जींस-टीशर्ट में लीडरों वाली बात है
क्या? नहीं। माथे पर त्रिपुंड
लगाने से कोई नेता कहला सकता है क्या? बिल्कुल नहीं। रेलवे के दूसरे दर्ज या
जनरल बोगी में
सफ़र करने से कोई चहेता बन सकता है क्या? कतई नहीं। लेकिन कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ऐसे ही
टोटकों की पैकेजिंग करके जनता का दिल जीतने निकले हैं। वे भारत की सबसे पुरानी
पार्टी को हार के पार पहुंचाने चले हैं। राहुल के इस अभियान की सफलता अभी तय नहीं
है। जनता इन तरीकों को छलावा मानेगी या राहुल बाबा को गले से लगा लेगी,
यह पता लगने
में अभी वक्त है। कम से कम एक चुनाव तक तो इंतजार करना ही चाहिए। लेकिन सत्ता में
बैठी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के चेहरों पर चिंता की लकीरें बनने लगी हैं।
उनके बयानों में तल्खी झलकने लगी है और राहुल पर लगने वाले आरोपों के नश्तर तीखे
हो चले हैं। कहीं यह इस बात का संकेत तो नहीं कि राहुल सचमुच कामयाब होने जा रहे
हैं?
कुछ समय पहले तक भारतीय जनता पार्टी
के नेता राहुल का मजाक उड़ाया करते थे। चौदह के लोकसभा चुनाव से पहले उनके लिए ‘पप्पू’ का उपनाम ईजाद कर लिया गया था। राहुल के बारे में
भाजपा के नेता जब भी कुछ बोलने को होते, तब उनकी इसी छवि के
इर्द-गिर्द बयानों के जाल बुने जाते। वैसे यह छवि बनाने में राहुल ने भी कम योगदान
नहीं दिया। अहम मौकों पर गायब हो जाना और अचानक प्रकट होकर लगाम खींचने की कोशिश
करना उल्टा पड़ता रहा और कांग्रेस का युवराज आम चुनावों में सचमुच ‘पप्पू’ साबित हो गया। 2014 के
लोकसभा चुनाव
के बाद कांग्रेस जिस भी चुनाव में उतरी, उसे हार का मुंह देखना
पड़ा। सबसे हाल में हुए दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस सिफर पर सिमट गई तो पार्टी
में कुछ दिनों के लिए सन्नाटा पसर गया। इस सन्नाटे को सवालों ने तोड़ा। कांग्रेस
(ई) के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब पार्टी के अंदर नेहरू-गांधी खानदान के
नेतृत्व पर सवाल उठे। कांग्रेस के कई नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर युवराज की
योग्यता पर संदेह जता दिया और उनकी मां सोनिया के हाथ में ही पार्टी की कमान रहने
देने की वकालत करने लगे।
कांग्रेस नेतृत्व जब मां-बेटे के
द्वंद्व में फंसा दिख रहा था, तभी राहुल बाबा छुट्टी पर चले गए,
बिना बताए।
उत्तर भारत के आम घरों से कोई युवक जब इस तरह घर से निकल जाता है तो उसे घर से
भागना कहते हैं। भाजपा नेताओं ने राहुल को भी 'भगोड़ा' का तमगा दिया। लेकिन कांग्रेस के लिए यह राहुल का भागना नहीं था,
बल्कि चिंतन
में जाना था। उनसठ दिनों तक किसी को पता नहीं था कि वे कहां हैं। कुछ लोगों ने
उनके विपश्यना शिविर में जाने की बात उड़ाई तो किसी ने उत्तराखंड के पहाड़ों पर
ध्यान-मनन करने का दावा किया। खैर राहुल लौटे तो पता चला कि वे बैंकॉक से दिल्ली
आने वाली फ्लाइट से आए हैं। भाजपा ने इसका भी मजाक बनाया। मगर घर वापसी के बाद से राहुल बिल्कुल
बदले-बदले से नज़र
आ रहे हैं।
दिल्ली में हुई किसान रैली में उनका
अंदाज़ भले ही फीका रहा, लेकिन संसद में 'सूट-बूट वाली सरकार' का जुमला सुपरहिट हो गया। सरकार कुछ समझ पाती और उससे पहले
ही राहुल बम-बम भोले कहते हुए बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए निकल पड़े। उत्तराखंड
में बर्फ से ढंके पहाड़ों और टूटे-फूटे रास्तों पर जींस-टीशर्ट पहनकर पैदल चलते
हुए राहुल को देखने के लिए देश भर का मीडिया उमड़ पड़ा। राहुल की उत्तराखंड यात्रा
