मंगलवार, 7 जुलाई 2015

टिटिहरियां कमा रही हैं

टिटिहरी को अक्सर इस बात का भ्रम होता है कि आसमान को उसी ने अपने पैरों पर थाम रखा है और अगर उसने अपनी टांगें हटा लीं तो सारे तारे जमीन पर आ गिरेंगे। हम सब जानते हैं कि टिटिहरी का यह भ्रम सिर्फ भ्रम है। हकीकत से इसका कोई वास्ता नहीं। लेकिन टिटिहरी को समझाए कौन। दिल्ली-एनसीआर के विकास प्राधिकरण भी टिटिहरी जैसे भ्रम में पड़े हुए हैं। यहां के अफसर (और कर्मचारी भी) यह मान बैठे हैं कि शहर के विकास का पूरा जिम्मा उन्हीं के कंधों पर है।
अगर आप गाजियाबाद में रहते हैं, इस शहर में आपने कोई मकान बनवाया है या कोई फ्लैट खरीदा है या खरीदने की सोच रहे हैं तो किसी ना किसी रूप में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) से आपका वास्ता जरूर पड़ा होगा। वैसे वास्ता ना ही पड़े तो अच्छा है। पर मेरी बदकिस्मती है कि हाल के महीनों में कई बार मेरा GDA आना-जाना हुआ है। दूसरे लोगों के अनुभव का तो पता नहीं, पर मेरा अनुभव यही कहता है कि GDA पर टिटिहरी वाला रूपक ही फिट बैठता है।
यदि आप GDA के अफसरों, कर्मचारियों से मिलें तो वे आपको यह अहसास कराने की कोशिश जरूर करेंगे कि आपके मुकाबले वे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, कि उनके सिर पर आपके बनिस्पत कहीं ज्यादा और बड़ी जिम्मेदारियां हैं। भले ही अकेले में वे दिन भर अपने दफ्तर में बैठे मक्खियां मारते रहें, लेकिन आपके सामने वे सुपर-बिजी हैं। उनकी यही व्यस्तता उन लोगों के सामने फुर्सत में बदल जाती है, जिनसे बिजनेस आता है। बिजनेस समझते हैं ना? पैसा।
GDA की कमाई का सबसे बड़ा जरिया हैं बिल्डर। रेजिडेंशियल और कॉमर्शियल प्रोजेक्ट का नक्शा पास करके और उसकी डेवलपमेंट फीस वसूल करके GDA हर साल सैकड़ों करोड़ कमाता है। मंजूर नक्शे के मुताबिक कंस्ट्रक्शन ना हो तो GDA के पास उसे तोड़ने, गिराने का अधिकार भी है। इसी अधिकार में इसके अफसरों-कर्मचारियों के रुतबे का राज़ और बिजनेस का फंडा छिपा हुआ है।
बिल्डर और GDA में मिलीभगत रहती है- यह धारणा बहुत लोकप्रिय है। कुछ समय पहले तक मेरा इस पर यकीन नहीं था। लेकिन हाल के अनुभवों ने मेरी धारणा बदल दी है।
गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में एक बिल्डर सोसाइटी है- अजनारा इंटीग्रिटी। इसे अजनारा इंडिया नाम का बिल्डर बनवा रहा है। सोसाइटी का आधे से ज्यादा हिस्सा बन चुका है और आधे में अभी कंस्ट्रक्शन चल रहा है। बिल्डर ने कुछ ढील कंस्ट्रक्शन के नाम ली हुई है और कुछ सेटिंग के दम पर। सरकारी ग्रिड वाली बिजली यहां बस दर्शन देने आती है। बाकी समय जेनरेटर चलता है, जिसका बिल आप पूछिए मत। पीने के लिए पानी अंडरग्राउंड सोर्स से निकाला जाता है और वॉशरूम के फ्लश में यहां गटर का पानी सप्लाई होता है। लिफ्ट यहां रामभरोसे चलती है, कब गिर जाए पता नहीं। स्विमिंग पूल की कभी सफाई नहीं होती और फायर फाइटिंग सिस्टम का हाल ये है कि सिलेंडर 13वीं मंजिल से नीचे गिर जाते हैं और बिल्डर को कोई फर्क भी पड़ता।
अब रेजीडेंट्स की दिक्कतों को कहां तक गिनाएं। बस ये समझ लीजिए कि नौबत यहां तक आ पहुंची कि रेजीडेंट्स ने अपनी बालकनी से अजनारा चोर है, अजनारा फ्रॉड है, अजनारा चीटर है- के बैनर टांग दिए हैं। बात GDA तक पहुंची तो उसने मध्यस्थता की पहल की। GDA के OSD ने रेजीडेंट्स प्रतिनिधियों के सामने बिल्डर के नुमाइंदों को हड़काया और जांच का भरोसा दिया। जेनरेटर वाली बिजली सस्ती करने का आदेश जारी किया गया। रेजीडेंट्स के साथ गाली-गलौच करने वाले मेंटेनेंस कंपनी के हेड को बदलने का भी फरमान सुनाया। पानी की क्वालिटी की जांच के लिए GDA के तीन जेई अजनारा इंटीग्रिटी आए। पानी के सैंपल लिए गए। जेनरेटर का ताम-झाम देखा गया। सीसीटीवी कैमरों के लोकेशन चेक किए गए। गटर के पानी के बिना ट्रीट करके दुबारा सप्लाई करने वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) का हाले-बयां लिया गया।
मगर दस दिन बाद दुबारा मीटिंग हुई तो जानते हैं क्या हुआ? पता चला कि पानी के जो सैंपल जांच के लिए लिए गए थे, वे बिल्डर को ही सौंप दिए गए थे। अब बिल्डर खुद क्या जांच कराएगा, ये समझने की बात है। बिल्डर के प्रतिनिधियों ने लैब की रिपोर्ट भी पेश कर दी कि साहब पानी तो चकाचक है। रिपोर्ट देखें तो पता चलेगा कि STP से निकला गटर का पानी भी पीने योग्य है। यही नहीं, इस मीटिंग में OSD साहब ने ये भी फरमाया कि बिल्डर अगर नक्शे में 10 फीसदी तक हेर-फेर कर दे, ग्रीन एरिया में पार्किंग बना दे, गेट की जगह बदल दे, बच्चों के पार्क को यहां से वहां शिफ्ट कर दे तो भी जायज है।
इस बीच GDA के एई पिछली मीटिंग के मिनट्स में से जेनरेटर की बिजली के दाम पहले ही बदल चुके थे। यानी सब सेट हो चुका था। फिर भी रेजीडेंट्स का मन बहलाने के लिए एक और मीटिंग रखी गई। इस बार कहा गया कि सरकारी अमला सोसाइटी में ही आएगा। वहीं समस्याएं देखी जाएंगी और उनका हल निकाला जाएगा। लेकिन ऐन मीटिंग के दिन OSD साहब मीटिंग की बात भूल गए। असिस्टेंट इंजीनियर को कोर्ट में काम निकल आया और जूनियर इंजीनियर किसी और साइट में बिजी हो गए। बिल्डर के लिए मामला सेट था, सो उसने भी मीटिंग में आने की जहमत नहीं उठाई। बेचारे भोले-भाले रेजीडेंट्स। करीब 200 लोग अपना काम-धाम छोड़कर GDA के अफसरों का इंतजार करते रहे। मगर उन्हें नहीं आना था, वे नहीं आए।

