मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

चिंदी चोर

लालची गड़ेरिये की कहानी मैंने बचपन में नहीं पढ़ी थी, बल्कि आज ही पढ़ी है। तीसरे दर्जे में पढ़ने वाली बेटी की हिंदी की किताब में। कहानी बड़ी छोटी सी है। इसमें एक लालची गड़ेरिया पहाड़ पर घास चर रही भेड़ों को लुभाने के लिए उन्हें अपनी गुफा के अंदर बुला लेता है और उन्हें बड़े प्यार से खाना खिलाता है। लेकिन अपनी भेड़ों को वह गुफा के बाहर ही छोड़ देता है। रात में भयंकर ठंड से उसकी कई भेड़ें मर जाती हैं और कुछ भेड़ों को भेड़िये खा जाते हैं। अंत में वे भेड़ें भी उसके पास नहीं रहतीं, जिन्हें वो ललचाने की कोशिश कर रहा था। कहानी के अंत में लालच से बचने की सीख दी गई है। यह कहानी पढ़ते ही मुझे उस बैंक का खयाल आ गया, जिससे मैंने फ्लैट खरीदने के लिए कर्ज ले रखा है।

हाल के महीनों में रिजर्व बैंक ने तीन बार बैंक दरों में बदलाव किया है। ये बदलाव बैंक के ग्राहकों के लिए अच्छे दिन के संकेत हैं। अब लोन की ईएमआई का बोझ कम हो जाए तो भला किसे अच्छा नहीं लगेगा। रिजर्व बैंक के एलान के बाद बैंकों में होम लोन पर ब्याज दरें कम करने की होड़ सी मची हुई है। पहले भारतीय स्टेट बैंक ने ब्याज दरें घटाईं, फिर एचडीएफसी बैंक ने और अब आईसीआईसीआई बैंक ने भी ब्याज की दर घटा दी है। दूसरे बैंक भी इसी राह पर हैं। 10.5 और 11 प्रतिशत सालाना की ब्याज दर पर मिलने वाला कर्ज 10 प्रतिशत से कम पर मिलने लगा है। हर रोज अखबारों में इसके विज्ञापन आने लगे हैं। ब्याज दरों में आई इस कमी से बिल्डर और डेवलपर की आंखों में चमक लौट आई है। उन्हें मंदा पड़ा अपना धंधा फिर से पटरी पर आने की उम्मीद जग गई है।

लेकिन मुझे वह खबर अब तक नहीं मिली, जिसकी मुझे उम्मीद थी। जिस बैंक से मैंने कर्ज ले रखा है, उसने मुझे अब तक नहीं बताया है कि उसने मेरे कर्ज पर ब्याज दर घटाया है या नहीं। मुझे पता है कि मैं अकेला नहीं हूं। बहुत संभव है कि आपने भी मेरी तरह कर्ज ले रखा हो और बैंक ने आपकी ईएमआई भी ना घटाई हो। हां, मेरे जो साथी थोड़े सचेत हैं और जिन्होंने बैंक जाकर अपना लोन ट्रांसफर करने की धमकी दे दी है, उनकी ईएमआई जरूर घट चुकी है। लेकिन मैं चाहकर भी बैंक जाने और उसे धमकी देने का समय नहीं निकाल पा रहा।

क्या बैंक लालची गड़ेरिये की तरह काम कर रहे हैं? वे नई भेड़ों (नये ग्राहकों) को तो लुभा रहे हैं, लेकिन हम जैसे पुरानी भेड़ों (पुराने ग्राहकों) को ठिठुरती सर्दी में छोड़ दे रहे हैं। मुझे लगता है कि हां ऐसा ही है। हालांकि इसमें बैंकों के लिए खतरा भी है। इससे उनकी ब्रांड वैल्यू घटती है और ग्राहकों का भरोसा कम होता है। लेकिन जिस बाजार में सभी बैंक यही कर रहे हैं, उसमें ब्रांड वैल्यू या भरोसा घट जाने से डरता कौन है?

