मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

चिंदी चोर

लालची गड़ेरिये की कहानी मैंने बचपन में नहीं पढ़ी थी, बल्कि आज ही पढ़ी है। तीसरे दर्जे में पढ़ने वाली बेटी की हिंदी की किताब में। कहानी बड़ी छोटी सी है। इसमें एक लालची गड़ेरिया पहाड़ पर घास चर रही भेड़ों को लुभाने के लिए उन्हें अपनी गुफा के अंदर बुला लेता है और उन्हें बड़े प्यार से खाना खिलाता है। लेकिन अपनी भेड़ों को वह गुफा के बाहर ही छोड़ देता है। रात में भयंकर ठंड से उसकी कई भेड़ें मर जाती हैं और कुछ भेड़ों को भेड़िये खा जाते हैं। अंत में वे भेड़ें भी उसके पास नहीं रहतीं, जिन्हें वो ललचाने की कोशिश कर रहा था। कहानी के अंत में लालच से बचने की सीख दी गई है। यह कहानी पढ़ते ही मुझे उस बैंक का खयाल आ गया, जिससे मैंने फ्लैट खरीदने के लिए कर्ज ले रखा है।

हाल के महीनों में रिजर्व बैंक ने तीन बार बैंक दरों में बदलाव किया है। ये बदलाव बैंक के ग्राहकों के लिए अच्छे दिन के संकेत हैं। अब लोन की ईएमआई का बोझ कम हो जाए तो भला किसे अच्छा नहीं लगेगा। रिजर्व बैंक के एलान के बाद बैंकों में होम लोन पर ब्याज दरें कम करने की होड़ सी मची हुई है। पहले भारतीय स्टेट बैंक ने ब्याज दरें घटाईं, फिर एचडीएफसी बैंक ने और अब आईसीआईसीआई बैंक ने भी ब्याज की दर घटा दी है। दूसरे बैंक भी इसी राह पर हैं। 10.5 और 11 प्रतिशत सालाना की ब्याज दर पर मिलने वाला कर्ज 10 प्रतिशत से कम पर मिलने लगा है। हर रोज अखबारों में इसके विज्ञापन आने लगे हैं। ब्याज दरों में आई इस कमी से बिल्डर और डेवलपर की आंखों में चमक लौट आई है। उन्हें मंदा पड़ा अपना धंधा फिर से पटरी पर आने की उम्मीद जग गई है।

लेकिन मुझे वह खबर अब तक नहीं मिली, जिसकी मुझे उम्मीद थी। जिस बैंक से मैंने कर्ज ले रखा है, उसने मुझे अब तक नहीं बताया है कि उसने मेरे कर्ज पर ब्याज दर घटाया है या नहीं। मुझे पता है कि मैं अकेला नहीं हूं। बहुत संभव है कि आपने भी मेरी तरह कर्ज ले रखा हो और बैंक ने आपकी ईएमआई भी ना घटाई हो। हां, मेरे जो साथी थोड़े सचेत हैं और जिन्होंने बैंक जाकर अपना लोन ट्रांसफर करने की धमकी दे दी है, उनकी ईएमआई जरूर घट चुकी है। लेकिन मैं चाहकर भी बैंक जाने और उसे धमकी देने का समय नहीं निकाल पा रहा।

क्या बैंक लालची गड़ेरिये की तरह काम कर रहे हैं? वे नई भेड़ों (नये ग्राहकों) को तो लुभा रहे हैं, लेकिन हम जैसे पुरानी भेड़ों (पुराने ग्राहकों) को ठिठुरती सर्दी में छोड़ दे रहे हैं। मुझे लगता है कि हां ऐसा ही है। हालांकि इसमें बैंकों के लिए खतरा भी है। इससे उनकी ब्रांड वैल्यू घटती है और ग्राहकों का भरोसा कम होता है। लेकिन जिस बाजार में सभी बैंक यही कर रहे हैं, उसमें ब्रांड वैल्यू या भरोसा घट जाने से डरता कौन है?

पुरानी भेड़ों या पुराने ग्राहकों के साथ बैंकों का यह धोखा आज का नहीं है। पांच वर्ष पहले भी रिजर्व बैंक ने भारतीय बैंक संघ (इंडियन बैंक एसोसिएशन) को चिट्ठी लिखकर पूछा था कि वे अपने पुराने ग्राहकों को ब्याज दर घटने का फायदा क्यों नहीं देते। फरवरी 2015 में रिजर्व बैंक ने होम लोन देने वाले सभी बैंकों से साफ कहा था कि नए और पुराने ग्राहकों के बीच भेदभाव बैंक नियमों का उल्लंघन है। लेकिन बैंकों ने इस बात को एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया। ऐसा करने वालों में सिर्फ प्राइवेट बैंक शामिल नहीं हैं, सरकारी बैंकों ने भी यही किया।

महाजनी प्रथा की जगह जब नया बैंकिंग सिस्टम अस्तित्व में आया था, तब लोगों को यह बताया गया था कि यह नई व्यवस्था ग्राहकों के हित में है। आज भी अर्थशास्त्र की किताबों में यही पढ़ाया जाता है। लेकिन बैंकों की चोरी देखें तो ऐसा मानने में कई तरह के संदेह पैदा होते हैं। ये सच है कि बैंक उस तरह के शोषक नहीं हैं, जैसा महाजन हुआ करते थे। लेकिन मुनाफाखोर वे भी कम नहीं हैं। वे हर वो जानकारी छिपाने की कोशिश में रहते हैं, जिससे आपका थोड़ा फायदा हो सकता है या थोड़ी बचत हो सकती है। जाहिर है यदि आपकी बचत होगी तो उनका फायदा नहीं होगा। दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खड़ी बोली वाले इलाकों में इसे चिंदी चोर कहते हैं। हमारे बैंक असल में चिंदी चोर ही हैं। लेकिन चिंदियां (अठन्नी-चवन्नी) चुराकर भी वे करोड़ों का मुनाफा कमा रहे हैं।

प्रायः सभी बैंकों में एक बात कॉमन है। जैसे ही आप बैंक में घुसते हैं, सामने ही हेल्प डेस्क दिखता है। लेकिन वहां बैठा एक्जीक्यूटिव आपको आपके मतलब की सारी जानकारियां नहीं देता। मसलन वह यह नहीं बताता कि अगर आप पुराने और लॉयल कस्टमर हैं तो आप कई सुविधाओं के हकदार हैं। आपको कई तरह के फीस वेवर या रियायत मिल सकती है। इसी तरह बचत खाते में ज्यादा पैसे रखने की जगह यदि आप शॉर्ट टर्म एफडी कर दें तो डेढ़ से दो गुना तक ब्याज पा सकते हैं। आप पूछते नहीं और वे बताते नहीं।