सवाल है कि GDA को जब कुछ करना ही नहीं था, तब मीटिंग का नाटक क्यों रचा गया? जब अफसरों को बिल्डर की ही बात माननी थी तब रेजीडेंट्स को क्यों बहलाया गया? अपनी मोटी बुद्धि में एक ही बात आ रही है। वह यह कि रेजीडेंट्स के बहाने बिल्डर को दबाव में लिया गया। बिल्डर को रेजीडेंट्स का डर दिखाया गया। रेजीडेंट्स को भले ही कुछ नहीं मिला। लेकिन GDA की टिटिहरियों ने बहुत कुछ कमा लिया।

#Ajnara #AjnaraIntegrity #AjnaraProtest #GDA

बुधवार, 24 जून 2015

हमारा बिल्डर चोर है

आप अपनी बालकनी में क्या लगाते हैं? आंखों को सुकून देने वाला कोई पौधा। मनी प्लांट, कोई हैंगिंग प्लांट, विंड चाइम या फिर कोई फेंग शुई। क्या आपने किसी को अपनी बालकनी में किसी के लिए गाली या अपशब्द लिखकर टांगते हुए देखा है? गाली भी ऐसे व्यक्ति के लिए जो दबंग हो और पैसे वाला भी। वह चाहे तो शारीरिक रूप से भी नुकसान पहुंचा सकता है। घर पर गुंडे भेज सकता है। फर्जी मुकदमे में फंसा सकता है। ऐसा कुछ ना भी करे तो भी कई दूसरे तरीकों से जीना मुहाल कर सकता है।  

लेकिन कहते हैं ना मरता क्या नहीं करता। घर में बीमार कर देने वाले पानी की सप्लाई हो, बिजली का कनेक्शन बार-बार काट दिया जाए और जनरेटर की महंगी बिजली खरीदने के लिए मजबूर किया जाए तो आदमी क्या करे? कितने दिन चुप रहे? पिछले डेढ़ साल से बिल्डर से मिन्नतें करते-करते, हाथ जोड़ते-जोड़ते जब वे थक गए तो गाजियाबाद के करीब 700 परिवारों ने अपनी बालकनी में यही लिखकर टांग दिया कि उनका बिल्डर चोर, चीटर है, फ्रॉड है। इसी बात के पोस्टर उन्होंने अपनी गाड़ियों में भी चिपका दिए। इससे उनकी बालकनी और कार की रौनक चली गई। उनके मकान की कीमत घटने लगी। घर पर बिल्डर के गुंडे धमकने लगे। परिवार वालों को भी धमकियां मिलने लगीं। बिल्डर के खिलाफ लोगों ने सड़क पर प्रदर्शन किया तो वहां भी गुंडे आ धमके और टेंट उखाड़ दिया। लोगों ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के दरबार में हाजिरी लगाई तो वहां अफसर ने बड़े प्यार से बात की। रेजीडेंट्स की तकलीफ सुनी। मदद का भरोसा भी दिया। लेकिन उसी अफसर के मातहत जूनियर इंजीनियर मौके का मुआयना करने आए तो उनके बोल बदल गए।

अब किसने क्या लिया, किसने क्या दिया- ये अलग बात है। लेकिन रेजीडेंट्स को कुछ नहीं मिला। सरकारी 'सहयोग' से उत्साहित बिल्डर ने मनमानी का दूसरा चैप्टर शुरू कर दिया है। सोसाइटी की जिस जमीन पर हरियाली का वादा किया गया था, वहां गाड़ियों के लिए पार्किंग बनाई जा रही है। वैसे दिखावे के लिए उस जमीन पर घास भी लगी हुई है। यानी हरियाली की हरियाली और पार्किंग की पार्किंग। बिल्डर ने फ्लैट बेचते वक्त अपने ब्रोशर में जो नक्शा दिखाया था, उसमें और असली सोसाइटी में आकाश-पाताल का नहीं, तो भी जमीन-आसमान का अंतर है। बिल्डर का कहना है कि नक्शे में बदलाव किया गया है। लेकिन किसकी सहमति से? क्या प्राधिकरण की सहमति से? और खरीदारों की सहमति? क्या किसी से पूछा गया? बिल्डर की मनमानियों की जांच करने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या अकेले रेजीडेंट्स की? या फिर जिला प्रशासन, विकास प्राधिकरण, नगर निगम और सरकारी इंजीनियरों की भी कोई जवाबदेही बनती है?

गुरुवार, 14 मई 2015

बस एक ही काफी है!

भारत की बढ़ती आबादी को रोकने का फॉर्मूला मिल गया है। यह फॉर्मूला किसी ने खोजा नहीं है, बस मिल गया है। बहुसंख्यक गरीब आबादी और अति-अल्पसंख्यक धनाढ्य वर्ग पर यह फॉर्मूला कारगर हो या ना हो, मगर मिडिल क्लास पर यह फॉर्मूला शत-प्रतिशत काम करेगा। शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है, सफलता सोलह आने पक्की है। यह फॉर्मूला अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय ईजाद हुआ था, लेकिन तब किसी को यह पता नहीं था कि यह आबादी रोकने का सूत्र है। उस वक्त इसे शिक्षा का स्तर सुधारने का फॉर्मूला बताया गया था। अब शिक्षा का स्तर सुधरा या बिगड़ा, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन आबादी रोकने की इसकी क्षमता से कोई इंकार नहीं कर सकता।

देश का उद्धार करने वाला यह फॉर्मूला कुछ उद्योगपतियों ने तैयार किया था, जिनको वाजपेयी सरकार ने शिक्षा का स्तर सुधारने के तरीके सुझाने का काम सौंपा था। इस कमेटी में कई उद्योगपति और कारोबारी थे लेकिन इसे नाम मिला था बिड़ला-अंबानी कमेटी। इस कमेटी ने सुझाव दिया था कि शिक्षा का स्तर सुधारने और उसे रोजगारपरक (जॉब ओरिएंटेड) बनाने के लिए जरूरी है कि निजी क्षेत्र को इसमें आने के ज्यादा मौके दिए जाएं और हायर एजुकेशन को स्ववित्त-पोषित (सेल्फ फायनैंस्ड) बनाया जाए। यानी जो पढ़े, वही पैसे खर्च करे। सरकार उनका बोझ ना उठाए।

सरकार ने बिड़ला-अंबानी कमेटी की रिपोर्ट पर बिना बताए अमल शुरू किया। स्कूल-कॉलेजों को मिलने वाला पैसा कम हुआ तो वहां होने वाली पढ़ाई का स्तर गिरा। इसका सीधा फायदा प्राइवेट स्कूलों को हुआ। बिड़ला-अंबानी कमेटी की रिपोर्ट से पहले भी इस देश में प्राइवेट प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूल थे, जिनका सबसे बड़ा आकर्षण था अंग्रेजी की और अंग्रेजी में शिक्षा देना। अंग्रेजी के आकर्षण में ही बंधकर मिडिल क्लास इन स्कूलों की तरफ रुख कर रहा था। बदले हुए हालात में इसमें जबरदस्त तेजी आई। यही वह समय था जब बड़े व्यापारिक घराने स्कूल खोलने लगे। शिक्षा का स्तर उठाने के सामाजिक कार्य का हवाला देकर उन्होंने सरकार से सस्ती जमीन हासिल कर ली और दुकान सजाकर बैठ गए।