ने कांग्रेस को हॉर्लिक्स, बॉर्नबीटा, बूस्ट, कॉम्प्लान सब दे दिया। केदारनाथ की 'आग जैसी शक्ति' को महसूस करके राहुल दिल्ली लौटे और बिना कोई देरी किए
किसानों का हाल-चाल जानने निकल पड़े।
पंजाब जाने के लिए उन्होंने
ट्रेन पकड़ी और सेकेंड क्लास के एक कोच में सफर किया। दिल्ली लौटकर उन्होंने सरकार
को 'कॉरपोरेट सरकार' का तमगा थमा दिया। अगले ही दिन वे महाराष्ट्र के
अमरावती पहुंच गए, 15 किलोमीटर पैदल चले और गांव-गांव जाकर उन किसान परिवारों से
मिल आए, जिनके घर का कोई ना कोई सदस्य आत्महत्या कर चुका है। दिल्ली में राहुल
मिडिल क्लास के उन परिवारों से भी मिल चुके हैं, जिन्होंने दिल्ली-एनसीआर में
फ्लैट बुक कराया है, लेकिन सालों बीत जाने पर भी बिल्डर उन्हें फ्लैट की चाबी नहीं
दे रहा।
राहुल के इस अंदाज़ से विरोधी पार्टियों
के नेता हक्के-बक्के हैं। उनकी अपनी पार्टी के नेता भी कम हैरान नहीं। समझ नहीं आ
रहा कि ‘राहुल
को हो क्या गया है’? वे कौन-सा
एनर्जी ड्रिंक पीकर लौटे हैं? एक प्रश्न यह
भी उठ रहा है कब तक? राहुल आखिर कब
तक इसी तरह हाइपर एक्टिव रहेंगे? अभी तो मोदी
सरकार का पहला साल ही पूरा हो रहा है। अभी दिल्ली के चुनाव में चार साल का वक्त
है। कांग्रेस की वापसी कराने के लिए राहुल को कम से कम 4 साल का इंतजार तो करना ही
होगा। इस बीच कहीं वे फिर चिंतन में चले गए तो?
राहुल सोशल मीडिया के दुलारे
नेता हैं। 'पप्पू' को पॉपुलर करने में ट्विटर, फेसबुक और वॉट्सएप का
बड़ा योगदान रहा है। राहुल का दूसरा अवतार या राहुल2.0 भी सोशल मीडिया पर छाया हुआ
है। उन्हें जितना फुटेज टीवी पर मिल रहा है, उससे ज्यादा लाइक, कमेंट, फॉरवर्ड और
रीट्वीट उन्हें फेसबुक, वॉट्सएप और ट्विटर पर मिल रहे हैं। ये बात और है कि यहां राहुल
की तारीफ कम हो रही है, मजाक ज्यादा उड़ाया जा रहा है। राहुल दिल्ली में नेपाल के
दूतावास गए और भूकंप पीड़ितों के लिए संवेदना संदेश लिखा तो ट्विटर पर 'खबर' फैल गई कि राहुल
अपने मोबाइल फोन से मैसेज कॉपी कर रहे थे। एक तस्वीर के सहारे पप्पूकान्टराइटसाला
हैश-टैग पॉपुलर कर दिया गया। इसी तरह राहुल ने केदारनाथ मंदिर में 'आग जैसी शक्ति' महसूस की तो वॉट्सएप पर ये खबर फैल गई कि 'उल्लू' आरती की थाल पर ही बैठ गया था।
इसे नाकामी कहें या कामयाबी? राहुल अपनी कांस्टीट्यूंसी को टारगेट कर रहे हैं। वे किसानों से मिल रहे हैं।
गरीबों की बात कर रहे हैं। उग्र हिंदुत्व की जगह नरम हिंदुत्व की लीक बना रहे हैं।
कांग्रेस का प्रचार विभाग उनकी तस्वीरों को प्रचारित कर रहा है। बड़ी ही सावधानी
से उनके लिए मुद्दे तलाशे जा रहे हैं। केदार घाटी की पैदल यात्रा भी मोदी सरकार पर
हमले की इसी नियोजित रणनीति का हिस्सा है। लेकिन क्या यह सब राहुल के अकेले की बात
है? या फिर राहुल के
लिए कोई नया जुमलेबाज़, कोई नया रणनीतिकार खोजा गया है? 2014 के चुनाव में कांग्रेस ने दिलीप चेरियन को राहुल के
लिए जुमले बनाने का जिम्मा दिया था। उस चुनाव में मोदी के लिए यही काम पीयूष पांडे
कर रहे थे। चुनाव नतीजे आए तो भाजपा के साथ पीयूष पांडे जीत गए थे और कांग्रेस के
साथ दिलीप चेरियन हार गए। तो क्या अब यही काम किसी नए जुमलेबाज़ को दिया गया है,
जो मीडिया की नज़रें बचाकर राहुल के लिए रणनीति बना रहा है। तो फिलहाल सवाल यह नहीं
है कि 'पप्पू' पास होगा या नहीं? यह तो 4 साल बाद पता चलेगा। फिलहाल सवाल यह है कि क्या राहुल
59 दिनों तक चिंतन कर रहे थे या नई सोशल कैंपेनिंग की ट्रेनिंग ले रहे थे?



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