चिंदी चोरों की कमाई के नये तरीकों के बारे में भी जान लीजिए। अगर आगे से आप महीने में पांच बार से ज्यादा बैंक गए तो हो सकता है कि आपको पेनाल्टी देनी पड़ जाए। आईसीआईसीआई बैंक ने यह हद बांध रखी है। एचडीएफसी बैंक ने नियम बना रखा है कि अगर आपने होम ब्रांच से अलग किसी और ब्रांच में पैसा जमा किया तो आपके खाते से इसकी फीस काट ली जाएगी (और आपको बताया भी नहीं जाएगा)। क्रेडिट कार्ड का बिल अगर आपने नकद चुकाया तो बैंक आपके खाते से सर्विस फीस काट लेता है। अगर आप चेक से क्रेडिट कार्ड के बकाये का भुगतान करते हैं और चेक समय पर क्लियर नहीं होता तो तो बैंक आपसे बकाया राशि पर महीने भर का ब्याज जोड़ लेता है। लेकिन अगर आपने अपने बचत खाते में कोई चेक जमा किया है तो वह कितने दिनों में क्लियर होगा, इसकी जवाबदेही बैंक आसानी से नहीं लेता।

आउट स्टेशन चेक क्लियर करने में ज्यादा से ज्यादा 15 दिन लगने चाहिए, लेकिन कई बार बैंक इसमें 15 से 30 दिन लगा देते हैं। इतने दिनों के ब्याज से आप हाथ धो बैठते हैं, लेकिन बैंक इसी से करोड़ों का मुनाफा कमा लेते हैं। असल में आपके खाते में पैसे आने में जितने ज्यादा दिन लगेंगे, उतना ही बैंक के लिए फायदेमंद है। बैंकों को यह पैसा उतने दिनों के लिए फ्री फंड के तौर पर मिल जाता है। 2011 में चेक क्लियर करने में देरी करने से बैंकों को 620 करोड़ की कमाई हुई थी। 2014-15 में यह रकम 800 करोड़ पार कर जाने की संभावना है। लालची गड़ेरिये की कहानी के अंत में गड़ेरिये को सबक मिल जाता है, लेकिन असल जिंदगी के इन चिंदी चोरों को अब तक सबक नहीं मिला है। रिजर्व बैंक इन चिंदी चोरों की नकेल कस सकता है, लेकिन पिछले कई वर्षों से वह वित्त मंत्रालय के पैंतरों से निपटने में ही उलझा हुआ है। 

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

इससे प्यारा कुछ नहीं


यह तस्वीर किसी परिचय या कैप्शन की मोहताज नहीं। इस तस्वीर को आप कई अखबारों के पहले पन्ने पर देख चुके हैं। हिंदी के हों या अंग्रेजी के, लगभग सभी संपादकों ने हजारों तस्वीरों में से इस एक तस्वीर को ढूंढ़ निकाला। भूकंप के असर से धराशायी हुई इमारतों, मलबे में दबे इंसानी शरीरों, राहत और बचाव के काम में लगे देवदूतों और घर वापस आने के लिए हवाई अड्डे पर इंतजार करते लोगों की तस्वीरें इसके आगे फीकी पड़ गईं। नेपाल की राजशाही के प्रतीक दरबार हॉल और नेपाल के कुतुब मीनार कहे जाने वाले भीमसेन टॉवर के भग्नावशेष भी इस तस्वीर के आगे कहीं नहीं टिके। इस तस्वीर को खींचने के लिए कोई फ्रेम नहीं बनाया गया होगा। फोटोग्राफर ने 'स्माइल' नहीं बोला होगा। फिर भी इसमें जिंदगी झलक आई। इस तस्वीर में उम्मीद है। इसमें भविष्य है।
क्या आपने 8 महीने की इस बच्ची की आंखें देखी हैं? उसे नहीं पता कि उसके देश में क्या हुआ है? भूकंप ने कितने लोगों की जिंदगी छीन ली है? वो तो अपने पापा के लिए रो रही थी। ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसके पापा उससे इतनी देर तक दूर रहे हों। लेकिन 25 और 26 तारीख को वे चौबीस घंटे से भी ज्यादा समय तक उसके सामने नहीं आए। वो नहीं जानती कि उसके पापा ईंट और पत्थरों के नीचे दब गए थे। उनकी अपनी छत उनके लिए कब्र बनने वाली थी। इस बच्ची के लिए धरती का डोलना 'खबर' नहीं थी। उसके लिए तो उसके आकाश यानी पापा का दूर चले जाना ही सबसे बड़ा सदमा था। मगर उसके पापा लौट आए, मौत को मात देकर, करीब 24 घंटे तक मलबे में दबे रहकर। पिता ने बेटी को देखा तो उनके लिए धरती स्थिर हो गई। बेटी ने पापा को देखा तो उसे आकाश मिल गया।
पापा को देखकर बेटी की आंखें चमक आईं और बिटिया को देखकर पापा की आंखों से आंसू छलक आए। कोई गिला नहीं, कोई शिकायत नहीं। शिकायत उस ऊपर वाले से भी नहीं, जिसने पल भर में इनकी दुनिया बदलने का इंतजाम कर दिया था और पल भर में सारी खुशियां इनकी झोली में उड़ेल दीं। पिता के सिर पर अब भी पट्टी बंधी है और कलाई की धमनियों में ड्रिप लगा हुआ है, लेकिन उसकी परवाह किसे है। इनके लिए दुनिया फिर से आबाद हो गई है। भूकंप के दर्द से नेपाल बरसों तक कराहता रहेगा। लेकिन ये तस्वीर उसे हौसला देगी। हौसला इस बात का कि भविष्य सुरक्षित है। हौसला इस बात का भी कि भविष्य के बीज को सुरक्षित रखने वाले हाथ भी महफूज हैं। 