अब उद्योगपतियों और कारोबारियों के ही संगठन एसोचैम ने कहा है कि पिछले 10 साल में निजी स्कूलों की फीस 150 प्रतिशत बढ़ गई है। किसी औसत प्राइवेट स्कूल में 2005 में एक बच्चे को पढ़ाने का सालाना खर्च 55 हजार रुपये के करीब था, जो अब बढ़कर सवा लाख रुपये तक पहुंच गया है। अगर स्कूल ड्रेस, जूते, बैग-बोतल, स्पोर्ट्स किट, बस भाड़ा, ट्यूशन-कोचिंग के खर्च को भी इसमें जोड़ दें तो यह रकम डेढ़ लाख से दो लाख रुपये के बीच बैठती है। एसोचैम के सोशल डेवलेपमेंट फाउंडेशन ने देश के 10 बड़े शहरों में सर्वे कराने के बाद यह रिपोर्ट बनाई है। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी स्कूलों में शिक्षा के गिरते स्तर के चलते मां-बाप अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं। फीस के बढ़ते बोझ को उठाने के लिए उन्होंने घूमना-फिरना कम कर दिया है। वे घर से बाहर खाना भी कम खा रहे हैं। यहां तक कि वे घर की मरम्मत भी ठीक से नहीं करा पा रहे। लेकिन बच्चों की स्कूल फीस जरूर भर रहे हैं।

अब तो आप समझ ही गए होंगे आबादी रोकने का फॉर्मूला क्या है। अरे भाई, जब एक बच्चे को पढ़ाने में ही हर साल डेढ़-दो लाख रुपये खर्च होंगे तो भला कोई दूसरा पैदा ही क्यों करेगा? लेकिन याद रखें कि यह फॉर्मूला सिर्फ मिडिल क्लास पर लागू होता है। जो प्राइवेट स्कूलों की फीस भर ही नहीं सकते, उस गरीब आबादी पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्कूल फीस कितनी बढ़ रही है और जिनके लिए खर्च के बारे में टेंशन लेना फिजूल का काम है, उस धनाढ्य वर्ग पर भी यह फॉर्मूला नहीं चलेगा। 

बुधवार, 13 मई 2015

सैम बहादुर या शेम-शेम बहादुर!

 सत्ता के सबसे बड़े केंद्र यानी व्हाइट हाउस के वॉर रूम में अपने सलाहकारों और अमेरिकी सेना के बड़े अधिकारियों के साथ बैठे राष्ट्रपति बराक ओबामा की यह तस्वीर तो याद ही होगी। इसे भुलाया भी कैसे जा सकता है? अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में ओबामा के अब तक के कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण पल यही तो था। वे दूसरी बार राष्ट्रपति बने तो उसमें भी इस तस्वीर का बड़ा योगदान था। तस्वीर 2 मई 2011 की है, जब अमेरिकी नौसेना के एलीट सील कमांडो पाकिस्तान के एबटाबाद में अल-क़ायदा के चीफ ओसामा बिन लादेन को खत्म करने का ऑपरेशन करने निकले थे। ऑपरेशन खत्म होने और ओसामा की मौत की पुष्टि होते ही ओबामा ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया था, जिसमें उन्होंने यह एलान किया था कि सील का ऑपरेशन नेप्च्यून स्पियर मिशन उम्मीद से ज्यादा कामयाब रहा। सील कमांडो के दल ने पाकिस्तान में छिपकर बैठे अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन को मार गिराया और किसी सील को खरोंच तक नहीं आई। ओबामा ने यह भी बड़े ही गर्व से बताया था कि इस ऑपरेशन की जानकारी पाकिस्तान को नहीं थी। उसके आर्मी चीफ जनरल अशफाक कयानी और आईएसआई के सरगना जनरल शुजा पाशा को भी नहीं। अमेरिका का दावा था कि उसने पाकिस्तान के साथ युद्ध का खतरा उठाकर भी लादेन को मारा, क्योंकि लादेन उसका दुश्मन था और उसे मारने के लिए अमेरिका किसी और देश की इजाजत का मोहताज नहीं।

लादेन का खात्मा होते ही तरह-तरह की कहानियां गढ़ी गईं। सील कमांडोज़ की वीरता की गाथाएं लिखी गईं। उनकी ट्रेनिंग के तरीके और घातक प्रहार क्षमता का ऐसे बखान किया गया मानो 21वीं सदी के चंदवरदाई नये सिरे से पृथ्वीराजरासो लिख रहे हों। लादेन को खत्म करने के ऑपरेशन में किसी सील कमांडो का न मारा जाना इन कहानियों के लिए खाद-पानी का काम करता रहा। अब चार साल बाद अमेरिका के ही एक पत्रकार ने ओबामा के दावों, अमेरिकी सरकार के झूठ और सील कमांडो की वीर गाथाओं की धज्जियां उड़ा दी हैं। सेमोर एम. हर्स नाम के इस खोजी पत्रकार ने लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स में अपनी रिपोर्ट लिखी है, साथ ही पाकिस्तान के नामी अखबार डॉन को इंटरव्यू दिया है। हर्स ने सिलसिलेवार तरीके से बताया है कि लादेन को अमेरिका ने खुद नहीं खोजा था, बल्कि पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमेरिका के साथ सौदा किया था। आईएसआई ने 2006 से ही लादेन को बंधक बनाकर रखा था। उसकी मर्जी के बिना लादेन कहीं आ-जा नहीं सकता था। आईएसआई के उस वरिष्ठ अधिकारी ने लादेन के सिर पर रखे ढाई करोड़ डॉलर के इनाम के लिए अमेरिका को उसका ठिकाना बता दिया। अमेरिका ने सैटेलाइट के जरिये लादेन के ठिकाने पर नज़र रखना शुरू कर दिया और पुष्टि होते ही उसके खात्मे का प्लान बना लिया गया।

सेमोर एम. हर्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी प्लान में सील का साहस कम और सरकार की चतुराई ज्यादा थी। अमेरिका ने पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल अशफाक कियानी और आईएसआई के चीफ जनरल शुजा पाशा, दोनों को शीशे में उतार लिया। कियानी और पाशा को धमकी भी दी गई और लालच भी दिया गया। दोनों जब अमेरिकी प्लान पर राजी हो गए, तब उन्होंने गुजारिश की कि लादेन के मिलते ही अमेरिका उसे मार डाले, जिससे इस प्लान में पाकिस्तान के शामिल होने का कोई सबूत ना बचे। रिपोर्ट के मुताबिक सील कमांडो का हेलीकॉप्टर जब अफगानिस्तान की ओर से पाकिस्तान में दाखिल हुआ, तब तक लादेन की हिफाजत करने वाले सारे तंत्र हटा लिए गए थे। 2001 में वर्ल्ड ट्रेड टावर ध्वस्त करके अमेरिका को चुनौती देने वाला ओसामा बिन लादेन 2006 से ही पंगु था। सील कमांडो जब उसके पास पहुंचे, तब तक वह मांस के लोथड़े से ज्यादा कुछ नहीं रह गया था। यानी लादेन को मारने में सील कमांडोज़ की कोई बहादुरी नहीं थी। उन्होंने तो एक ऐसे व्यक्ति को मारा था, जो नख-दंत विहीन हो चुका था और जिसे मारने या ना मारने से अमेरिकी सुरक्षा को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।

ओबामा ने लादेन के एनकाउंटर को ऐसे प्रचारित किया मानो सैम बहादुर की एलीट फ़ौज़ ने बड़ी जंग जीत ली हो। पाकिस्तान की सेना और आईएसआई लादेन को अमेरिकी हाथों में सौंपने से पहले यह चाहती थी कि अमेरिका उसके अफगानिस्तान में मिलने की बात प्रचारित करे, जिससे उनकी बदनामी ना हो। लेकिन राष्ट्र के नाम संदेश में ओबामा ने उस वादे को नहीं निभाया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने जो कहानी सुनाई, उसने पाकिस्तान की इमेज को चौपट कर दिया और सील कमांडोज़ को हीरो बना दिया। जबकि हकीकत ऐसी नहीं थी। व्हाइट हाउस ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। पाकिस्तान की फ़ौज़ ने भी इसे कोरी गप कहा है। सोचने की बात है कि वे इससे अलग और कह क्या सकते थे।

सोमवार, 11 मई 2015

आओ दाऊद! मुकदमा लड़ लो!

