सत्ता के सबसे बड़े केंद्र यानी व्हाइट हाउस के वॉर रूम में अपने सलाहकारों और
अमेरिकी सेना के बड़े अधिकारियों के साथ बैठे राष्ट्रपति बराक ओबामा की यह तस्वीर
तो याद ही होगी। इसे भुलाया भी कैसे जा सकता है? अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ओबामा के अब तक के कार्यकाल
का सबसे महत्वपूर्ण पल यही तो था। वे दूसरी बार राष्ट्रपति बने तो उसमें भी इस
तस्वीर का बड़ा योगदान था। तस्वीर 2 मई 2011 की है, जब अमेरिकी नौसेना के एलीट सील
कमांडो पाकिस्तान के एबटाबाद में अल-क़ायदा के चीफ ओसामा बिन लादेन को खत्म करने
का ऑपरेशन करने निकले थे। ऑपरेशन खत्म होने और ओसामा की मौत की पुष्टि होते ही
ओबामा ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया था, जिसमें उन्होंने यह एलान किया था कि सील
का ऑपरेशन नेप्च्यून स्पियर मिशन उम्मीद से ज्यादा कामयाब रहा। सील कमांडो के दल
ने पाकिस्तान में छिपकर बैठे अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन को मार गिराया और किसी
सील को खरोंच तक नहीं आई। ओबामा ने यह भी बड़े ही गर्व से बताया था कि इस ऑपरेशन
की जानकारी पाकिस्तान को नहीं थी। उसके आर्मी चीफ जनरल अशफाक कयानी और आईएसआई के सरगना
जनरल शुजा पाशा को भी नहीं। अमेरिका का दावा था कि उसने पाकिस्तान के साथ युद्ध का
खतरा उठाकर भी लादेन को मारा, क्योंकि लादेन उसका दुश्मन था और उसे मारने के लिए
अमेरिका किसी और देश की इजाजत का मोहताज नहीं।
लादेन का खात्मा
होते ही तरह-तरह की कहानियां गढ़ी गईं। सील कमांडोज़ की वीरता की गाथाएं लिखी गईं।
उनकी ट्रेनिंग के तरीके और घातक प्रहार क्षमता का ऐसे बखान किया गया मानो 21वीं
सदी के चंदवरदाई नये सिरे से पृथ्वीराजरासो लिख रहे हों। लादेन को खत्म करने के
ऑपरेशन में किसी सील कमांडो का न मारा जाना इन कहानियों के लिए खाद-पानी का काम करता
रहा। अब चार साल बाद अमेरिका के ही एक पत्रकार ने ओबामा के दावों, अमेरिकी सरकार
के झूठ और सील कमांडो की वीर गाथाओं की धज्जियां उड़ा दी हैं। सेमोर एम. हर्स नाम
के इस खोजी पत्रकार ने ‘लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स’ में अपनी रिपोर्ट लिखी है, साथ ही पाकिस्तान के नामी अखबार ‘डॉन’ को इंटरव्यू दिया है। हर्स ने सिलसिलेवार तरीके से बताया है कि लादेन को
अमेरिका ने खुद नहीं खोजा था, बल्कि पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई के
एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमेरिका के साथ सौदा किया था। आईएसआई ने 2006 से ही लादेन को
बंधक बनाकर रखा था। उसकी मर्जी के बिना लादेन कहीं आ-जा नहीं सकता था। आईएसआई के
उस वरिष्ठ अधिकारी ने लादेन के सिर पर रखे ढाई करोड़ डॉलर के इनाम के लिए अमेरिका
को उसका ठिकाना बता दिया। अमेरिका ने सैटेलाइट के जरिये लादेन के ठिकाने पर नज़र
रखना शुरू कर दिया और पुष्टि होते ही उसके खात्मे का प्लान बना लिया गया।
सेमोर एम. हर्स की
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी प्लान में सील का साहस कम और सरकार की चतुराई ज्यादा
थी। अमेरिका ने पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल अशफाक कियानी और आईएसआई के चीफ जनरल
शुजा पाशा, दोनों को शीशे में उतार लिया। कियानी और पाशा को धमकी भी दी गई और लालच
भी दिया गया। दोनों जब अमेरिकी प्लान पर राजी हो गए, तब उन्होंने गुजारिश की कि लादेन
के मिलते ही अमेरिका उसे मार डाले, जिससे इस प्लान में पाकिस्तान के शामिल होने का
कोई सबूत ना बचे। रिपोर्ट के मुताबिक सील कमांडो का हेलीकॉप्टर जब अफगानिस्तान की ओर
से पाकिस्तान में दाखिल हुआ, तब तक लादेन की हिफाजत करने वाले सारे तंत्र हटा लिए
गए थे। 2001 में वर्ल्ड ट्रेड टावर ध्वस्त करके अमेरिका को चुनौती देने वाला ओसामा
बिन लादेन 2006 से ही पंगु था। सील कमांडो जब उसके पास पहुंचे, तब तक वह मांस के
लोथड़े से ज्यादा कुछ नहीं रह गया था। यानी लादेन को मारने में सील कमांडोज़ की
कोई बहादुरी नहीं थी। उन्होंने तो एक ऐसे व्यक्ति को मारा था, जो नख-दंत विहीन हो
चुका था और जिसे मारने या ना मारने से अमेरिकी सुरक्षा को कोई फर्क नहीं पड़ने
वाला था।
ओबामा ने लादेन के
एनकाउंटर को ऐसे प्रचारित किया मानो सैम बहादुर की एलीट फ़ौज़ ने बड़ी जंग जीत ली
हो। पाकिस्तान की सेना और आईएसआई लादेन को अमेरिकी हाथों में सौंपने से पहले यह
चाहती थी कि अमेरिका उसके अफगानिस्तान में मिलने की बात प्रचारित करे, जिससे उनकी
बदनामी ना हो। लेकिन राष्ट्र के नाम संदेश में ओबामा ने उस वादे को नहीं निभाया।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो कहानी सुनाई, उसने पाकिस्तान की इमेज को चौपट कर दिया और
सील कमांडोज़ को हीरो बना दिया। जबकि हकीकत ऐसी नहीं थी। व्हाइट हाउस ने इस
रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। पाकिस्तान की फ़ौज़ ने भी इसे कोरी गप कहा है। सोचने
की बात है कि वे इससे अलग और कह क्या सकते थे।


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