रविवार, 26 अप्रैल 2015

उल्टा चांद


पढ़े-लिखे वॉट्सऐपी-फेसबुकी-इंटरनेटी जमात के लिए चांद का मुंह टेढ़ा नहीं हुआ, बल्कि दिन के उजाले में ही चांद उलट गया। गोल-मटोल चांद ने पलटी कैसे मारी और पलटने पर उसके हाथ-पैर नीचे से ऊपर आए या ऊपर से नीचे? चांद का सिर कहां गया और पेट-पीठ का क्या हुआ? छोड़िए इन सब बातों को। यहां यह सब सोचने की फुर्सत किसे है? अभी तो हम अंडरग्राउंड वाटर में ज़हरीली गैस मिल जाने से हलकान हुए जा रहे हैं। गला सूख रहा है, लेकिन पानी पीने की हिम्मत नहीं हो रही। सीलबंद बोतल बगल में है, लेकिन इन कंपनियों का क्या भरोसा? क्या पता ज़हरीला पानी ही भर दिया हो? प्यास बुझाने के लिए जान थोड़े ही ना दे देंगे। वो तो भला हो छत्तीसगढ़ मौसम विभाग का जिसने वक्त रहते बता दिया कि 13.4 तीव्रता का भूकंप आने वाला है, नहीं तो बेमौत मारे जाते। अब भूकंप चाहे रात के 10 बजे आए या दो बजे, हम तो जगे ही रहेंगे।

अब तो नासा वालों ने भी कह दिया है कि प्रलय आने वाला है। देखा, हमारे छत्तीसगढ़ मौसम विभाग को! नासा से भी तेज़ गति है हमारी। वी आर प्राउड ऑफ बीईंग इंडियन! अच्छा चलो! गांधी मैदान चलो! जल्दी करो! रात में वहीं सोएंगे। मां-बाउजी को भी ले चलो। गद्दा ले चलते हैं ना। मच्छरदानी भी रख लेना। मच्छर काटेंगे तो लगा लेंगे। ऑडोमॉस तो ले ही लेना। क्या पता मच्छरदानी लगाने का जुगाड़ बने या ना बने! अच्छा तुम तैयारियां करो, मैं जरा दूसरे लोगों को भी मैसेज फॉरवर्ड कर देता हूं। उनकी जान भी बचानी है। अरे हां, आज रात साढ़े तीन बजे कॉस्मिक किरणें भी धरती के पास से गुजर रही हैं। अपना मोबाइल फोन स्विच ऑफ करके रखना, वरना ब्लास्ट हो सकता है। वो तो अच्छा हुआ वॉट्सऐप का कि सारी खबरें टाइम से मिल जाती हैं। वरना कब का राम नाम सत् हो जाता।

पप्पू भइया जाने कब से कह रहे थे कि अपने फोन में ही इंटरनेट लगवा लो। बड़े काम की चीज है। सारी जानकारी मिलती रहती है। आदमी अप-टू-डेट रहता है। कंप्यूटर में इंटरनेट हो तो कुछ पता नहीं चलता। जब तक लॉग इन करो, सिगनल मिले, साइट खोलो, तब तक तो जाने क्या से क्या हो जाता है। हम ही बुरबक थे, जो पप्पू भइया की बातों पर ध्यान नहीं दे रहे थे। लेकिन अब चिंता की कोई बात नहीं है। अब हम भी अप-टू-डेट रहते हैं। सारी जानकारी चकाचक मिलती रहती है। अब देखो काठमांडू के ओबेराय होटल के स्विमिंग पूल में सुनामी आई तो सबसे पहले मेरे ही पास वीडियो आया था। विशाखापत्तनम वाले गन्नू भैया ने भेजा था। मैंने ही यहां सारे मुहल्ले को फॉरवर्ड किया तब जाकर उनको पता कि भूकंप क्या चीज होती है, प्याले में तूफान ला देती है।

वॉट्सऐप पर हमने एक चीज सीख ली है। यहां फॉरवर्ड यहां रहना है तो फॉरवर्ड करना पड़ता है। फॉरवर्ड नहीं किया तो बैकवर्ड का ठप्पा लग जाएगा। कोई नई चीज आए तो उसे रोको मत। बस जाने दो। सबको बताने से ही उनका भला होगा। वैसे यहां भी बकैत कम नहीं हैं। जब देखो नुस्ख निकालते रहते हैं। सही-गलत का हिसाब बताते रहते हैं। वकालत सीखी नहीं, खुद को जज समझने लगते हैं। अरे, सही-गलत के चक्कर में पड़े रहेंगे तब तो किसी दिन अर्थी उठ जाएगी हमारी। और क्या हम ही हुए हैं फैसला करने वाले। और लोग नहीं है क्या? अरे भाई बता रहे हैं तो देख लो। मानना ना मानना तुम्हारी मर्जी। जय राम जी की। और हां, वो गोमांस के बिजनेस वाला मैसेज जो मैंने फॉरवर्ड किया था, उसे पढ़ा कि नहीं। फॉरवर्ड कर देना भइया। 15 ग्रुप में फॉरवर्ड करना है, तभी कृपा आएगी। जय राम जी की।

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

लटक गया! मर गया क्या?

किसानों की जमीन के बहाने अपनी सियासी जमीन पुख्ता करने का मंच सजा हुआ था। आप के नेता किसानों की बदहाली पर तकरीरें दे रहे थे। मंच से चंद कदमों की दूरी पर खड़े नीम के पेड़ पर गजेंद्र सिंह एक हाथ में झाड़ू और दूसरे हाथ में अपने गले का अंगोछा लेकर खुदकुशी की तैयारी में थे। दौसा से आए गजेंद्र अपना सुसाइड नोट नीचे फेंक चुके थे जो आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के हाथों से होता हुआ मंच तक पहुंच चुका था। मंच पर आप के आशुकवि नेता कुमार विश्वास हाथों में माइक थामे हुए थे।


कुमार पूरे विश्वास से कह रहे थे, देश का अन्नदाता संकट में है। जो भी हमारा साथी पेड़ पर चढ़ गया है, उससे ये कहना है कि वो नीचे आ जाए। वो अगर नीचे आ जाएगा तो ज्यादा बेहतर होगा। मंच पर आ जाए। आपसे मुख्यमंत्री मिल लेंगे। उपमुख्यमंत्री मिल लेंगे। मैं संगठन के लोगों से कहता हूं। हां... आ गया कि नहीं... पुलिस के साथियो से अनुरोध है उनसे अनुरोध करें कि वो नीचे आ जाए। वो ऐसा कोई काम ना करे जिससे बात खराब हो। वो मंच पर आ सकते हैं। अपनी बात कह सकते हैं। उप मुख्यमंत्री यहां पर हैं। उप मुख्यमंत्री यहां पर हैं। वो कृपापूर्वक नीचे आ जाएं।