पहले छह घंटे की बात कर लें, फिर छह दिनों की बात करेंगे। आज दिन में 11 बजकर 20 मिनट पर माननीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह लोकसभा में दहाड़ रहे थे, 'दाऊद इब्राहिम को पकड़कर जब तक भारत नहीं ले आएंगे, तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे। हमारे पास पुख्ता सूचना है कि दाऊद पाकिस्तान में ही है। हमने पड़ोसी देश को सबूत भी मुहैया कराए हैं। अब पाकिस्तान उसे ढूंढे और भारत भेजने की कानूनी प्रक्रिया शुरू करे।' राजनाथ सिंह के बयान के ठीक छह घंटे बाद यानी शाम को 5 बजकर 20 मिनट पर भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने सफाई दी, 'मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि वो साहब (दाऊद) पाकिस्तान में नहीं हैं।' अब्दुल बासित ने यह बयान लखनऊ में दिया, जो संयोग से राजनाथ सिंह का चुनाव क्षेत्र भी है।

1993 के बॉम्बे बम धमाकों के मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम को लेकर भारत और पाकिस्तान की सरकारों की यह जुबानी तल्खी कई बार दिख चुकी है। हर बार भारत सरकार यह कहती है कि दाऊद पाकिस्तान में है। आईएसआई उसकी हिफाजत कर रही है। वह ड्रग्स और रियल इस्टेट का धंधा कर रहा है और मुंबई में अपने शार्प शूटर्स का डर दिखाकर अवैध वसूली करता है। हर बार पाकिस्तान की ओर से यह टका-सा जवाब मिलता है कि दाऊद पाकिस्तान में नहीं है।

कहते हैं कि दाऊद को भारतीय खुफिया एजेंसियों, खासकर रॉ का डर सताता रहता है कि कहीं उसका एनकाउंटर ना हो जाए। अभी हाल ही में सीबीआई के दो पूर्व अधिकारियों ने दावा किया था कि दाऊद एक बार सरेंडर करने की भी सोच रहा था, लेकिन फिर उसने इरादा बदल दिया। दाऊद के बारे में जानने का दावा करने वाले तो बहुत हैं। लेकिन पक्के तौर पर कोई यह नहीं बता सकता कि दाऊद आजकल किसके प्रभाव में है, उसके सलाहकार कौन हैं और क्या वह आईएसआई का बंधक है या फिर अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। अगर दाऊद आजाद है तो यकीन मानिए, भारतीय मीडिया में छपने और दिखने वाली खबरों पर उसकी नज़र जरूर रहती होगी। यदि यह कल्पना सही है तो पिछले छह दिनों में उसने फिर से सरेंडर के बारे में सोचना शुरू कर दिया होगा।

पिछले छह दिनों में आखिर हुआ क्या है? छह मई 2015 को मुंबई की एक अदालत ने हिंदी सिनेमा के 'भाई' सलमान खान को हिट एंड रन केस में मुजरिम ठहराया और उसी दिन उन्हें पांच साल बामशक्कत कैद की सज़ा सुना दी। कोर्ट के इस फैसले को इंसाफ की जीत, कानून की जीत, आम आदमी की जीत और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया। सेशंस कोर्ट के जज को इंसाफ का देवता करार दे दिया गया। लेकिन शाम होते-होते ऊपरी अदालत में सलमान को दो दिन के लिए अंतरिम जमानत मिल गई। तब पता चला कि 13 साल तक जो मुकदमा चला है और जो फैसला दिया गया है, उसमें कुछ छेद भी है। अब कानून के बड़े मंदिर में छोटे मंदिरों से निकला कोई छिद्रदार फैसला टिक नहीं सकता, इसलिए दो दिन बाद यानी आठ मई को सलमान खान को नियमित जमानत मिल गई और हाई कोर्ट का निर्णय आने तक सेशंस कोर्ट से मिली सज़ा पर रोक लग गई।

आज यानी 11 मई 2015 एक और बड़े मुकदमे में न्याय हुआ। आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता बरी हो गईं। जयललिता के पास उनकी आमदनी से 65 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति मिली थी। वे अपनी हजारों साड़ियों और सैंडिलों का हिसाब नहीं दे पाई थीं। निचली अदालत ने अम्मा को उनकी सहेली शशिकला के साथ मुजरिम ठहराया था और चार साल क़ैद की सज़ा भी सुनाई थी। जयललिता मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और अपने भक्त पन्नीरसेल्वम के हाथ में सत्ता सौंपने को मजबूर होना पड़ा था। लेकिन कानून के ऊंचे मंदिर में निचली अदालत का फैसला नहीं टिका। जयललिता बाइज्जत बरी हो गईं। 65 करोड़ कहां से आए, इसका हिसाब नहीं मिला तो यह अम्मा की गलती नहीं है! गलती अभियोजन पक्ष की है, क्योंकि वह गलत तरीके से पैसे जमा करने के सबूत नहीं दे पाया! यानी अम्मा नेता बनने से पहले महान थीं। भ्रष्टाचार के दौर में भी महान थीं और कोर्ट से बरी होने के बाद अति महान हो गई हैं। अब वे फिर से मुख्यमंत्री बनेंगी। उनके शपथ ग्रहण की तारीख भी तय हो चुकी है।

न्याय के मंदिर में आज ही एक और फैसला हुआ, हालांकि उसे ज्यादा चर्चा नहीं मिली। अपनी ही बनाई कंपनी सत्यम में तीन हजार करोड़ से भी ज्यादा के घोटाले के आरोपी रामलिंगा राजू को जमानत मिल गई। हैदराबाद मेट्रोपोलिटन सेशंस कोर्ट ने राजू को निचली अदालत से मिली सात साल की सज़ा को भी सस्पेंड कर दिया। कंपनी के खातों में हेराफेरी करके लाखों निवेशकों की जेब खाली करने वाले राजू सिर्फ एक लाख रुपये का मुचलका भरकर बाहर आ रहे हैं।
भारतीय अदालतों के ये सारे फैसले देखकर दाऊद क्या सोच रहा होगा? यकीनन यही कि अगर मैं भी मुकदमा लड़ूं, खुद को पुलिस का मारा बताऊं, अच्छा और पहुंच वाला वकील करू लूं तो सारे आरोपों से बरी हो सकता हूं। गुजरात के नरोदा पटिया दंगा केस में 26 साल की सज़ा पाने वाली पूर्व मंत्री माया कोडनानी को यदि जमानत मिल सकती है और 70 से ज्यादा हत्याओं का आरोपी बाबू बजरंगी अगर आजाद हो सकता है तो दाऊद क्यों नहीं? किसी अदालत में अब तक उसका जुर्म साबित नहीं हुआ है। और ये तो हमारे नेता भी कहते हैं कि जब तक आरोप साबित ना हों, वह कानून की नज़र में सिर्फ आरोपी रहता है, मुजरिम नहीं।

अब जब न्याय के मंदिर में सलमान, जयललिता और राजू के खिलाफ सबूतों के धुर्रे उड़ गए तो दाऊद क्या चीज है।

 

रविवार, 10 मई 2015

हम सब चोर हैं

दूसरों को चोर कहना आसान है, लेकिन खुद को चोर कहने के लिए हिम्मत चाहिए। और सबको चोर कहने के लिए तो और बड़े जिगरे की जरूरत है। पता नहीं कौन कब मानहानि का आरोप लगाकर मुकदमा ठोक दे। अब कहां-कहां साबित करते फिरेंगे कि हां तुम चोर हो। फलां भी चोर है और चिलां भी चोरी करता है। फिर भी मैं यह कहने का खतरा उठा रहा हूं कि हम सब चोर हैं। हम कुछ ना कुछ चुराते ही रहते हैं।

