मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

बंद दरवाजे खोल दो

बंद दरवाजे खोल दो

 
दिल्ली नोएडा डायरेक्ट यानी डी-एन-डी। यह वह रास्ता है जिससे दिल्ली और नोएडा के बीच आनेजाने वाले लोगों का रोज साबका पड़ता है। हर रोज यहां से गुजरने के लिए पैसे चुकाने पड़ते हैं। बिना मोल दिए आप यमुना के इस पुल को पार नहीं कर सकते। इसके दरवाजे पैसे की झंकार से ही खुलते हैं। पहली नज़र में ऐसा लगता है जैसे यहां कोई नमक का दारोगा बैठा है, जो ईमानदारी से नमक का कर वसूल रहा है। और कर ना चुकाने पर आपको चुटकी भर नमक भी पुल के पार ले जाने की अनुमति नहीं मिलेगी।

डीएनडी फ्लाईवेः चोखा धंधा
 
यह नमक कर नहीं है। इसे टोल कहते हैं। देश आजाद है, लेकिन कानून वैसा ही है जैसा अंग्रेजों ने बनाया था। ब्रितानी हूकुमत ने नमक जैसी रोजमर्रा की चीज पर कर लगाया था। आजाद हिंदुस्तान की सरकार ने कहीं आने-जाने पर कर लगाया है। वैसे तो संविधान नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने की इजाजत देता है, लेकिन बिना पैसे दिए आप डी-एन-डी या कोई भी टोल गेट पार नहीं कर सकते। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अपनी गाड़ी में बैठे हैं या किसी बस में। आप टोल दिए बिना आगे नहीं जा सकते।
 
7 फरवरी 2001 को डी-एन-डी आम लोगों के खोला गया था। असल में उस दिन यमुना का यह रास्ता पैसे ना चुकाने वालों के लिए बंद कर दिया गया था। यहां टोल नाके लगा दिए गए थे। डी-एन-डी का निर्माण बूट (BOOT) मॉडल यानी बिल्ड, ओन, ऑपरेट एंड ट्रांसफर मॉडल के तहत हुआ था। नोएडा टोल ब्रिज कंपनी लिमिटेड (NTBCL) के खाते-बही कहते हैं कि इसने 9.2 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने में 408 करोड़ रुपये खर्च किए थे। बूट मॉडल के मुताबिक सरकार ने कंपनी को यह पैसा वसूले जाने तक यहां से गुजरने वाली गाड़ियों से टोल वसूलने की आजादी दी है। यानी टोल एक ऐसा कर है, जो सरकारी खाते में नहीं जाता। यह कंपनी के खाते में जाता है।
 
अब जरा इस कंपनी की आमदनी का ब्योरा देखिए। 31 मार्च 2014 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में नोएडा टोल ब्रिज कंपनी लिमिटेड (NTBCL) ने 119 करोड़ 37 लाख का टोल वसूला, जिसमें ऑपरेशनल खर्चों और सरकारी टैक्स को निकाल दें तो भी 54 करोड़ 75 लाख का मुनाफा था। इससे पिछले साल यानी 2012-13 में इस कंपनी ने 106 करोड़ 6 लाख का टोल वसूला और 42 करोड़ 11 लाख का मुनाफा कमाया। फिर भी पिछले 14 सालों में कंपनी अपनी लागत नहीं वसूल पाई और बूट मॉडल का टी (T) यानी ट्रांसफर अमल में नहीं आ पाया।
 
यह सिर्फ डी-एन-डी का हाल नहीं है। आप चाहे यूपी में रहें या महाराष्ट्र में, मध्य प्रदेश से गुजरें या पश्चिम बंगाल से, टोल से बच नहीं सकते। मुंबई, पुणे और कोल्हापुर के टोल नाकों पर राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के हिंसक प्रदर्शनों के बाद वहां की सरकार ने गिनती के कुछ सड़कों को टोल फ्री करने का एलान किया है, लेकिन बहुसंख्य सड़कों पर अब भी टोल वसूला जा रहा है। कुछ सड़कों पर तो लागत के 10 गुना से भी ज्यादा टोल वसूला जा चुका है, फिर भी टोल खत्म करने का फैसला लटका हुआ है।
 
2005 में केंद्र सरकार ने हाईवे बनाने में निजी कंपनियों की मदद लेने का फैसला किया था। तब यह तर्क दिया गया था कि इससे नई सड़कों के निर्माण में तेज़ी आएगी और सड़कों की क्वालिटी अच्छी होगी। नीतिगत फैसला ये था कि निजी पैसा सिर्फ वहीं लगेगा जहां चार लेन या उससे ज्यादा लेन की सड़क बनाने की जरूरत होगी। सड़क में पैसा लगाने वाला निवेशक अधिकतम 30 साल तक टोल वसूलने का हकदार होगा और समय सीमा समाप्त होते ही वो सड़क को सरकार के हवाले कर देगा। लेकिन ज्यादातर निजी कंपनियों ने अपना पैसा वहां लगाया, जहां पहले से ही सड़क मौजूद थी। उन्होंने सड़कों की मरम्मत की। उन्हें चौड़ा किया। और हां, काम पूरा होने से पहले ही टोल वसूलना शुरू कर दिया। दिल्ली-हरिद्वार रूट पर बना टोल गेट ऐसा ही एक उदाहरण है। 2011 के अंत तक देश में 209 टोल प्लाजा थे। आज उनकी तादाद 500 से भी ज्यादा है।
 
टोल के खिलाफ पब्लिक का गुस्सा जब-तब भड़कता भी रहता है। स्थानीय लोगों के गुस्से से बचने के लिए कई जगहों पर उन्हें फ्री में टोल गेट पास करने की सहूलियत भी है। अघोषित तौर पर उनके लिए एकदम किनारे का कोई एक गेट खुला रहता है। इससे टोल वसूलने वाली कंपनी स्थानीय लोगों के गुस्से से बची रहती है। उनके खिलाफ हंगामा नहीं होता और धंधा चलता रहता है।

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