मंच के नीचे केजरीवाल जिंदाबाद... जिंदाबाद जिंदाबाद के नारे गूंज रहे थे। आप के कुछ कार्यकर्ता नीम के पेड़ से लेकर मंच तक दौड़-भाग कर रहे थे और हालात का ब्योरा अपने नेताओं तक पहुंचा रहे थे। तभी किसी कार्यकर्ता ने खबर दी कि उसने तो फंदा लगा लिया। हं...लटक गया! मर गया?’ कुमार विश्वास ने यह इशारों में पूछा था। उनके मुंह से कोई शब्द नहीं निकला, लेकिन मंच की ओर लगे कैमरों ने सब पकड़ लिया। गर्दन की ओर उठते हाथों ने कुमार विश्वास के इरादों की चुगली कर दी।


दौसा के गजेंद्र की मौत की खबर दिल्ली के नेताओं को मिल चुकी थी। किसान की मौत के बावजूद किसान रैली जारी रही। लेकिन बोल बदल गए। माइक अब भी कुमार विश्वास के हाथों में ही था। अब वे कह रहे थे, जो भी प्रशासन-शासन के लोग उनकी सहायता कर सकते हों, वो तुरंत उसे नीचे लेकर आएं और किसानों के हित की इस लड़ाई को दागदार ना होने दें। इसको बदनुमा ना होने दें। और पुलिस यहां पर थी। जब पुलिस को सूचना है तो दिल्ली पुलिस क्या कर रही है? इसका मतलब क्या है? यह योजनाबद्ध तरीके से काम हो रहा है? क्या यह योजनाबद्ध तरीके से काम हो रहा है? किसानों के हित की बात को दबाने के लिए, आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए। पिछले दो महीने से केंद्र की सरकार परेशान है कि किसी प्रकार से अरविंद केजरीवाल की सरकार को बदनाम किया जा सके। हम सबसे बात करने के लिए तैयार हैं। हम लगातार संवाद करने के लिए तैयार हैं। कृपापूर्वक आप कोई ऐसी बात ना करें। जो भी हमारा साथी हो, उसको नीचे लेकर आएं।



अब तक मंच पर चुपचाप बैठे अरविंद केजरीवाल भी अब निर्देश देने लगे थे। वे इशारा कर रहे थे और कुमार विश्वास उनके इशारों पर बोले जा रहे थे, पुलिस ऊपर चढ़े और उस साथी को मनाकर नीचे लेकर आएं। पुलिस के जो साथी हैं, वे उसको लेकर आएं नीचे... और पुलिस की प्रेजेंस में अगर वह ऊपर गया है तो पुलिस इस बात का जवाब दे कि आपके सामने ऐसा क्यों हुआ। पार्टी के कार्यकर्ता मंच तक लगातार संदेश पहुंचा रहे थे और विश्वास कहे जा रहे थे, पुलिस वहां पर है, नीचे बैठी है। इसका मतलब क्या आप योजनापूर्वक यह काम कर रहे हैं? आप किसानों की लाशों पर खेलते हैं। हिंदुस्तान की लाशों पर खेलते हैं आप। दिल्ली पुलिस से हमारा अनुरोध है कि वह कृपापू्र्वक ऐसे काम न करे।


गजेंद्र सिंह के फांसी के फंदे पर झूल जाने के बाद भी 72 मिनट तक आम आदमी पार्टी की रैली चलती रही। केजरीवाल किसानों के हक के लिए केंद्र सरकार पर हमला बोलते रहे। गजेंद्र के लटक जाने, उनके मर जाने का पता तो पहले ही चल चुका था, लेकिन रैली खराब ना हो इसके लिए उनकी मौत की खबर को दबाकर रखा गया। पेड़ से उतारकर जो चीज राम मनोहर लोहिया अस्पताल भेजी गई, वह सिर्फ लाश थी। गजेंद्र तो पहले ही सियासत की भेंट चढ़ चुके थे। अब आरोपों और प्रति-आरोपों का सिलसिला चलेगा। कल रात नेताओं को नींद आई। जी नहीं, गजेंद्र ने उनकी नींद नहीं छीनी। वे तो सुबह की सियासत की तैयारियां करते रहे।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

‘सरकार’ का डर!


यहां कुछ लिखने या कहने की जरूरत ही नहीं है। तस्वीर खुद बोल रही है। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व महासचिव संजय जोशी की तस्वीर वाला यह होर्डिंग नागपुर में लगा है। वही नागपुर, जहां केंद्र की सरकार चला रही भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है। संजय जोशी इसी संघ के प्रचारक हैं, जैसे कभी नरेंद्र मोदी हुआ करते थे। मोदी आज प्रधानमंत्री हैं और संजय जोशी कहीं नहीं हैं। अब इसमें कोई राज़ नहीं है कि नरेंद्र मोदी संजय जोशी को पसंद नहीं करते। संजय जोशी से मिलना या उनसे बातें करना तो दूर, उनका नाम लिया जाना भी मोदीजी को पसंद नहीं। अब चूंकि भाजपा में इन दिनों मोदी का कहा ही आखिरी सत्य है, इसलिए पार्टी में भी संजय जोशी का नाम लेने पर रोक है।

फिर भी कुछ लोग हैं जो सारे खतरे उठाकर भी संजय जोशी को याद रखे हुए हैं। इनमें मोदी सरकार के कुछ मंत्री भी हैं। उन्होंने संजय जोशी के जन्मदिन पर बधाई संदेश भिजवाए तो पार्टी ने उनसे इस हुक्मउदूली का कारण पूछ लिया। लेकिन इससे भाजपा में संजय जोशी के प्रति प्यार कम नहीं हुआ। दिल्ली में भाजपा मुख्यालय और इसके बड़े नेताओं के घर-दफ्तर के बाहर संजय जोशी के पोस्टर लगा दिए गए, जिसमें उनकी घर वापसी कराने की मांग की गई। दिल्ली के बाद अब नागपुर में इसी तरह के पोस्टर और होर्डिंग्स लगे हैं।

यहां सवाल यह नहीं है कि संजय जोशी के पोस्टर कौन लगा रहा है। सवाल यह है कि सरकारउसका पता क्यों नहीं लगा पा रहे? सरकार तो सर्वशक्तिमान हैं। उनके पास पुलिस के लंबे हाथ हैं। उनके पास खुफिया विभाग की असंख्य आंखें हैं। उनके पास जासूसों का दिमाग है। फिर भी यह पता नहीं चल पा रहा कि ये पोस्टर कौन लगाता है? वह कहां से आता है और पोस्टर लगाकर कहां चला जाता है? ये पोस्टर कहां छपते हैं? उनके ऑर्डर कौन देता है? कौन उनका मजमून बनाता है? इनका फ्रेम या निगेटिव कहां तैयार होता है? पोस्टरों के छपने पर उनकी डिलीवरी कौन लेता है और पोस्टरों को चिपकाने कौन जाता है?