चोर कहलाने के लिए कुछ चुराना आवश्यक है। अब यह जरूरी नहीं कि जिसकी चोरी हुई हो, वह कोई कीमती वस्तु जैसे रुपये, गहने-जेवर, कोई घड़ी या इलेक्ट्रॉनिक सामान ही हो। वह दोस्त की कलम भी हो सकती है, जिसे लौटाने का दिल ना करे। वह किसी लाइब्रेरी की किताब भी हो सकती है, जिसे लौटाने का इरादा ना बने। वह कोई मिठाई भी हो सकती है, जो मां या पत्नी को बिना बताए चुपचाप निकालकर खा ली जाए। ये भी जरूरी नहीं कि जो चोरी की गई हो, वह कोई वस्तु ही हो। वह विचार भी हो सकता है। वह किसी गाने की धुन भी हो सकती है। किसी कविता की पंक्ति भी हो सकती है। किसी उपन्यास का प्लॉट भी हो सकता है। किसी बिजनेस का आइडिया भी हो सकता है।
मैं जिस पेशे में हैं, उसमें खबरों की चोरी बहुत होती है। और खबरों की चोरी से भी ज्यादा होती है क्रेडिट की चोरी। मतलब किसी और खबर को अपना बनाकर बेच लेने की हेराफेरी, किसी और के विचारों को अपना आइडिया बनाकर पेश कर देने की चोरी। और ऐसा सिर्फ हमारे पेशे में नहीं होता। बॉलीवुड, हॉलीवुड, म्यूजिक इंडस्ट्री हर जगह ऐसा ही होता है। सियासतदां लोग मुद्दों की चोरी करने में मशगूल रहते हैं। सरकारी खजाने में सेंध लगाने की हैसियत तक पहुंचने से पहले वे मुद्दे चुराते हैं। दूसरी पार्टियों के मुद्दे कैसे अपनी झोली में आ जाएं, इस चिंता में वे दुबले हुए जाते हैं। सरकारी अफसरों की चोरी के कहने ही क्या? जितना बखान किया जाए, उतना कम है।
जमीन की चोरी सार्वकालिक और सार्वभौमिक है। किसान भाई मेड़ (कगार या पगडंडी) की मिट्टी एक ओर से काटकर दूसरी ओर करने की हेराफेरी करके खेत की चोरी करते हैं। वैसे इस तरीके से हर साल दो चार इंच जमीन ही चुराई जा सकती है, लेकिन बार-बार यही प्रक्रिया दुहराने पर कुछ सालों में कई बीघे खेत 'गायब' हो जाते हैं। फसल की चोरी इसके सामने बड़ी मामूली लगती है। जमीन की चोरी सिर्फ गांवों में नहीं होती। शहर की जमीन ज्यादा कीमती होती है, इसलिए यहां उसकी चोरी भी ज्यादा शातिर तरीके से होती है। सरकारी जमीन को चुराना आसान होता है, निजी मिल्कियत को चुराना मुश्किल। लेकिन तहसीलदार, ग्रामसेवक और बिल्डर जैसे चोर एक साथ मिल जाएं तो किसी भी जमीन को चुरा सकते हैं।
आम तौर पर देखा गया है कि जो व्यक्ति जिस पेशे में होता है, उसी के अनुसार चोरी करता है। जैसे- पेट्रोल पंप वाला पेट्रोल-डीजल की चोरी करता है। मोबाइल कंपनी वाला टॉक टाइम में हेराफेरी करता है। बैंक वाला आपके खाते में आने वाली रकम में कटौती की तरकीबें भिड़ाता है। बिल्डर सीमेंट और सरिया चुरा लेता है। किराने वाला तौल में चोरी करता है। चाय बेचने वाला आपके कप में चाय की मात्रा में गड़बड़ी करता है।
जो गबन नहीं करते, घोटाला नहीं करते, दूसरे की जमीन नहीं चुराते, फसल नहीं चुराते, दोस्त की कलम, लाइब्रेरी की किताब, दूसरों के विचार, गाने की धुन, कविता की पंक्ति या उपन्यास का प्लॉट नहीं चुराते, वे भी टैक्स चुराते हैं। इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स या सर्विस टैक्स की चोरी करना ही टैक्स चोरी नहीं है। पान खाकर या चाय पीकर उसका बिल ना लेना भी सरकार की नजरों में चोरी है, क्योंकि बिल न लेने से सरकार को उस पर वैट नहीं मिलता। फायदा बेशक दुकानदार का होता है, लेकिन टैक्स चोरी में खरीदार भी शामिल होता है।

इनके अलावा कुछ और चोरियां भी हैं। जरा गौर फरमाइए- दिल चुराना, नज़रें चुराना, देह चुराना और काम चोरी करना। ये मुहावरे बने ही इसलिए हैं क्योंकि सदियों से ऐसी चोरियां हो रही है। जो दिल नहीं चुराते, वे कम से कम नज़रें तो चुराते ही हैं। और देह चुराना या काम चोरी करना तो इंसान की फितरत ही है। इसलिए शर्म मत कीजिए। गर्व से कहिए। हम सब चोर हैं।

गुरुवार, 7 मई 2015

'एटम बम' खरीदा क्या?

'बम' यहां बम नहीं। 'एटम बम' एटम बम नहीं। 'पासपोर्ट' पासपोर्ट नहीं और 'कुंजी' यहां चाबी नहीं। ये सब परीक्षा पास करने और कराने की तरकीबें हैं। अगर आप इनसे अनजान हैं तो तय है कि आप कभी बिहार नहीं गए। मैट्रिक माने 10वीं और इंटरमीडिएट याने 12वीं की परीक्षाओं में अपने बच्चों को नकल कराते हुए अभिभावकों की तस्वीर तो आपने जरूर देखी होगी। नकल कराने के लिए छज्जियों के सहारे चौथी मंजिल तक चढ़ गए अभिभावकों की तस्वीर ने तो अमेरिका तक नाम कमा लिया है।


माता शत्रुः पिता वैरी, बालो येन न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये, हंसमध्ये बको यथा॥

अर्थात् जो अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते, ऐसे मां-बाप शत्रु के समान होते हैं। क्योंकि जिस तरह हंसों के बीच बगुले की शोभा नहीं होती, उसी तरह विद्वानों की सभा में अनपढ़ लोगों की पूछ नहीं होती। यह राजनीतिशास्त्र के प्रकांड विद्वान आचार्य चाणक्य ने लिखा था। अब बिहार के लोग किसी की बात को तवज्जो दे या ना दें, चाणक्य की बातों पर जरूर ध्यान देते हैं। आखिर हर कोई यहां चाणक्य ही तो बनना चाहता है। इसीलिए बेटा-बेटी ही नहीं, भतीजा-भतीजी, भानजा-भानजी, चचेरा-ममेरा-फुफेरा भाई, चचेरी-ममेरी-फुफेरी बहन, दोस्त के भाई, दोस्त की बहन, इनके अलावा जितनी भी रिश्तेदारियां हो सकती हैं, उन सबको परीक्षा पास कराने के लिए वे हर खतरा उठाने को तैयार रहते हैं।

