रविवार, 10 मई 2015

हम सब चोर हैं

दूसरों को चोर कहना आसान है, लेकिन खुद को चोर कहने के लिए हिम्मत चाहिए। और सबको चोर कहने के लिए तो और बड़े जिगरे की जरूरत है। पता नहीं कौन कब मानहानि का आरोप लगाकर मुकदमा ठोक दे। अब कहां-कहां साबित करते फिरेंगे कि हां तुम चोर हो। फलां भी चोर है और चिलां भी चोरी करता है। फिर भी मैं यह कहने का खतरा उठा रहा हूं कि हम सब चोर हैं। हम कुछ ना कुछ चुराते ही रहते हैं।

चोर कहलाने के लिए कुछ चुराना आवश्यक है। अब यह जरूरी नहीं कि जिसकी चोरी हुई हो, वह कोई कीमती वस्तु जैसे रुपये, गहने-जेवर, कोई घड़ी या इलेक्ट्रॉनिक सामान ही हो। वह दोस्त की कलम भी हो सकती है, जिसे लौटाने का दिल ना करे। वह किसी लाइब्रेरी की किताब भी हो सकती है, जिसे लौटाने का इरादा ना बने। वह कोई मिठाई भी हो सकती है, जो मां या पत्नी को बिना बताए चुपचाप निकालकर खा ली जाए। ये भी जरूरी नहीं कि जो चोरी की गई हो, वह कोई वस्तु ही हो। वह विचार भी हो सकता है। वह किसी गाने की धुन भी हो सकती है। किसी कविता की पंक्ति भी हो सकती है। किसी उपन्यास का प्लॉट भी हो सकता है। किसी बिजनेस का आइडिया भी हो सकता है।
मैं जिस पेशे में हैं, उसमें खबरों की चोरी बहुत होती है। और खबरों की चोरी से भी ज्यादा होती है क्रेडिट की चोरी। मतलब किसी और खबर को अपना बनाकर बेच लेने की हेराफेरी, किसी और के विचारों को अपना आइडिया बनाकर पेश कर देने की चोरी। और ऐसा सिर्फ हमारे पेशे में नहीं होता। बॉलीवुड, हॉलीवुड, म्यूजिक इंडस्ट्री हर जगह ऐसा ही होता है। सियासतदां लोग मुद्दों की चोरी करने में मशगूल रहते हैं। सरकारी खजाने में सेंध लगाने की हैसियत तक पहुंचने से पहले वे मुद्दे चुराते हैं। दूसरी पार्टियों के मुद्दे कैसे अपनी झोली में आ जाएं, इस चिंता में वे दुबले हुए जाते हैं। सरकारी अफसरों की चोरी के कहने ही क्या? जितना बखान किया जाए, उतना कम है।
जमीन की चोरी सार्वकालिक और सार्वभौमिक है। किसान भाई मेड़ (कगार या पगडंडी) की मिट्टी एक ओर से काटकर दूसरी ओर करने की हेराफेरी करके खेत की चोरी करते हैं। वैसे इस तरीके से हर साल दो चार इंच जमीन ही चुराई जा सकती है, लेकिन बार-बार यही प्रक्रिया दुहराने पर कुछ सालों में कई बीघे खेत 'गायब' हो जाते हैं। फसल की चोरी इसके सामने बड़ी मामूली लगती है। जमीन की चोरी सिर्फ गांवों में नहीं होती। शहर की जमीन ज्यादा कीमती होती है, इसलिए यहां उसकी चोरी भी ज्यादा शातिर तरीके से होती है। सरकारी जमीन को चुराना आसान होता है, निजी मिल्कियत को चुराना मुश्किल। लेकिन तहसीलदार, ग्रामसेवक और बिल्डर जैसे चोर एक साथ मिल जाएं तो किसी भी जमीन को चुरा सकते हैं।
आम तौर पर देखा गया है कि जो व्यक्ति जिस पेशे में होता है, उसी के अनुसार चोरी करता है। जैसे- पेट्रोल पंप वाला पेट्रोल-डीजल की चोरी करता है। मोबाइल कंपनी वाला टॉक टाइम में हेराफेरी करता है। बैंक वाला आपके खाते में आने वाली रकम में कटौती की तरकीबें भिड़ाता है। बिल्डर सीमेंट और सरिया चुरा लेता है। किराने वाला तौल में चोरी करता है। चाय बेचने वाला आपके कप में चाय की मात्रा में गड़बड़ी करता है।
जो गबन नहीं करते, घोटाला नहीं करते, दूसरे की जमीन नहीं चुराते, फसल नहीं चुराते, दोस्त की कलम, लाइब्रेरी की किताब, दूसरों के विचार, गाने की धुन, कविता की पंक्ति या उपन्यास का प्लॉट नहीं चुराते, वे भी टैक्स चुराते हैं। इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स या सर्विस टैक्स की चोरी करना ही टैक्स चोरी नहीं है। पान खाकर या चाय पीकर उसका बिल ना लेना भी सरकार की नजरों में चोरी है, क्योंकि बिल न लेने से सरकार को उस पर वैट नहीं मिलता। फायदा बेशक दुकानदार का होता है, लेकिन टैक्स चोरी में खरीदार भी शामिल होता है।

इनके अलावा कुछ और चोरियां भी हैं। जरा गौर फरमाइए- दिल चुराना, नज़रें चुराना, देह चुराना और काम चोरी करना। ये मुहावरे बने ही इसलिए हैं क्योंकि सदियों से ऐसी चोरियां हो रही है। जो दिल नहीं चुराते, वे कम से कम नज़रें तो चुराते ही हैं। और देह चुराना या काम चोरी करना तो इंसान की फितरत ही है। इसलिए शर्म मत कीजिए। गर्व से कहिए। हम सब चोर हैं।

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