यह तो आप मानेंगे ही कि सरकारचाहे तो 2 घंटे के अंदर इसके पीछे लगे लोगों का पता लगा लें। पुलिस चाहे तो उसे अंदर कर दे। आईबी चाहे तो पल भर में उसे ठिकाने लगा दे। लेकिन सरकार ऐसा कुछ नहीं कर रहे। आखिर क्यों? क्या संजय जोशी सरकार का डर हैं?


संजय जोशी वही व्यक्ति हैं जिनके भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रहने तक नरेंद्र मोदी दिल्ली आने से कतरा रहे थे। 2012 के चुनाव में वे यूपी में प्रचार करने नहीं गए थे। उसी साल भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक से ठीक पहले संजय जोशी से जुड़ी एक सीडी सामने आई और उन्हें भाजपा के महासचिव पद से इस्तीफा देना पड़ा। संजय जोशी के इस्तीफे के बाद ही मोदी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में शरीक हुए और फिर दिल्ली दरबार की सियासत का श्रीगणेश किया।

सीडी कांड में संजय जोशी को क्लीन चिट मिल चुकी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें फिर से अपना लिया, लेकिन भाजपा ने उनसे दूरी कम करने की कोई कोशिश नहीं की। भाजपा नेताओं की बैठकों में, इसके दफ्तरों में, यहां तक कि राज्य इकाइयों में भी संजय जोशी का नाम लेने पर अघोषित पाबंदी है। तो फिर संजय जोशी की वापसी कौन चाहता है?

क्या यह भाजपा को भरमाने की कांग्रेसी (या किसी और पार्टी की) साजिश है? इस संभावना से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता। किंतु यदि ऐसा होता तो कम से कम उन मोहरों को तो पकड़ ही लिया जाता जिनका इस खेल में इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है और एक शहर के बाद दूसरे शहर में, एक जगह के बाद दूसरी जगह पर पोस्टर चिपकाए जा रहे हैं। यानी इस खेल में किसी और पार्टी का हाथ होने की संभावना नहीं के बराबर है। 

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

‘राम’ से कैसे मुक़ाबला करेंगे सीताराम?

किस इंतजार में हैं कॉमरेड?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीआई (एम) या माकपा को आपने आखिरी बार सुर्खियों में कब देखा था? इसके कॉमरेड्स को  आखिरी बार सड़कों पर कब देखा था? 2015 के चौथे महीने तक तो ऐसा नहीं हुआ। 2014 या 2013 में भी शायद ही ऐसा कोई वाकया याद आता हो, जब किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से ज्यादा इस पार्टी के नेताओं की कोई पूछ रही हो। इन दिनों 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ सियासी माहौल गर्म है, लेकिन गरीबों-मजदूरों की पार्टी सीन से गायब है। इस कानून के विरोध का नेतृत्व कांग्रेस के हाथों में है, जिसे मार्क्सवादी कॉमरेड कभी जमींदारों की पार्टी कहा करते थे। चुनावी अखाड़े में मोदी की पार्टी से दो-दो हाथ करने के लिए जनता परिवार के पुराने घटक दलों ने फिर से हाथ मिलाया है, लेकिन उस सीन में भी माकपा कहीं नहीं है। तो फिर माकपा है कहां?

पिछले कई दिनों से सीपीआई (एम) के कॉमरेड अपनी पार्टी कांग्रेस में व्यस्त थे। विशाखापत्तनम में हुई पार्टी कांग्रेस में सारे कॉमरेड भविष्य की दिशा तय करने के लिए जमा हुए थे। यहीं पार्टी का नया महासचिव भी चुना गया। सीपीआई (एम) अब सीताराम के कहे पर चलेगी। सीताराम यानी सीताराम येचुरी। वे अच्छे वक्ता हैं। पढ़े-लिखे कॉमरेड हैं। हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर उनकी पकड़ है। वे चुटीली टिप्पणियां करते हैं। संसद में अच्छा बोलते हैं। लेकिन उनका पोलित ब्यूरो कैसा है? वही पुराने चेहरे, वही पुराने थके-हारे कॉमरेड, जो पिछले कई दशकों से पार्टी चला रहे हैं। वही आगे भी सीपीआई (एम) को चलाएंगे? पोलित ब्यूरो में चार सदस्यों- हानन मुल्ला (69), मोहम्मद सलीम (58), सुभासिनी अली (67) और जी रामकृष्णन (65) को पहली बार मौका मिला है। लेकिन इनमें से कोई भी जमीनी लडा़ई में जनता के बीच उतरकर जनाधार बढ़ाने वाला नेता नहीं है।



पोलित ब्यूरो के नए-पुराने चेहरों को देखने से साफ हो जाता है कि आने वाले दिनों में भी यह पार्टी कोई आंदोलन खड़ा नहीं करने जा रही। विशाखापत्तनम में पार्टी महासचिव का चुनाव भी आसानी से नहीं हो पाया। केरल के कॉमरेड किसी तेलूगु कॉमरेड को कमान देने के हक में नहीं थे। उनका जोर 77 साल के रामचंद्रन पिल्लई को महासचिव बनाने पर था। कुछ कॉमरेड तो महासचिव चुनने के लिए गुप्त मतदान भी कराना चाहते थे, जबकि परंपरागत रूप से माकपा महासचिव का चुनाव आम सहमति से ही होता रहा है।

खैर, किसी तरह सीताराम चुन लिए गए। माकपा के जनरल सेक्रेट्री चुने जाने के बाद येचुरी ने जो पहला बयान दिया, उसमें उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी केंद्र सरकार की जनता-विरोधी और मजदूर-विरोधी नीतियों का विरोध करेगी। इसके साथ ही सांप्रदायिकता के खिलाफ भी लड़ती रहेगी। लेकिन कैसे? यह सब कैसे होगा? पार्टी का आगे का रोडमैप क्या होगा, इस बारे में सीपीआई (एम) के नेता खामोश हैं।