लेकिन बिहार की पूरी तस्वीर सिर्फ इतनी नहीं है। मुकम्मल तस्वीर को समझने के लिए कुछ और शब्दों से रूबरू होना जरूरी है। ट्यूशन, कोचिंग, गेस-पेपर, क्वेश्चन बैंक, होम सेंटर, पर्ची और पैरवी को नहीं जानेंगे तो बिहार के शिक्षा-तंत्र को कैसे समझेंगे? एक समय था जब बिहार के छात्रों को औसत से बेहतर माना जाता था। उनकी अंग्रेजी भले ही अप-टू-डेट ना हो, लेकिन गणित और भूगोल जैसे विषयों पर उनकी पकड़ अच्छी मानी जाती थी। वैसे आज भी सिविल सर्विसेज और बाकी परीक्षाओं में बिहार के छात्र अपने लिए जगह बना ही लेते हैं, लेकिन बुनियादी स्तर पर तस्वीर इतनी धुंधली हो चली है कि सब कुछ मटमैला ही दिखता है। सरकारी प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में पढ़ाई शिक्षा-मित्रों के हवाले है, जिनकी पहली चिंता समय पर वेतन मिलने या ना मिलने से जुड़ी रहती है। सरकारी स्कूलों में हर रोज होने वाला सबसे महत्वपूर्ण काम मिड-डे मील तैयार करना और समय पर उन्हें परोसने का है। इसके ना रहने पर न तो स्कूल में दाखिले का कोटा पूरा हो पाता है, न हाजिरी पूरी हो पाती है।

गरीब और दलित बच्चों के साथ अपने बच्चों को बिठाकर खाना खिलाने से बचने के लिए तथाकथित सवर्ण अभिभावक अपने लाडले और लाडलियों को सरकारी स्कूलों से निकालकर प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिला देते हैं, जो यहां के गांव-शहर की गली-गली में खुल चुके हैं। पढ़ाई इन प्राइवेट, पब्लिक और तथाकथित कॉन्वेंट स्कूलों में भी नहीं होती। इसीलिए बिहार में ट्यूशन और कोचिंग के धंधे की नींव पड़ी। सरकारी-प्राइवेट स्कूलों के जो शिक्षक स्कूल में उंघते रहते हैं, वही शिक्षक ट्यूशन और कोचिंग पढ़ाते समय चुस्त-दुरुस्त दिखते हैं। जो बच्चे स्कूल जाने में कतराते हैं, वे भी इन कोचिंग सेंटरों के छोटे-छोटे कमरों में बैठने के लिए धक्का-मुक्की करते हैं। इससे आप ये ना समझ लें कि यहां पढ़ाई के लिए मार मची होती है। असल में बिहार के कोचिंग सेंटर इसलिए पॉपुलर हैं क्योंकि साल के अंत में परीक्षा के समय वे क्वेश्चन गेस करते हैं। यानी ये बताते हैं कि इस बार परीक्षा में कौन-कौन से सवाल आएंगे। यानी पूरा कोर्स पढ़ने की भी जरूरत नहीं है, बस 5 या 6 सवालों के उत्तर जान लो और बेड़ा पार। जिन्हें उन 5-6 सवालों के भी जवाब नहीं पता, उनके लिए हाजिर है कुंजी, पासपोर्ट, गेस-पेपर और एटम बम।

कुंजी माने हर मुश्किल ताले की चाबी यानी हर सवाल का जवाब। पासपोर्ट माने परीक्षा की सीमारेखा पार कराने वाला डॉक्यूमेंट। गेस पेपर मतलब चुनिंदा सवालों के जवाब वाली किताब और एटम बम मतलब पटको और जंग जीत लो। बिहार और झारखंड में शर्मा पासपोर्ट नाम से बिकने वाली किताब के विज्ञापन पर गौर कीजिए- परीक्षा की तैयारी के लिए पुस्तक खरीदने में आपका पैसा और उसे पढ़ने में आपका कीमती समय लगता है। अत: समझदारी इसी में है कि अपना पैसा और समय जांचे-परखे एवं सर्वोत्तम परीक्षोपयोगी शर्मा पासपोर्ट में ही लगाएं। बिहार में एक कहावत है- कोई भी ग्वालिन अपनी दही को खट्टा नहीं बताती। कोई भी अपनी कंपनी अपने प्रोडक्ट की तारीफ ही करती है। लेकिन ऐसी बेशर्मी! हद है।

बिहार में यह गोरखधंधा कोई आज से नहीं हो रहा। परीक्षा पास कराने के लिए ऐसे धंधे दशकों से हो रहे हैं, बस बेशर्मी बढ़ती जा रही है। बेशर्मी के साथ ही कारोबार भी बढ़ रहा है। गेस-पेपर और पासपोर्ट की संस्कृति कैंसर बनकर शिक्षा-तंत्र को खोखला कर रही है, लेकिन फिक्र किसे है?

सोमवार, 4 मई 2015

'पप्पू' पास होगा क्या ?

जींस-टीशर्ट में लीडरों वाली बात है क्या? नहीं। माथे पर त्रिपुंड लगाने से कोई नेता कहला सकता है क्या? बिल्कुल नहीं। रेलवे के दूसरे दर्ज या जनरल बोगी में सफ़र करने से कोई चहेता बन सकता है क्या? कतई नहीं। लेकिन कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ऐसे ही टोटकों की पैकेजिंग करके जनता का दिल जीतने निकले हैं। वे भारत की सबसे पुरानी पार्टी को हार के पार पहुंचाने चले हैं। राहुल के इस अभियान की सफलता अभी तय नहीं है। जनता इन तरीकों को छलावा मानेगी या राहुल बाबा को गले से लगा लेगी, यह पता लगने में अभी वक्त है। कम से कम एक चुनाव तक तो इंतजार करना ही चाहिए। लेकिन सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के चेहरों पर चिंता की लकीरें बनने लगी हैं। उनके बयानों में तल्खी झलकने लगी है और राहुल पर लगने वाले आरोपों के नश्तर तीखे हो चले हैं। कहीं यह इस बात का संकेत तो नहीं कि राहुल सचमुच कामयाब होने जा रहे हैं?


कुछ समय पहले तक भारतीय जनता पार्टी के नेता राहुल का मजाक उड़ाया करते थे। चौदह के लोकसभा चुनाव से पहले उनके लिए पप्पू का उपनाम ईजाद कर लिया गया था। राहुल के बारे में भाजपा के नेता जब भी कुछ बोलने को होते, तब उनकी इसी छवि के इर्द-गिर्द बयानों के जाल बुने जाते। वैसे यह छवि बनाने में राहुल ने भी कम योगदान नहीं दिया। अहम मौकों पर गायब हो जाना और अचानक प्रकट होकर लगाम खींचने की कोशिश करना उल्टा पड़ता रहा और कांग्रेस का युवराज आम चुनावों में सचमुच पप्पू साबित हो गया। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस जिस भी चुनाव में उतरी, उसे हार का मुंह देखना पड़ा। सबसे हाल में हुए दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस सिफर पर सिमट गई तो पार्टी में कुछ दिनों के लिए सन्नाटा पसर गया। इस सन्नाटे को सवालों ने तोड़ा। कांग्रेस (ई) के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब पार्टी के अंदर नेहरू-गांधी खानदान के नेतृत्व पर सवाल उठे। कांग्रेस के कई नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर युवराज की योग्यता पर संदेह जता दिया और उनकी मां सोनिया के हाथ में ही पार्टी की कमान रहने देने की वकालत करने लगे।

कांग्रेस नेतृत्व जब मां-बेटे के द्वंद्व में फंसा दिख रहा था, तभी राहुल बाबा छुट्टी पर चले गए, बिना बताए। उत्तर भारत के आम घरों से कोई युवक जब इस तरह घर से निकल जाता है तो उसे घर से भागना कहते हैं। भाजपा नेताओं ने राहुल को भी 'भगोड़ा' का तमगा दिया। लेकिन कांग्रेस के लिए यह राहुल का भागना नहीं था, बल्कि चिंतन में जाना था। उनसठ दिनों तक किसी को पता नहीं था कि वे कहां हैं। कुछ लोगों ने उनके विपश्यना शिविर में जाने की बात उड़ाई तो किसी ने उत्तराखंड के पहाड़ों पर ध्यान-मनन करने का दावा किया। खैर राहुल लौटे तो पता चला कि वे बैंकॉक से दिल्ली आने वाली फ्लाइट से आए हैं। भाजपा ने इसका भी मजाक बनाया। मगर घर वापसी के बाद से राहुल बिल्कुल बदले-बदले से नज़र आ रहे हैं।



