सोमवार, 11 मई 2015

आओ दाऊद! मुकदमा लड़ लो!

पहले छह घंटे की बात कर लें, फिर छह दिनों की बात करेंगे। आज दिन में 11 बजकर 20 मिनट पर माननीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह लोकसभा में दहाड़ रहे थे, 'दाऊद इब्राहिम को पकड़कर जब तक भारत नहीं ले आएंगे, तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे। हमारे पास पुख्ता सूचना है कि दाऊद पाकिस्तान में ही है। हमने पड़ोसी देश को सबूत भी मुहैया कराए हैं। अब पाकिस्तान उसे ढूंढे और भारत भेजने की कानूनी प्रक्रिया शुरू करे।' राजनाथ सिंह के बयान के ठीक छह घंटे बाद यानी शाम को 5 बजकर 20 मिनट पर भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने सफाई दी, 'मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि वो साहब (दाऊद) पाकिस्तान में नहीं हैं।' अब्दुल बासित ने यह बयान लखनऊ में दिया, जो संयोग से राजनाथ सिंह का चुनाव क्षेत्र भी है।

1993 के बॉम्बे बम धमाकों के मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम को लेकर भारत और पाकिस्तान की सरकारों की यह जुबानी तल्खी कई बार दिख चुकी है। हर बार भारत सरकार यह कहती है कि दाऊद पाकिस्तान में है। आईएसआई उसकी हिफाजत कर रही है। वह ड्रग्स और रियल इस्टेट का धंधा कर रहा है और मुंबई में अपने शार्प शूटर्स का डर दिखाकर अवैध वसूली करता है। हर बार पाकिस्तान की ओर से यह टका-सा जवाब मिलता है कि दाऊद पाकिस्तान में नहीं है।

कहते हैं कि दाऊद को भारतीय खुफिया एजेंसियों, खासकर रॉ का डर सताता रहता है कि कहीं उसका एनकाउंटर ना हो जाए। अभी हाल ही में सीबीआई के दो पूर्व अधिकारियों ने दावा किया था कि दाऊद एक बार सरेंडर करने की भी सोच रहा था, लेकिन फिर उसने इरादा बदल दिया। दाऊद के बारे में जानने का दावा करने वाले तो बहुत हैं। लेकिन पक्के तौर पर कोई यह नहीं बता सकता कि दाऊद आजकल किसके प्रभाव में है, उसके सलाहकार कौन हैं और क्या वह आईएसआई का बंधक है या फिर अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। अगर दाऊद आजाद है तो यकीन मानिए, भारतीय मीडिया में छपने और दिखने वाली खबरों पर उसकी नज़र जरूर रहती होगी। यदि यह कल्पना सही है तो पिछले छह दिनों में उसने फिर से सरेंडर के बारे में सोचना शुरू कर दिया होगा।

पिछले छह दिनों में आखिर हुआ क्या है? छह मई 2015 को मुंबई की एक अदालत ने हिंदी सिनेमा के 'भाई' सलमान खान को हिट एंड रन केस में मुजरिम ठहराया और उसी दिन उन्हें पांच साल बामशक्कत कैद की सज़ा सुना दी। कोर्ट के इस फैसले को इंसाफ की जीत, कानून की जीत, आम आदमी की जीत और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया। सेशंस कोर्ट के जज को इंसाफ का देवता करार दे दिया गया। लेकिन शाम होते-होते ऊपरी अदालत में सलमान को दो दिन के लिए अंतरिम जमानत मिल गई। तब पता चला कि 13 साल तक जो मुकदमा चला है और जो फैसला दिया गया है, उसमें कुछ छेद भी है। अब कानून के बड़े मंदिर में छोटे मंदिरों से निकला कोई छिद्रदार फैसला टिक नहीं सकता, इसलिए दो दिन बाद यानी आठ मई को सलमान खान को नियमित जमानत मिल गई और हाई कोर्ट का निर्णय आने तक सेशंस कोर्ट से मिली सज़ा पर रोक लग गई।

आज यानी 11 मई 2015 एक और बड़े मुकदमे में न्याय हुआ। आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता बरी हो गईं। जयललिता के पास उनकी आमदनी से 65 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति मिली थी। वे अपनी हजारों साड़ियों और सैंडिलों का हिसाब नहीं दे पाई थीं। निचली अदालत ने अम्मा को उनकी सहेली शशिकला के साथ मुजरिम ठहराया था और चार साल क़ैद की सज़ा भी सुनाई थी। जयललिता मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और अपने भक्त पन्नीरसेल्वम के हाथ में सत्ता सौंपने को मजबूर होना पड़ा था। लेकिन कानून के ऊंचे मंदिर में निचली अदालत का फैसला नहीं टिका। जयललिता बाइज्जत बरी हो गईं। 65 करोड़ कहां से आए, इसका हिसाब नहीं मिला तो यह अम्मा की गलती नहीं है! गलती अभियोजन पक्ष की है, क्योंकि वह गलत तरीके से पैसे जमा करने के सबूत नहीं दे पाया! यानी अम्मा नेता बनने से पहले महान थीं। भ्रष्टाचार के दौर में भी महान थीं और कोर्ट से बरी होने के बाद अति महान हो गई हैं। अब वे फिर से मुख्यमंत्री बनेंगी। उनके शपथ ग्रहण की तारीख भी तय हो चुकी है।

न्याय के मंदिर में आज ही एक और फैसला हुआ, हालांकि उसे ज्यादा चर्चा नहीं मिली। अपनी ही बनाई कंपनी सत्यम में तीन हजार करोड़ से भी ज्यादा के घोटाले के आरोपी रामलिंगा राजू को जमानत मिल गई। हैदराबाद मेट्रोपोलिटन सेशंस कोर्ट ने राजू को निचली अदालत से मिली सात साल की सज़ा को भी सस्पेंड कर दिया। कंपनी के खातों में हेराफेरी करके लाखों निवेशकों की जेब खाली करने वाले राजू सिर्फ एक लाख रुपये का मुचलका भरकर बाहर आ रहे हैं।
भारतीय अदालतों के ये सारे फैसले देखकर दाऊद क्या सोच रहा होगा? यकीनन यही कि अगर मैं भी मुकदमा लड़ूं, खुद को पुलिस का मारा बताऊं, अच्छा और पहुंच वाला वकील करू लूं तो सारे आरोपों से बरी हो सकता हूं। गुजरात के नरोदा पटिया दंगा केस में 26 साल की सज़ा पाने वाली पूर्व मंत्री माया कोडनानी को यदि जमानत मिल सकती है और 70 से ज्यादा हत्याओं का आरोपी बाबू बजरंगी अगर आजाद हो सकता है तो दाऊद क्यों नहीं? किसी अदालत में अब तक उसका जुर्म साबित नहीं हुआ है। और ये तो हमारे नेता भी कहते हैं कि जब तक आरोप साबित ना हों, वह कानून की नज़र में सिर्फ आरोपी रहता है, मुजरिम नहीं।

अब जब न्याय के मंदिर में सलमान, जयललिता और राजू के खिलाफ सबूतों के धुर्रे उड़ गए तो दाऊद क्या चीज है।

 

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