के बीज पड़ गए जिसने आगे चलकर देश की राजनीतिक-धार्मिक दिशा बदल दी.
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