यूपीए-1 सरकार में लाल सलाम वाली इस पार्टी का जलवा था। लोकसभा में इसके 50 से ज्यादा सांसद थे और मनमोहन सिंह की सरकार कोई भी बड़ा फैसला इस पार्टी से पूछे बिना नहीं करती थी। लेकिन 2008 में सरकार ने अमेरिका के साथ न्यूक्लिर डील क्या की, कॉमरेड ने हंगामा खड़ा कर दिया। सरकार से समर्थन खींचने की जिद ठान ली और समर्थन खींच भी लिया। लेकिन सरकार झुकी नहीं। उसने मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी को एक साथ साध लिया। सरकार बच गई और 2009 के चुनाव में कॉमरेड को मुंह की खानी पड़ी। 2011 में इस पार्टी का अभेद्य दुर्ग यानी पश्चिम बंगाल ममता के हाथों में चला गया।

ममता ने राइटर्स बिल्डिंग पर ही कब्जा नहीं किया, बल्कि पश्चिम बंगाल में इस पार्टी के ढांचे का भी तृणमूलीकरण कर दिया। जमीनी स्तर पर माकपा के लिए काम करने वाले काडर अब तृणमूल के लिए काम करते हैं। 2011 के बाद से पश्चिम बंगाल में जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें माकपा कभी तृणमूल को टक्कर भी नहीं दे पाई। पश्चिम बंगाल के हालिया निकाय चुनावों में माकपा के कार्यकर्ताओं की पिटाई हुई, लेकिन कॉमरेड उसकी निंदा करने की स्थिति में भी नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में इस पार्टी का काडर बेस छीज चुका है, इसलिए सड़क पर उतरकर विरोध करने की सोची भी नहीं जा रही। क्या यह हैरान करने वाली बात नहीं है कि जिस न्यूक्लियर डील के चलते माकपा ने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस खींच लिया था, उस तरह की दो डील मोदी सरकार ने भी कर ली है। एक फ्रांस के साथ और दूसरे कनाडा के साथ। मगर माकपा की कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दिखी।

माकपा इतनी बेजार, इतनी लाचार कभी नहीं रही। 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) से अलग होने के समय भी इस पार्टी का जनाधार आज से कहीं ज्यादा था। विचारों के स्तर पर माकपा में हमेशा ही उत्तेजना का जोर रहा। दीवारों पर लाल स्याही से लिखे इसके नारे पश्चिम बंगाल और केरल में ही नहीं, दिल्ली और मुंबई, यहां तक कि बिहार में भी सियासी चर्चा का मुद्दा बन जाते थे। लेकिन आज इसके धुर वामपंथी विचारों पर नक्सलवादियों का कब्जा हो चुका है और राजनीतिक सोच पर सियासत की नासमझी हावी है। ऐसे में थके-हारे-वृद्ध कॉमरेडों के सहारे राजनीतिक परिवर्तन की उम्मीद करना बेमानी है।



किसी भी राजनीतिक विचारधारा को जनता से खाद-पानी मिलता है। आम लोगों से जितना ज्यादा संपर्क रहता है, पार्टी उतनी ही जीवंत रहती है। माकपा जनता से कटी हुई है, इसीलिए उसकी जीवंतता खत्म हो रही है। ऐसे में पार्टी के लिए जरूरी है संवाद, सीधे जनता से उसका संपर्क। ऐसे समय में जबकि दूसरी पार्टियां संचार के आधुनिक साधनों और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके नौजवानों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए मरी जा रही हैं, माकपा उन सबसे दूर है। थके-हारे-वृद्ध कॉमरेड रातों-रात ट्विटर, फेसबुक और गूगल प्लस का इस्तेमाल करने लगेंगे, ऐसी उम्मीद भी नहीं की जा सकती। लेकिन यह बात समझ से परे है कि वे अपनी गतिविधियों को मीडिया से दूर क्यों रखते हैं? माकपा की पार्टी कांग्रेस को भी खबरों में जगह तभी मिली, जब भाजपा के राम से मुकाबले के लिए सीताराम के हाथों में कमान थमाए जाने की खबर बाहर आई।

संचार के जिस दौर में माकपा चल रही है वह एकदम परंपरावादी मॉडल है। जन-संचार माध्यमों के जानकार इसे अ-संचार कहते हैं। नए जमाने में जब कम्युनिकेशन के बिना क्रांति भी मुर्दा समझी जाती है, माकपा का केंद्रीय नेतृत्व दम साधे बैठा है। क्या कॉमरेड इस इंतजार में हैं कि आने वाले दिनों में जनता का संकट और गहरा होगा और वह उनके पार्टी मुख्यालय के दरवाजे पर आकर दस्तक देगी कि कॉमरेड उठो, जागो और हमारा नेतृत्व करो! 

रविवार, 19 अप्रैल 2015

अन-वांटेड !

विचाराधीन... अर्थात् जिन पर विचार किया जा रहा है। शब्द व्यापक है, लेकिन इसका इस्तेमाल प्रायः दो संदर्भों में ही होता है। 'विचाराधीन' का सबसे ज्यादा इस्तेमाल उन योजनाओं या फाइलों के लिए होता है जिन्हें सरकार या सरकारी बाबू किसी ना किसी बहाने लटकाये रखते हैं। विचाराधीन मुकदमे भी होते हैं, जो कोर्ट में लटके रहते हैं। पूछने पर कहा जाता है कि अमुक चीज विचाराधीन है। 'विचाराधीन' शब्द का दूसरा इस्तेमाल उन कैदियों के लिए होता है जो जुर्म साबित हुए बिना जेल में सड़ते रहते हैं। हमारा संदर्भ दूसरे से है।
भारत की अलग-अलग जेलों में करीब पौने चार लाख कैदी बंद हैं, जिनमें से ढाई लाख से ज्यादा कैदी विचाराधीन हैं। इन विचाराधीनों में से कई तो 25-30 साल से जेलों में बंद हैं, क्योंकि उन पर कभी विचार हुआ ही नहीं। इनमें से ज्यादातर कैदी चोरी, बेटिकट यात्रा, नशे में ड्राइविंग या मारपीट जैसे मामूली आरोपों में पकड़े गए हैं। यदि वक्त पर उनके मामलों की सुनवाई हो जाती, उन पर विचार हो जाता तो वे अरसा पहले जेल से बाहर आ चुके होते। क्योंकि जिन आरोपों में उन्हें पकड़ा गया था, उनमें होने वाली अधिकतम सज़ा वे पहले ही जेल में काट चुके हैं।
सिद्धांततः भारतीय कानून कहता है कि किसी बेगुनाह को सज़ा नहीं होनी चाहिए, भले ही कितने ही मुजरिम सज़ा से बच जाएं। लेकिन हम सब जानते हैं कि देश के हर थाने, हर पुलिस चौकी में इसका मखौल उड़ता है। हर जेल में इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ती हैं। लोग 30-30 साल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में गुजार देते हैं और कई तो जेल में ही मर भी जाते हैं, लेकिन उनके मामले पर विचार नहीं हो पाता। ये पता नहीं चल पाता कि असल में उन्होंने कोई अपराध किया भी था या नहीं।


