टिटिहरी को
अक्सर इस बात का भ्रम होता है कि आसमान को उसी ने अपने पैरों पर थाम रखा है और अगर
उसने अपनी टांगें हटा लीं तो सारे तारे जमीन पर आ गिरेंगे। हम सब जानते हैं कि
टिटिहरी का यह भ्रम सिर्फ भ्रम है। हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं। लेकिन टिटिहरी
को समझाए कौन। दिल्ली-एनसीआर के विकास प्राधिकरण भी टिटिहरी जैसे भ्रम में पड़े
हुए हैं। यहां के अफसर (और कर्मचारी भी) यह मान बैठे हैं कि शहर के विकास का पूरा
जिम्मा उन्हीं के कंधों पर है।
अगर आप
गाजियाबाद में रहते हैं, इस शहर में आपने कोई मकान बनवाया है या कोई
फ्लैट खरीदा है या खरीदने की सोच रहे हैं तो किसी ना किसी रूप में गाजियाबाद विकास
प्राधिकरण (GDA) से आपका वास्ता जरूर पड़ा होगा। वैसे वास्ता
ना ही पड़े तो अच्छा है। पर मेरी बदकिस्मती है कि हाल के महीनों में कई बार मेरा GDA
आना-जाना हुआ है। दूसरे लोगों के अनुभव का तो पता नहीं, पर मेरा अनुभव यही कहता है कि GDA पर टिटिहरी वाला
रूपक ही फिट बैठता है।
यदि आप GDA के अफसरों, कर्मचारियों से मिलें तो वे आपको यह
अहसास कराने की कोशिश जरूर करेंगे कि आपके मुकाबले वे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं,
कि उनके सिर पर आपके बनिस्पत कहीं ज्यादा और बड़ी जिम्मेदारियां
हैं। भले ही अकेले में वे दिन भर अपने दफ्तर में बैठे मक्खियां मारते रहें,
लेकिन आपके सामने वे सुपर-बिजी हैं। उनकी यही व्यस्तता उन लोगों के
सामने फुर्सत में बदल जाती है, जिनसे बिजनेस आता है। बिजनेस समझते हैं ना? पैसा।
GDA की कमाई का सबसे बड़ा जरिया हैं बिल्डर। रेजिडेंशियल और कॉमर्शियल
प्रोजेक्ट का नक्शा पास करके और उसकी डेवलपमेंट फीस वसूल करके GDA हर साल सैकड़ों करोड़ कमाता है। मंजूर नक्शे के मुताबिक कंस्ट्रक्शन ना हो
तो GDA के पास उसे तोड़ने, गिराने का अधिकार भी है। इसी अधिकार
में इसके अफसरों-कर्मचारियों के रुतबे का राज़ और बिजनेस का फंडा छिपा हुआ है।
बिल्डर और GDA में मिलीभगत रहती है- यह धारणा बहुत लोकप्रिय है। कुछ समय पहले तक मेरा इस
पर यकीन नहीं था। लेकिन हाल के अनुभवों ने मेरी धारणा बदल दी है।
गाजियाबाद
के राजनगर एक्सटेंशन में एक बिल्डर सोसाइटी है- अजनारा इंटीग्रिटी। इसे अजनारा इंडिया
नाम का बिल्डर बनवा रहा है। सोसाइटी का आधे से ज्यादा हिस्सा बन चुका है और आधे
में अभी कंस्ट्रक्शन चल रहा है। बिल्डर ने कुछ ढील कंस्ट्रक्शन के नाम ली हुई है
और कुछ सेटिंग के दम पर। सरकारी ग्रिड वाली बिजली यहां बस दर्शन देने आती है। बाकी
समय जेनरेटर चलता है, जिसका बिल आप पूछिए मत। पीने के लिए पानी अंडरग्राउंड सोर्स
से निकाला जाता है और वॉशरूम के फ्लश में यहां गटर का पानी सप्लाई होता है। लिफ्ट
यहां रामभरोसे चलती है, कब गिर जाए पता नहीं। स्विमिंग पूल की कभी सफाई नहीं होती
और फायर फाइटिंग सिस्टम का हाल ये है कि सिलेंडर 13वीं मंजिल से नीचे गिर जाते हैं