दिल्ली में हुई किसान रैली में उनका अंदाज़ भले ही फीका रहा, लेकिन संसद में 'सूट-बूट वाली सरकार' का जुमला सुपरहिट हो गया। सरकार कुछ समझ पाती और उससे पहले ही राहुल बम-बम भोले कहते हुए बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए निकल पड़े। उत्तराखंड में बर्फ से ढंके पहाड़ों और टूटे-फूटे रास्तों पर जींस-टीशर्ट पहनकर पैदल चलते हुए राहुल को देखने के लिए देश भर का मीडिया उमड़ पड़ा। राहुल की उत्तराखंड यात्रा ने कांग्रेस को हॉर्लिक्स, बॉर्नबीटा, बूस्ट, कॉम्प्लान सब दे दिया। केदारनाथ की 'आग जैसी शक्ति' को महसूस करके राहुल दिल्ली लौटे और बिना कोई देरी किए किसानों का हाल-चाल जानने निकल पड़े।



पंजाब जाने के लिए उन्होंने ट्रेन पकड़ी और सेकेंड क्लास के एक कोच में सफर किया। दिल्ली लौटकर उन्होंने सरकार को 'कॉरपोरेट सरकार' का तमगा थमा दिया। अगले ही दिन वे महाराष्ट्र के अमरावती पहुंच गए, 15 किलोमीटर पैदल चले और गांव-गांव जाकर उन किसान परिवारों से मिल आए, जिनके घर का कोई ना कोई सदस्य आत्महत्या कर चुका है। दिल्ली में राहुल मिडिल क्लास के उन परिवारों से भी मिल चुके हैं, जिन्होंने दिल्ली-एनसीआर में फ्लैट बुक कराया है, लेकिन सालों बीत जाने पर भी बिल्डर उन्हें फ्लैट की चाबी नहीं दे रहा।

राहुल के इस अंदाज़ से विरोधी पार्टियों के नेता हक्के-बक्के हैं। उनकी अपनी पार्टी के नेता भी कम हैरान नहीं। समझ नहीं आ रहा कि राहुल को हो क्या गया है? वे कौन-सा एनर्जी ड्रिंक पीकर लौटे हैं? एक प्रश्न यह भी उठ रहा है कब तक? राहुल आखिर कब तक इसी तरह हाइपर एक्टिव रहेंगे? अभी तो मोदी सरकार का पहला साल ही पूरा हो रहा है। अभी दिल्ली के चुनाव में चार साल का वक्त है। कांग्रेस की वापसी कराने के लिए राहुल को कम से कम 4 साल का इंतजार तो करना ही होगा। इस बीच कहीं वे फिर चिंतन में चले गए तो?

राहुल सोशल मीडिया के दुलारे नेता हैं। 'पप्पू' को पॉपुलर करने में ट्विटर, फेसबुक और वॉट्सएप का बड़ा योगदान रहा है। राहुल का दूसरा अवतार या राहुल2.0 भी सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। उन्हें जितना फुटेज टीवी पर मिल रहा है, उससे ज्यादा लाइक, कमेंट, फॉरवर्ड और रीट्वीट उन्हें फेसबुक, वॉट्सएप और ट्विटर पर मिल रहे हैं। ये बात और है कि यहां राहुल की तारीफ कम हो रही है, मजाक ज्यादा उड़ाया जा रहा है। राहुल दिल्ली में नेपाल के दूतावास गए और भूकंप पीड़ितों के लिए संवेदना संदेश लिखा तो ट्विटर पर 'खबर'  फैल गई कि राहुल अपने मोबाइल फोन से मैसेज कॉपी कर रहे थे। एक तस्वीर के सहारे पप्पूकान्टराइटसाला हैश-टैग पॉपुलर कर दिया गया। इसी तरह राहुल ने केदारनाथ मंदिर में 'आग जैसी शक्ति' महसूस की तो वॉट्सएप पर ये खबर फैल गई कि 'उल्लू' आरती की थाल पर ही बैठ गया था।



इसे नाकामी कहें या कामयाबी? राहुल अपनी कांस्टीट्यूंसी को टारगेट कर रहे हैं। वे किसानों से मिल रहे हैं। गरीबों की बात कर रहे हैं। उग्र हिंदुत्व की जगह नरम हिंदुत्व की लीक बना रहे हैं। कांग्रेस का प्रचार विभाग उनकी तस्वीरों को प्रचारित कर रहा है। बड़ी ही सावधानी से उनके लिए मुद्दे तलाशे जा रहे हैं। केदार घाटी की पैदल यात्रा भी मोदी सरकार पर हमले की इसी नियोजित रणनीति का हिस्सा है। लेकिन क्या यह सब राहुल के अकेले की बात है? या फिर राहुल के लिए कोई नया जुमलेबाज़, कोई नया रणनीतिकार खोजा गया है? 2014 के चुनाव में कांग्रेस ने दिलीप चेरियन को राहुल के लिए जुमले बनाने का जिम्मा दिया था। उस चुनाव में मोदी के लिए यही काम पीयूष पांडे कर रहे थे। चुनाव नतीजे आए तो भाजपा के साथ पीयूष पांडे जीत गए थे और कांग्रेस के साथ दिलीप चेरियन हार गए। तो क्या अब यही काम किसी नए जुमलेबाज़ को दिया गया है, जो मीडिया की नज़रें बचाकर राहुल के लिए रणनीति बना रहा है। तो फिलहाल सवाल यह नहीं है कि 'पप्पू' पास होगा या नहीं? यह तो 4 साल बाद पता चलेगा। फिलहाल सवाल यह है कि क्या राहुल 59 दिनों तक चिंतन कर रहे थे या नई सोशल कैंपेनिंग की ट्रेनिंग ले रहे थे?

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

चिंदी चोर

लालची गड़ेरिये की कहानी मैंने बचपन में नहीं पढ़ी थी, बल्कि आज ही पढ़ी है। तीसरे दर्जे में पढ़ने वाली बेटी की हिंदी की किताब में। कहानी बड़ी छोटी सी है। इसमें एक लालची गड़ेरिया पहाड़ पर घास चर रही भेड़ों को लुभाने के लिए उन्हें अपनी गुफा के अंदर बुला लेता है और उन्हें बड़े प्यार से खाना खिलाता है। लेकिन अपनी भेड़ों को वह गुफा के बाहर ही छोड़ देता है। रात में भयंकर ठंड से उसकी कई भेड़ें मर जाती हैं और कुछ भेड़ों को भेड़िये खा जाते हैं। अंत में वे भेड़ें भी उसके पास नहीं रहतीं, जिन्हें वो ललचाने की कोशिश कर रहा था। कहानी के अंत में लालच से बचने की सीख दी गई है। यह कहानी पढ़ते ही मुझे उस बैंक का खयाल आ गया, जिससे मैंने फ्लैट खरीदने के लिए कर्ज ले रखा है।