अब जरा मुंबई चलते हैं। यहां की एक अदालत में 13 साल पुराने हादसे का मुकदमा चल रहा है यानी कोर्ट में केस पर विचार चल रहा है। इस मुकदमे के आरोपी हैं सलमान खान। मुकदमे की चार्जशीट के मुताबिक 28 सितंबर 2002 को सलमान खान की टोयोटा लैंड क्रूजर कार सड़क से कूदकर फुटपाथ पर जा चढ़ी थी, जिसमें वहां सो रहे एक मजदूर की मौत हो गई थी और चार दूसरे मजदूर घायल हो गए थे। सलमान पर शराब पीकर लापरवाही से गाड़ी चलाने का केस दर्ज हुआ था। 11 साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद लोअर कोर्ट के जज को लगा कि मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, गैरइरादतन हत्या का है।


कोर्ट के आदेश पर मुकदमे की धाराएं बदल गईं और केस सेशन कोर्ट में पहुंच गया। सेशन कोर्ट में भी करीब दो साल से सुनवाई हो रही है। कई बार लगा कि अब तो फैसला आ ही जाएगा। सलमान खान के सिर पर लटक रहे खतरे और उनके जेल जाने की अटकलें शुरू हो गईं। हिसाबी लोगों ने ये गुणा-गणित भी कर लिया कि सलमान सलाखों के पीछे जाएंगे तो हिंदी सिनेमा को कितने सौ करोड़ का नुकसान होगा। लेकिन जिस दिन कोर्ट का फैसला आना था, उसी रोज से सच्चाई बाहर आ रही है।
सलमान खान के वकीलों ने कुछ गवाहों से जिरह ना हो पाने का कानूनी इक्का फेंका और फैसला टल गया। तब से अब तक हम ये जान चुके हैं कि हादसे की रात सलमान खान गाड़ी नहीं चला रहे थे, इसलिए उनके खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाने का केस नहीं बनता। सलमान ने तो इतनी शराब भी नहीं पी थी कि होश खो बैठें, इसलिए शराब पीकर किसी की जान से खिलवाड़ करने का केस भी झूठा है। गाड़ी तो अशोक सिंह नाम का ड्राइवर चला रहा था और टायर फटने की वजह से गाड़ी सड़क किनारे एक दुकान से जा टकराई थी। यानी गलती ड्राइवर अशोक सिंह की भी नहीं है। तो जी, गलती तो उस टायर की है, जो फट गया था। और हां, वहां कोई फुटपाथ भी नहीं था। गवाहों ने किसी फुटपाथ की बात नहीं की है तो फुटपाथ कहां से आया। असल में चार्जशीट ही झूठी है। गाड़ी तो बस दुकान से टकराई थी। घायल होने वाले मजदूर कहां से आए, ये हमें नहीं पता।
13 साल तक चले मुकदमे में अभियोजन पक्ष की ओर से 27 गवाह पेश किए गए थे, जिन्होंने अपनी आंखों से वो हादसा देखा था, जिन्होंने एक मजदूर को मरते देखा था, सलमान को लड़खड़ाते हुए ड्राइविंग सीट से उतरते देखा था और उन्हें हादसे की जगह से भागते हुए देखा था। 13 साल तक ये मुकदमा हिट एंड रन केस ही कहलाता रहा। लेकिन झूठ! सब झूठ था!


सलमान 'भाई' के वकील श्रीक्रांत शिवड़े ने सच्चाई बता दी है। सलमान ड्राइविंग सीट से इसलिए उतरे थे क्योंकि उनकी तरफ का दरवाजा जाम हो गया था और लड़खड़ा इसलिए रहे थे क्योंकि हादसा देखकर उनका मासूम मन विचलित हो गया था। जहां तक भागने की बात है तो वे अपनी जान बचाने के लिए भागे थे, क्योंकि 50-60 लोगों की भीड़ लाठी-डंडों से लैस होकर सलमान खान को घेर चुकी थी और उनके लिए जान की हिफाजत करना जरूरी था। सबसे बड़ी बात ये कि मजदूर की मौत तो सलमान की लैंड क्रूजर से हुई ही नहीं। वह तो उस क्रेन की गलती से मारा गया था, जो सलमान की गाड़ी को उठाने के लिए वहां बुलाया गया था। क्रेन के ड्राइवर की गलती से सलमान की लैंड क्रूजर कार हवा से जमीन पर आ गिरी थी, जिससे दबकर एक बेचारे मजदूर की मौत हो गई।

13 साल तक ये सच्चाई सामने नहीं आई तो क्या हुआ। अब तो सच्चाई सामने है। किसी बेगुनाह को सज़ा कैसे दी जा सकती है? किसी हिंदी फिल्म के स्क्रिप्ट की तर्ज पर आज कोर्ट का आखिरी सीन रिकॉर्ड होने वाला है। कल फैसले की घड़ी है। सवाल है कि क्या कोर्ट का फैसला भी स्क्रिप्ट के हिसाब से होगा? क्या बेगुनाह सलमान को सज़ा मिलेगी? या असल गुनहगार टायर को तलाशा जाएगा?

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

भैय्या जी स्माइल!

