गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

‘बजरंग’ और ‘संकट मोचन’ अलग क्यों?


नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ। नाम बदल जाने से पहचान बदल जाती है। नाम बदलने से व्यक्तित्व बदल जाता है। ऐसा सिर्फ इंसानों के साथ नहीं होता। देवता भी इससे अछूते नहीं रहते। वरना क्या कारण है कि बजरंग और संकट मोचन से अलग-अलग छवि उभरती है। ये दोनों नाम एक ही देवता के हैं जिन्हें सारा हिंदू समाज रामभक्त हनुमान के नाम से जानता है। बजरंग यानी वज्र के समान अंगों वाले महाबली और संकट मोचन अर्थात संकटों से छुटकारा दिलाने वाले हनुमान।

                                           


देवता एक ही हैं, लेकिन नए जमाने में जब भी बजरंग का नाम सुनाई पड़ता है तो गुजरात दंगों के आरोपी बजरंगी पहलवान का चेहरा कौंध जाता है। और जब प्रवीण तोगड़िया किसी को मेरे प्यारे बजरंगियों संबोधित करते हैं तो रामभक्त हनुमान का ख्याल दूर-दूर तक मन में नहीं आता। तोगड़िया का संबोधन सुनकर अगर कोई अक्स उभरता है तो वह कट्टरता की घुट्टी पिलाए हुए धर्मांध नौजवानों का होता है जो अपने दलपति के इशारे पर किसी भी व्यवस्था को तहस-नहस करने पर आमादा रहते हैं। बजरंग के विपरीत संकट मोचन के साथ कोई संकट नहीं है। संकट मोचन सुनकर सिर्फ हनुमान याद आते हैं।

भाषा विज्ञान के जानकार बजरंग के संदर्भ को अर्थ संकुचन और अर्थ परिवर्तन का उदाहरण कहकर समझाते हैं। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक परिस्थिति विशेष में किसी एक निश्चित अर्थ या संदर्भ में बार-बार इस्तेमाल होने पर उस शब्द का अर्थ बदल जाता है। बजरंग के संदर्भ में यही हुआ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके सहोदर संगठनों ने बजरंग का अर्थ संकुचित कर दिया है। मगर संकट मोचन इस अर्थ संकुचन और अर्थ परिवर्तन से बच गया।

गोरी तेरे नैन कजर बिन काले


वाराणसी का संकट मोचन मंदिर हनुमान भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र है। वैसे तो इस देश में हनुमान के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, किंतु वाराणसी के इस मंदिर जितनी ख्याति किसी की नहीं है। इसी मंदिर के प्रांगण में छे दिनों का संगीत समारोह चल रहा है। समारोह के पहले दिन ही यहां पाकिस्तान के मशहूर गजल गायक उस्ताद गुलाम अली साहब ने ठुमरी पेश की। रात सवा एक बजे से शुरू हुआ सिलसिला भोर तक चलता रहा और लोग मंत्रमुग्ध हो सुनते रहे। गुलाम अली साहब के मधुर बोल, हारमोनियम के सुर और सितार की झंकार के अलावा वहां सिर्फ तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी। एक हिंदू मंदिर में पाकिस्तान के गजल गायक की प्रस्तुति कट्टर बजरंगियों की आंखों में चुभने वाली थी, लेकिन संकट मोचन के भक्तों को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखा।

वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में 1928 से ही हर साल संगीत समारोह हो रहा है। यह पहला मौका है जब इस मंदिर में सरहद के उस पार से कोई कलाकार आया। लेकिन यहां मुसलमान कलाकार हमेशा आते रहे हैं। इस बार भी यहां सरोद शिरोमणि उस्ताद अमजद अली खान और उनके बेटे अमान व अयान भाग ले रहे हैं। और इसमें हैरानी क्या है? 14 वर्ष पहले इसी संगीत समारोह में सुबह के सवा चार बजे, जिस वक्त संकट मोचन की पहली आरती की बेला होती है, पंडित जसरात ने मंदिर के गर्भगृह की ओर हाथ उठाकर अल्लाह अल्लाह का अलाप लिया था। पंडितजी के गाने पर तब भी किसी को आश्चर्य नहीं हुआ था, आपत्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए।

हर-हर मोदी घर-घर मोदी


यह वही वाराणसी है, जहां उस्ताद विस्मिल्लाह खान साहब शहनाई के सुरों को गंगा और महादेव को अर्पित करते थे। तब भी किसी ने आपत्ति नहीं की थी। यकीनन वह हर-हर मोदी घर-घर मोदी का जमाना नहीं था। लेकिन आज तो जमाना वही है। इसके बावजूद बजरंग और संकट मोचन के अर्थ भिन्न हैं तो इसके पीछे कहीं ना कहीं संगीत का भी हाथ है। कहते हैं कि संगीत जोड़ता है। कभी मौका मिले तो संकट मोचन संगीत समारोह में जरूर जाइए। वहां आप जानेंगे कि बात सोलह आने सच है। संगीत में सिर्फ जोड़ने की ताकत होती है। यहां तोड़ने की सोची भी नहीं जाती। संगीत की तरह संकट मोचन भी मुक्त करते हैं। बजरंग ने अपना अर्थ बदल लिया है, लेकिन जब तक संकट मोचन हैं तो संकटों से क्या घबराना।


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