और बिल्डर को कोई फर्क भी पड़ता।
अब रेजीडेंट्स
की दिक्कतों को कहां तक गिनाएं। बस ये समझ लीजिए कि नौबत यहां तक आ पहुंची कि रेजीडेंट्स
ने अपनी बालकनी से ‘अजनारा चोर है’, ‘अजनारा फ्रॉड है’, ‘अजनारा
चीटर है’- के बैनर
टांग दिए हैं। बात GDA तक पहुंची तो उसने मध्यस्थता की पहल की। GDA
के OSD ने रेजीडेंट्स प्रतिनिधियों के सामने
बिल्डर के नुमाइंदों को हड़काया और जांच का भरोसा दिया। जेनरेटर वाली बिजली सस्ती
करने का आदेश जारी किया गया। रेजीडेंट्स के साथ गाली-गलौच करने वाले मेंटेनेंस
कंपनी के हेड को बदलने का भी फरमान सुनाया। पानी की क्वालिटी की जांच के लिए GDA
के तीन जेई अजनारा इंटीग्रिटी आए। पानी के सैंपल लिए गए। जेनरेटर का
ताम-झाम देखा गया। सीसीटीवी कैमरों के लोकेशन चेक किए गए। गटर के पानी के बिना ट्रीट
करके दुबारा सप्लाई करने वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का
हाले-बयां लिया गया।
मगर दस दिन
बाद दुबारा मीटिंग हुई तो जानते हैं क्या हुआ? पता चला कि पानी के जो
सैंपल जांच के लिए लिए गए थे, वे बिल्डर को ही सौंप दिए गए थे। अब बिल्डर खुद क्या
जांच कराएगा, ये समझने की बात है। बिल्डर के प्रतिनिधियों ने लैब की रिपोर्ट भी
पेश कर दी कि साहब पानी तो चकाचक है। रिपोर्ट देखें तो पता चलेगा कि STP से निकला गटर का पानी भी ‘पीने योग्य’ है। यही
नहीं, इस मीटिंग में OSD साहब ने ये भी फरमाया कि बिल्डर अगर
नक्शे में 10 फीसदी तक हेर-फेर कर दे, ग्रीन एरिया में पार्किंग बना दे, गेट की
जगह बदल दे, बच्चों के पार्क को यहां से वहां शिफ्ट कर दे तो भी जायज है।
इस बीच GDA के एई पिछली मीटिंग के मिनट्स में से जेनरेटर की बिजली के दाम पहले ही बदल
चुके थे। यानी सब सेट हो चुका था। फिर भी रेजीडेंट्स का मन बहलाने के लिए एक और
मीटिंग रखी गई। इस बार कहा गया कि सरकारी अमला सोसाइटी में ही आएगा। वहीं समस्याएं
देखी जाएंगी और उनका हल निकाला जाएगा। लेकिन ऐन मीटिंग के दिन OSD साहब मीटिंग की बात भूल गए। असिस्टेंट इंजीनियर को कोर्ट में काम निकल आया
और जूनियर इंजीनियर किसी और साइट में बिजी हो गए। बिल्डर के लिए मामला सेट था, सो
उसने भी मीटिंग में आने की जहमत नहीं उठाई। बेचारे भोले-भाले रेजीडेंट्स। करीब 200
लोग अपना काम-धाम छोड़कर GDA के अफसरों का इंतजार करते रहे।
मगर उन्हें नहीं आना था, वे नहीं आए।
सवाल है कि
GDA को जब कुछ करना ही नहीं था, तब मीटिंग का
नाटक क्यों रचा गया? जब अफसरों को बिल्डर की ही बात माननी थी
तब रेजीडेंट्स को क्यों बहलाया गया? अपनी मोटी बुद्धि में एक
ही बात आ रही है। वह यह कि रेजीडेंट्स के बहाने बिल्डर को दबाव में लिया गया।
बिल्डर को रेजीडेंट्स का डर दिखाया गया। रेजीडेंट्स को भले ही कुछ नहीं मिला।
लेकिन GDA की टिटिहरियों ने बहुत कुछ कमा लिया।
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