25 जनवरी 2015 को बराक ओबामा गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि बनकर भारत आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर उनकी अगवानी की। ओबामा को रिसीव करने वे खुद एयरपोर्ट पहुंचे और एअरफोर्स वन से उतरते ही ओबामा को गले लगा लिया। ओबामा के साथ गले लगने और उनकी पीठ थपथपाने की मोदी की तस्वीर कुछ ही मिनटों में वायरल हो गई। इंटरनेट ने उन तस्वीरों को होनोलूलू से लेकर मंगोलिया तक फैला दिया। लेकिन उस ऐतिहासिक’ भरत-मिलाप से पहले भी कुछ हुआ था। उस वाकये को एएनआई के कैमरे ने पकड़ भी लिया, लेकिन उसे कहीं तवज्जो नहीं मिली।



हुआ यों कि भरत मिलाप की तस्वीरों को कैद करने के लिए जो कैमरे लगे थे, उनके आगे एक बाधा आकर खड़ी हो गई थी। दाल-भात में मूसलचंद की तरह एअरफोर्स वन की सीढ़ियों के ठीक सामने अमेरिकी राष्ट्रपति की कार द बीस्ट आ खड़ी हुई थी। भारतीय प्रधानमंत्री ने वहां खड़े प्रोटोकॉल अधिकारी से उस कार को थोड़ा साइड में कराने को कहा  (ताकि फोटो बढ़िया आए)। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात सीआईए एजेंट ने बीस्ट को एक इंच भी खिसकाने से मना कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति को गले लगाने जा रहे प्रधानमंत्री की बात एक अदने से सिक्योरिटी एजेंट ने खारिज कर दी थी, इस बात की खीझ मोदीजी के चेहरे पर तब तक झलकती रही, जब तक ओबामा अपने वीवीआईपी प्लेन से बाहर नहीं आ गए।

दिल्ली एयरपोर्ट की जमीं पर ओबामा के कदम रखते ही प्रधानमंत्री मोदी लपककर उनसे मिले, लेकिन गले लगाने से पहले वो पिक्चर परफेक्ट होने का इंतजार करते रहे। ओबामा जब प्रोटोकॉल अधिकारियों से हाथ मिलाने के बाद अपनी कार की ओर बढ़ने जा रहे थे, तभी मोदी उनका हाथ पकड़कर बीस्ट के आगे ले आएजहां कैमरा और उनके बीच कोई बाधा नहीं थी। अब फ्रेम परफेक्ट था और मोदीजी ने बिना कोई देर किए ओबामा को गले लगा लिया। कैमरे को वो तस्वीर मिल गई, जिसका इंतजार था।




हैदराबाद हाउस में मिस्टर प्राइम मिनिस्टर ने शामियाना लगाकर ओबामा के साथ चाय पर चर्चा की। मोदी और ओबामा के लिए हैदराबाद हाउस के लॉन में शामियाना लगाया गया था, जहां भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति को अपने हाथों से चाय सर्व की। ओबामा के साथ इसी वन-टू-वन मुलाकात के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मोदी के निजी संबंधों की गरमाहट की चर्चा होने लगी।



ओबामा से पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे, जिनका स्वागत सत्कार अहमदाबाद में साबरमती के किनारे हुआ था। मोदीजी ने अपने गुजरात में जिनपिंग को झूला झुलाया। गांधी के साबरमती आश्रम में जिनपिंग को जिन-जिन गलियारों से गुजरना था और जिन-जिन कमरों में जाना था, वहां कैमरे लगे थे। जिनपिंग का चरखा चलाना और मोदी का उन्हें सूत कातना सिखाना सुर्खियों में छाता रहा और पीएम का सीना गर्व से चौड़ा होता रहा।




अभी हाल में मोदी फ्रांस गए तो राष्ट्रपति फ्रास्वां ओलांद के साथ उन्होंने नाव पर चर्चा की। सीन नदी की लहरों पर मोदीजी की नाव हिचकोलें खाती रही और वे चाय की चुस्कियों के साथ राफेल खरीद के पुराने सौदे को रद्द करके नई डील के बारे में बातें करते रहे। जर्मनी में चांसलर एंजेला मर्केल के साथ उन्होंने बालकनी में चर्चा कर ली। हनोवर मेस में मौका मिलते ही सरकारी कैमरामैन ने मेक इन इंडिया प्रोग्राम के लोगो के साथ मर्केल और मोदी की तस्वीर उतार ली और परफेक्ट पिक्चर मिलते ही पीएमओ के ट्विटर हैंडल ने उसे लक्ष्य तक पहुंचा दिया।




भारतीय प्रधानमंत्री जब जापान गए थे तो प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ मछलियों को भोजन कराने निकले थे। मौका मिला तो पीएम ने ड्रम भी बजा लिया था। ऑस्ट्रेलिया में प्रधानमंत्री टोनी एबॉट के साथ वे क्रिकेट वर्ल्ड कप की झलक लेने पहुंच गए थे। ये सारी तस्वीरें सबसे पहले खुद मोदीजी ने दुनिया को दिखाईं। लेकिन क्योंजरा सोचिए अगर पीएम ने जिनपिंग को झूला ना झुलाया होता तो क्या चीन के साथ भारत के रिश्ते और खराब हो गए होते या झूला झुलाने से चीनी सैनिकों ने घुसपैठ बंद कर दी? अगर मोदी और ओबामा की चाय पर चर्चा शामियाने में ना होकर किसी कमरे में होती और मोदी वहीं चाय सर्व करते तो ओबामा के साथ उनके रिश्ते बिगड़ जातेअगर फ्रांस में पीएम मोदी राष्ट्रपति ओलांद के साथ नाव पर चर्चा ना करते तो राफेल फाइटर खरीदने का सौदा ना होता?





शरीर की भाषा पढ़ने वाले दुनिया भर के विशेषज्ञ यह बात नोटिस कर चुके हैं कि जब भी कोई तस्वीर क्लिक होती है तो सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी को पता होता है कि कैमरे का फोकस कहां है और खुद कैमरा कहां है। पीएमओ के ट्विटर एकाउंट और फेसबुक पेज पर जो तस्वीरें जारी होतीं हैं, उनमें मोदी सीधे कैमरे की ओर देख रहे होते हैं।

भारत की जनता के बारे में कहा जाता है कि कि उसकी स्मृति क्षणिक है। पब्लिक को यह याद नहीं रहता कि ओबामा भारत आए तो देश को क्या हासिल हो गया या जिनपिंग आए थे तो चीन के साथ रिश्ते कितने बदल गए। मोदी के जापान और ऑस्ट्रेलिया दौरे का हासिल भी लोग भूल चुके हैं। प्रधानमंत्री के फ्रांस, जर्मनी और कनाडा के दौरे से भारत ने क्या पाया, ये भी लोग भूल जाएंगे। लेकिन तस्वीरों को भुलाना उतना आसान नहीं होता। तस्वीरें याद रहती हैं। वे इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। मोदी जी भी इतिहास रच रहे हैं। आने वाला वक्त क्या मोड़ लेगा, शायद कोई नहीं जानता। इतिहास मोदी का आकलन किस रूप में करेगा, यह भी अभी पता नहीं है। लेकिन ये तस्वीरें मोदी को अमर कर देंगी। कोशिश करके भी उन्हें भुलाना संभव नहीं होगा।