'बम' यहां बम नहीं। 'एटम बम' एटम बम नहीं। 'पासपोर्ट' पासपोर्ट नहीं और 'कुंजी' यहां चाबी नहीं। ये सब परीक्षा पास करने और कराने की तरकीबें
हैं। अगर आप इनसे अनजान हैं तो तय है कि आप कभी बिहार नहीं गए। मैट्रिक माने 10वीं और इंटरमीडिएट याने 12वीं की परीक्षाओं में अपने
बच्चों को नकल कराते हुए अभिभावकों की तस्वीर तो आपने जरूर देखी होगी। नकल कराने
के लिए छज्जियों के सहारे चौथी मंजिल तक चढ़ गए अभिभावकों की तस्वीर ने तो अमेरिका
तक नाम कमा लिया है।
माता
शत्रुः पिता वैरी, बालो येन न
पाठितः।
न
शोभते सभामध्ये, हंसमध्ये बको
यथा॥
अर्थात् जो अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, ऐसे मां-बाप शत्रु के समान होते हैं। क्योंकि जिस तरह हंसों के बीच बगुले की शोभा नहीं होती, उसी
तरह विद्वानों की सभा में अनपढ़ लोगों की पूछ नहीं होती। यह राजनीतिशास्त्र के
प्रकांड विद्वान आचार्य चाणक्य ने लिखा था। अब बिहार के लोग किसी की बात को तवज्जो
दे या ना दें, चाणक्य की बातों पर जरूर ध्यान देते हैं। आखिर हर कोई यहां चाणक्य
ही तो बनना चाहता है। इसीलिए बेटा-बेटी ही नहीं, भतीजा-भतीजी, भानजा-भानजी, चचेरा-ममेरा-फुफेरा भाई,
चचेरी-ममेरी-फुफेरी बहन,
दोस्त के भाई, दोस्त की बहन, इनके अलावा जितनी भी रिश्तेदारियां हो सकती हैं, उन
सबको परीक्षा पास कराने के लिए वे हर खतरा उठाने को तैयार रहते हैं।
लेकिन बिहार की पूरी तस्वीर सिर्फ इतनी नहीं है। मुकम्मल तस्वीर को समझने के
लिए कुछ और शब्दों से रूबरू होना जरूरी है। ट्यूशन, कोचिंग, गेस-पेपर, क्वेश्चन बैंक, होम
सेंटर, पर्ची और पैरवी को नहीं जानेंगे तो बिहार के
शिक्षा-तंत्र को कैसे समझेंगे? एक समय था जब
बिहार के छात्रों को औसत से बेहतर माना जाता था। उनकी अंग्रेजी भले ही अप-टू-डेट ना हो, लेकिन गणित और भूगोल जैसे विषयों पर उनकी
पकड़ अच्छी मानी जाती थी। वैसे आज भी सिविल सर्विसेज और बाकी परीक्षाओं में बिहार
के छात्र अपने लिए जगह बना ही लेते हैं, लेकिन बुनियादी स्तर
पर तस्वीर इतनी धुंधली हो चली है कि सब कुछ मटमैला ही दिखता है। सरकारी प्राइमरी
और मिडिल स्कूलों में पढ़ाई शिक्षा-मित्रों के हवाले है, जिनकी
पहली चिंता समय पर वेतन मिलने या ना मिलने से जुड़ी रहती है। सरकारी स्कूलों में
हर रोज होने वाला सबसे महत्वपूर्ण काम मिड-डे मील तैयार करना
और समय पर उन्हें परोसने का है। इसके ना रहने पर न तो स्कूल में दाखिले का कोटा
पूरा हो पाता है, न हाजिरी पूरी हो पाती है।
गरीब और दलित बच्चों के साथ अपने बच्चों को बिठाकर खाना
खिलाने से बचने के लिए तथाकथित सवर्ण अभिभावक अपने लाडले और लाडलियों को सरकारी
स्कूलों से निकालकर प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिला देते हैं, जो
यहां के गांव-शहर की गली-गली में खुल चुके हैं। पढ़ाई इन
प्राइवेट, पब्लिक और तथाकथित कॉन्वेंट स्कूलों में भी नहीं
होती। इसीलिए बिहार में ट्यूशन और कोचिंग के धंधे की नींव पड़ी। सरकारी-प्राइवेट
स्कूलों के जो शिक्षक स्कूल में उंघते रहते हैं, वही शिक्षक ट्यूशन
और कोचिंग पढ़ाते समय चुस्त-दुरुस्त दिखते हैं। जो बच्चे
स्कूल जाने में कतराते हैं, वे भी इन कोचिंग सेंटरों के छोटे-छोटे कमरों में बैठने के लिए धक्का-मुक्की करते हैं। इससे आप ये ना समझ
लें कि यहां पढ़ाई के लिए मार मची होती है। असल में बिहार के कोचिंग सेंटर इसलिए
पॉपुलर हैं क्योंकि साल के अंत में परीक्षा के समय वे क्वेश्चन गेस करते हैं। यानी
ये बताते हैं कि इस बार परीक्षा में कौन-कौन से सवाल आएंगे। यानी पूरा कोर्स पढ़ने
की भी जरूरत नहीं है, बस 5 या 6 सवालों के उत्तर जान लो और बेड़ा पार। जिन्हें उन
5-6 सवालों के भी जवाब नहीं पता, उनके लिए हाजिर है कुंजी, पासपोर्ट, गेस-पेपर और
एटम बम।
कुंजी माने हर मुश्किल ताले की चाबी यानी हर सवाल का जवाब।
पासपोर्ट माने परीक्षा की सीमारेखा पार कराने वाला डॉक्यूमेंट। गेस पेपर मतलब
चुनिंदा सवालों के जवाब वाली किताब और एटम बम मतलब पटको और जंग जीत लो। बिहार और
झारखंड में ‘शर्मा पासपोर्ट’ नाम से बिकने वाली किताब के विज्ञापन पर गौर कीजिए- ‘परीक्षा की तैयारी के लिए
पुस्तक खरीदने में आपका पैसा और उसे पढ़ने में आपका कीमती समय लगता है। अत: समझदारी
इसी में है कि अपना पैसा और समय जांचे-परखे एवं सर्वोत्तम परीक्षोपयोगी शर्मा
पासपोर्ट में ही लगाएं।’ बिहार
में एक कहावत है- कोई भी ग्वालिन अपनी दही को खट्टा नहीं बताती। कोई भी अपनी कंपनी
अपने प्रोडक्ट की तारीफ ही करती है। लेकिन ऐसी बेशर्मी!
हद है।
बिहार में यह गोरखधंधा कोई आज से नहीं हो रहा। परीक्षा पास कराने के लिए ऐसे
धंधे दशकों से हो रहे हैं, बस बेशर्मी बढ़ती जा रही है। बेशर्मी के साथ ही
कारोबार भी बढ़ रहा है। ‘गेस-पेपर’ और ‘पासपोर्ट’ की संस्कृति कैंसर बनकर
शिक्षा-तंत्र को खोखला कर रही है, लेकिन फिक्र किसे है?



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