हाल के महीनों में रिजर्व बैंक ने तीन बार बैंक दरों में बदलाव किया है। ये बदलाव बैंक के ग्राहकों के लिए अच्छे दिन के संकेत हैं। अब लोन की ईएमआई का बोझ कम हो जाए तो भला किसे अच्छा नहीं लगेगा। रिजर्व बैंक के एलान के बाद बैंकों में होम लोन पर ब्याज दरें कम करने की होड़ सी मची हुई है। पहले भारतीय स्टेट बैंक ने ब्याज दरें घटाईं, फिर एचडीएफसी बैंक ने और अब आईसीआईसीआई बैंक ने भी ब्याज की दर घटा दी है। दूसरे बैंक भी इसी राह पर हैं। 10.5 और 11 प्रतिशत सालाना की ब्याज दर पर मिलने वाला कर्ज 10 प्रतिशत से कम पर मिलने लगा है। हर रोज अखबारों में इसके विज्ञापन आने लगे हैं। ब्याज दरों में आई इस कमी से बिल्डर और डेवलपर की आंखों में चमक लौट आई है। उन्हें मंदा पड़ा अपना धंधा फिर से पटरी पर आने की उम्मीद जग गई है।

लेकिन मुझे वह खबर अब तक नहीं मिली, जिसकी मुझे उम्मीद थी। जिस बैंक से मैंने कर्ज ले रखा है, उसने मुझे अब तक नहीं बताया है कि उसने मेरे कर्ज पर ब्याज दर घटाया है या नहीं। मुझे पता है कि मैं अकेला नहीं हूं। बहुत संभव है कि आपने भी मेरी तरह कर्ज ले रखा हो और बैंक ने आपकी ईएमआई भी ना घटाई हो। हां, मेरे जो साथी थोड़े सचेत हैं और जिन्होंने बैंक जाकर अपना लोन ट्रांसफर करने की धमकी दे दी है, उनकी ईएमआई जरूर घट चुकी है। लेकिन मैं चाहकर भी बैंक जाने और उसे धमकी देने का समय नहीं निकाल पा रहा।

क्या बैंक लालची गड़ेरिये की तरह काम कर रहे हैं? वे नई भेड़ों (नये ग्राहकों) को तो लुभा रहे हैं, लेकिन हम जैसे पुरानी भेड़ों (पुराने ग्राहकों) को ठिठुरती सर्दी में छोड़ दे रहे हैं। मुझे लगता है कि हां ऐसा ही है। हालांकि इसमें बैंकों के लिए खतरा भी है। इससे उनकी ब्रांड वैल्यू घटती है और ग्राहकों का भरोसा कम होता है। लेकिन जिस बाजार में सभी बैंक यही कर रहे हैं, उसमें ब्रांड वैल्यू या भरोसा घट जाने से डरता कौन है?

पुरानी भेड़ों या पुराने ग्राहकों के साथ बैंकों का यह धोखा आज का नहीं है। पांच वर्ष पहले भी रिजर्व बैंक ने भारतीय बैंक संघ (इंडियन बैंक एसोसिएशन) को चिट्ठी लिखकर पूछा था कि वे अपने पुराने ग्राहकों को ब्याज दर घटने का फायदा क्यों नहीं देते। फरवरी 2015 में रिजर्व बैंक ने होम लोन देने वाले सभी बैंकों से साफ कहा था कि नए और पुराने ग्राहकों के बीच भेदभाव बैंक नियमों का उल्लंघन है। लेकिन बैंकों ने इस बात को एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया। ऐसा करने वालों में सिर्फ प्राइवेट बैंक शामिल नहीं हैं, सरकारी बैंकों ने भी यही किया।

महाजनी प्रथा की जगह जब नया बैंकिंग सिस्टम अस्तित्व में आया था, तब लोगों को यह बताया गया था कि यह नई व्यवस्था ग्राहकों के हित में है। आज भी अर्थशास्त्र की किताबों में यही पढ़ाया जाता है। लेकिन बैंकों की चोरी देखें तो ऐसा मानने में कई तरह के संदेह पैदा होते हैं। ये सच है कि बैंक उस तरह के शोषक नहीं हैं, जैसा महाजन हुआ करते थे। लेकिन मुनाफाखोर वे भी कम नहीं हैं। वे हर वो जानकारी छिपाने की कोशिश में रहते हैं, जिससे आपका थोड़ा फायदा हो सकता है या थोड़ी बचत हो सकती है। जाहिर है यदि आपकी बचत होगी तो उनका फायदा नहीं होगा। दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खड़ी बोली वाले इलाकों में इसे चिंदी चोर कहते हैं। हमारे बैंक असल में चिंदी चोर ही हैं। लेकिन चिंदियां (अठन्नी-चवन्नी) चुराकर भी वे करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं।

प्रायः सभी बैंकों में एक बात कॉमन है। जैसे ही आप बैंक में घुसते हैं, सामने ही हेल्प डेस्क दिखता है। लेकिन वहां बैठा एक्जीक्यूटिव आपको आपके मतलब की सारी जानकारियां नहीं देता। मसलन वह यह नहीं बताता कि अगर आप पुराने और लॉयल कस्टमर हैं तो आप कई सुविधाओं के हकदार हैं। आपको कई तरह के फीस वेवर या रियायत मिल सकती है। इसी तरह बचत खाते में ज्यादा पैसे रखने की जगह यदि आप शॉर्ट टर्म एफडी कर दें तो डेढ़ से दो गुना तक ब्याज पा सकते हैं। आप पूछते नहीं और वे बताते नहीं।

चिंदी चोरों की कमाई के नये तरीकों के बारे में भी जान लीजिए। अगर आगे से आप महीने में पांच बार से ज्यादा बैंक गए तो हो सकता है कि आपको पेनाल्टी देनी पड़ जाए। आईसीआईसीआई बैंक ने यह हद बांध रखी है। एचडीएफसी बैंक ने नियम बना रखा है कि अगर आपने होम ब्रांच से अलग किसी और ब्रांच में पैसा जमा किया तो आपके खाते से इसकी फीस काट ली जाएगी (और आपको बताया भी नहीं जाएगा)। क्रेडिट कार्ड का बिल अगर आपने नकद चुकाया तो बैंक आपके खाते से सर्विस फीस काट लेता है। अगर आप चेक से क्रेडिट कार्ड के बकाये का भुगतान करते हैं और चेक समय पर क्लियर नहीं होता तो तो बैंक आपसे बकाया राशि पर महीने भर का ब्याज जोड़ लेता है। लेकिन अगर आपने अपने बचत खाते में कोई चेक जमा किया है तो वह कितने दिनों में क्लियर होगा, इसकी जवाबदेही बैंक आसानी से नहीं लेता।

आउट स्टेशन चेक क्लियर करने में ज्यादा से ज्यादा 15 दिन लगने चाहिए, लेकिन कई बार बैंक इसमें 15 से 30 दिन लगा देते हैं। इतने दिनों के ब्याज से आप हाथ धो बैठते हैं, लेकिन बैंक इसी से करोड़ों का मुनाफा कमा लेते हैं। असल में आपके खाते में पैसे आने में जितने ज्यादा दिन लगेंगे, उतना ही बैंक के लिए फायदेमंद है। बैंकों को यह पैसा उतने दिनों के लिए फ्री फंड के तौर पर मिल जाता है। 2011 में चेक क्लियर करने में देरी करने से बैंकों को 620 करोड़ की कमाई हुई थी। 2014-15 में यह रकम 800 करोड़ पार कर जाने की संभावना है। लालची गड़ेरिये की कहानी के अंत में गड़ेरिये को सबक मिल जाता है, लेकिन असल जिंदगी के इन चिंदी चोरों को अब तक सबक नहीं मिला है। रिजर्व बैंक इन चिंदी चोरों की नकेल कस सकता है, लेकिन पिछले कई वर्षों से वह वित्त मंत्रालय के पैंतरों से निपटने में ही उलझा हुआ है।