पुरानी भेड़ों या पुराने ग्राहकों के साथ बैंकों का यह धोखा आज का नहीं है। पांच वर्ष पहले भी रिजर्व बैंक ने भारतीय बैंक संघ (इंडियन बैंक एसोसिएशन) को चिट्ठी लिखकर पूछा था कि वे अपने पुराने ग्राहकों को ब्याज दर घटने का फायदा क्यों नहीं देते। फरवरी 2015 में रिजर्व बैंक ने होम लोन देने वाले सभी बैंकों से साफ कहा था कि नए और पुराने ग्राहकों के बीच भेदभाव बैंक नियमों का उल्लंघन है। लेकिन बैंकों ने इस बात को एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया। ऐसा करने वालों में सिर्फ प्राइवेट बैंक शामिल नहीं हैं, सरकारी बैंकों ने भी यही किया।

महाजनी प्रथा की जगह जब नया बैंकिंग सिस्टम अस्तित्व में आया था, तब लोगों को यह बताया गया था कि यह नई व्यवस्था ग्राहकों के हित में है। आज भी अर्थशास्त्र की किताबों में यही पढ़ाया जाता है। लेकिन बैंकों की चोरी देखें तो ऐसा मानने में कई तरह के संदेह पैदा होते हैं। ये सच है कि बैंक उस तरह के शोषक नहीं हैं, जैसा महाजन हुआ करते थे। लेकिन मुनाफाखोर वे भी कम नहीं हैं। वे हर वो जानकारी छिपाने की कोशिश में रहते हैं, जिससे आपका थोड़ा फायदा हो सकता है या थोड़ी बचत हो सकती है। जाहिर है यदि आपकी बचत होगी तो उनका फायदा नहीं होगा। दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खड़ी बोली वाले इलाकों में इसे चिंदी चोर कहते हैं। हमारे बैंक असल में चिंदी चोर ही हैं। लेकिन चिंदियां (अठन्नी-चवन्नी) चुराकर भी वे करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं।

प्रायः सभी बैंकों में एक बात कॉमन है। जैसे ही आप बैंक में घुसते हैं, सामने ही हेल्प डेस्क दिखता है। लेकिन वहां बैठा एक्जीक्यूटिव आपको आपके मतलब की सारी जानकारियां नहीं देता। मसलन वह यह नहीं बताता कि अगर आप पुराने और लॉयल कस्टमर हैं तो आप कई सुविधाओं के हकदार हैं। आपको कई तरह के फीस वेवर या रियायत मिल सकती है। इसी तरह बचत खाते में ज्यादा पैसे रखने की जगह यदि आप शॉर्ट टर्म एफडी कर दें तो डेढ़ से दो गुना तक ब्याज पा सकते हैं। आप पूछते नहीं और वे बताते नहीं।

चिंदी चोरों की कमाई के नये तरीकों के बारे में भी जान लीजिए। अगर आगे से आप महीने में पांच बार से ज्यादा बैंक गए तो हो सकता है कि आपको पेनाल्टी देनी पड़ जाए। आईसीआईसीआई बैंक ने यह हद बांध रखी है। एचडीएफसी बैंक ने नियम बना रखा है कि अगर आपने होम ब्रांच से अलग किसी और ब्रांच में पैसा जमा किया तो आपके खाते से इसकी फीस काट ली जाएगी (और आपको बताया भी नहीं जाएगा)। क्रेडिट कार्ड का बिल अगर आपने नकद चुकाया तो बैंक आपके खाते से सर्विस फीस काट लेता है। अगर आप चेक से क्रेडिट कार्ड के बकाये का भुगतान करते हैं और चेक समय पर क्लियर नहीं होता तो तो बैंक आपसे बकाया राशि पर महीने भर का ब्याज जोड़ लेता है। लेकिन अगर आपने अपने बचत खाते में कोई चेक जमा किया है तो वह कितने दिनों में क्लियर होगा, इसकी जवाबदेही बैंक आसानी से नहीं लेता।

आउट स्टेशन चेक क्लियर करने में ज्यादा से ज्यादा 15 दिन लगने चाहिए, लेकिन कई बार बैंक इसमें 15 से 30 दिन लगा देते हैं। इतने दिनों के ब्याज से आप हाथ धो बैठते हैं, लेकिन बैंक इसी से करोड़ों का मुनाफा कमा लेते हैं। असल में आपके खाते में पैसे आने में जितने ज्यादा दिन लगेंगे, उतना ही बैंक के लिए फायदेमंद है। बैंकों को यह पैसा उतने दिनों के लिए फ्री फंड के तौर पर मिल जाता है। 2011 में चेक क्लियर करने में देरी करने से बैंकों को 620 करोड़ की कमाई हुई थी। 2014-15 में यह रकम 800 करोड़ पार कर जाने की संभावना है। लालची गड़ेरिये की कहानी के अंत में गड़ेरिये को सबक मिल जाता है, लेकिन असल जिंदगी के इन चिंदी चोरों को अब तक सबक नहीं मिला है। रिजर्व बैंक इन चिंदी चोरों की नकेल कस सकता है, लेकिन पिछले कई वर्षों से वह वित्त मंत्रालय के पैंतरों से निपटने में ही उलझा हुआ है। 

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