भारत
की बढ़ती आबादी को रोकने का फॉर्मूला मिल गया है। यह फॉर्मूला किसी ने खोजा नहीं
है, बस मिल गया है। बहुसंख्यक गरीब आबादी और अति-अल्पसंख्यक धनाढ्य वर्ग पर यह
फॉर्मूला कारगर हो या ना हो, मगर मिडिल क्लास पर यह फॉर्मूला शत-प्रतिशत काम करेगा।
शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है, सफलता सोलह आने पक्की है। यह फॉर्मूला अटल बिहारी
वाजपेयी की सरकार के समय ईजाद हुआ था, लेकिन तब किसी को यह पता नहीं था कि यह
आबादी रोकने का सूत्र है। उस वक्त इसे शिक्षा का स्तर सुधारने का फॉर्मूला बताया
गया था। अब शिक्षा का स्तर सुधरा या बिगड़ा, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन आबादी
रोकने की इसकी क्षमता से कोई इंकार नहीं कर सकता।
देश
का ‘उद्धार’ करने वाला
यह फॉर्मूला कुछ उद्योगपतियों ने तैयार किया था, जिनको वाजपेयी सरकार ने शिक्षा का
स्तर सुधारने के तरीके सुझाने का काम सौंपा था। इस कमेटी में कई उद्योगपति और
कारोबारी थे लेकिन इसे नाम मिला था बिड़ला-अंबानी कमेटी। इस कमेटी ने सुझाव दिया
था कि शिक्षा का स्तर सुधारने और उसे रोजगारपरक (जॉब ओरिएंटेड) बनाने के लिए जरूरी
है कि निजी क्षेत्र को इसमें आने के ज्यादा मौके दिए जाएं और हायर एजुकेशन को
स्ववित्त-पोषित (सेल्फ फायनैंस्ड) बनाया जाए। यानी जो पढ़े, वही पैसे खर्च करे।
सरकार उनका बोझ ना उठाए।
सरकार
ने बिड़ला-अंबानी कमेटी की रिपोर्ट पर बिना बताए अमल शुरू किया। स्कूल-कॉलेजों को
मिलने वाला पैसा कम हुआ तो वहां होने वाली पढ़ाई का स्तर गिरा। इसका सीधा फायदा
प्राइवेट स्कूलों को हुआ। बिड़ला-अंबानी कमेटी की रिपोर्ट से पहले भी इस देश में
प्राइवेट प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूल थे, जिनका सबसे बड़ा आकर्षण था अंग्रेजी की
और अंग्रेजी में शिक्षा देना। अंग्रेजी के आकर्षण में ही बंधकर मिडिल क्लास इन स्कूलों
की तरफ रुख कर रहा था। बदले हुए हालात में इसमें जबरदस्त तेजी आई। यही वह समय था
जब बड़े व्यापारिक घराने स्कूल खोलने लगे। शिक्षा का स्तर उठाने के सामाजिक कार्य
का हवाला देकर उन्होंने सरकार से सस्ती जमीन हासिल कर ली और दुकान सजाकर बैठ गए।
अब
उद्योगपतियों और कारोबारियों के ही संगठन एसोचैम ने कहा है कि पिछले 10 साल में निजी
स्कूलों की फीस 150 प्रतिशत बढ़ गई है। किसी औसत प्राइवेट स्कूल में 2005 में एक
बच्चे को पढ़ाने का सालाना खर्च 55 हजार रुपये के करीब था, जो अब बढ़कर सवा लाख रुपये तक पहुंच गया है। अगर स्कूल ड्रेस, जूते, बैग-बोतल, स्पोर्ट्स
किट, बस भाड़ा, ट्यूशन-कोचिंग के खर्च को भी इसमें जोड़ दें तो यह रकम डेढ़ लाख से
दो लाख रुपये के बीच बैठती है। एसोचैम के सोशल डेवलेपमेंट
फाउंडेशन ने देश
के 10 बड़े
शहरों में सर्वे कराने के बाद यह रिपोर्ट बनाई है। रिपोर्ट के मुताबिक
सरकारी
स्कूलों में शिक्षा के गिरते स्तर के चलते मां-बाप अपने बच्चों को निजी स्कूलों
में पढ़ाने को मजबूर हैं। फीस के बढ़ते बोझ को उठाने के लिए उन्होंने
घूमना-फिरना कम
कर दिया है। वे घर से बाहर खाना भी कम खा रहे हैं। यहां तक कि वे घर की मरम्मत भी ठीक से नहीं करा पा रहे। लेकिन
बच्चों की स्कूल फीस जरूर भर रहे हैं।
अब तो आप समझ ही
गए होंगे आबादी रोकने का फॉर्मूला क्या है। अरे भाई, जब एक बच्चे को पढ़ाने में ही
हर साल डेढ़-दो लाख रुपये खर्च होंगे तो भला कोई दूसरा पैदा ही क्यों करेगा? लेकिन याद रखें कि यह फॉर्मूला सिर्फ मिडिल क्लास पर
लागू होता है। जो प्राइवेट स्कूलों की फीस भर ही नहीं सकते, उस गरीब आबादी पर इससे
कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्कूल फीस कितनी बढ़ रही है और जिनके लिए खर्च के बारे में
टेंशन लेना फिजूल का काम है, उस धनाढ्य वर्ग पर भी यह फॉर्मूला नहीं चलेगा।




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