रविवार, 12 अप्रैल 2015

आपके बॉस कितना कमाते हैं?

आपकी सैलरी कितनी है? अपने देश में यह सवाल पूछना अच्छा नहीं माना जाता। कहते हैं कि किसी से उसकी आमदनी नहीं पूछनी चाहिए, खास तौर पर मर्दों से। तो चलिए, अपनी सैलरी मत बताइए, लेकिन क्या आपको अपने बॉस की सैलरी पता है? क्या कभी आपने अपने बॉस के बॉस की, फिर उनके बॉस की, फिर कंपनी के सबसे बड़े बॉस यानी सीईओ, एमडी की सैलरी सोची है? आपकी सैलरी और कंपनी के सबसे बड़े बॉस की सैलरी में कितने गुणे का अंतर है? आपकी कंपनी के सीईओ या एमडी एक घंटे में जितना कमाते हैं, उतना कमाने के लिए आपको कितने घंटे काम करने पड़ेंगे? दस गुणा, बीस गुणा, तीस गुणा, पचास-सौ गुणा? आखिर कितने का अंतर है आप दोनों की सैलरी में?

गोपनीयता को धर्मवाक्यों की तरह पवित्र मानने वाले इस देश में सीईओ, एमडी की सैलरी बताने की परंपरा नहीं है, ना ही इस बारे में कोई कानून है। हां, शेयर बाजार में जिन कंपनियों के शेयर बेचे व खरीदे जाते हैं, उनके लिए ये बाध्यता जरूर है कि अपनी सालाना रिपोर्ट में सीईओ, एमडी की सैलरी का खुलासा करे। लेकिन यह जानकारी कंपनी के शेयरधारकों को मिलती है, उसके दूसरे कर्मचारियों को नहीं। जो कंपनियां सेबी के दायरे से बाहर हैं, उनके लिए यह बाध्यता भी नहीं है। जो कंपनियां अपनी सालाना रिपोर्ट में सीईओ, एमडी की सैलरी का खुलासा करती हैं, वो भी यह नहीं बतातीं कि उसके यहां सबसे कम पगार पाने वाले कर्मचारी और सीईओ की सीटीसी (Cost to Company) में कितने का अंतर है, कितने गुणे का अंतर है।



धुर पूंजीवादी माने जाने वाले देश अमेरिका में पिछले 5 वर्षों से ऐसी कोशिश हो रही है कि सबसे कम पगार पाने वाले कर्मचारी और कंपनी के सीईओ की सैलरी में एक निश्चित अनुपात से ज्यादा का अंतर ना हो। 2010 में अमेरिकी कांग्रेस ने इस बारे में एक कानून भी बनाया था, जिसे डॉड और फ्रैंक कानून के नाम से जाना जाता है। इसमें एस एंड पी 500 में शामिल सभी कंपनियों से कहा गया था कि वे सबसे कम और सबसे ज्यादा वेतन पाने वाले कर्मचारी की सैलरी का अंतर और उनका अनुपात बताया करे। इससे उस कंपनी के कर्मचारियों में संतोष का स्तर (Satisfaction level) पता चल सकेगा और उस कंपनी में पैसा लगाने वाले निवेशक इस बात का ज्यादा अच्छी तरह अंदाज़ा लगा पाएंगे कि कंपनी के सामान्य कर्मचारी अपनी उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कितने प्रेरित हैं।

अमेरिकी कंपनियां इस सरकारी कानून को नहीं मान रहीं। गिनती की कुछ कंपनियों ने ही सबसे कम और सबसे ज्यादा पगार वाले कर्मचारियों की आमदनी के अनुपात का खुलासा किया है। लेकिन अमेरिका थोड़ा अलग सोचने वाला मुल्क है। वहां निवेशक जागरुकता भी थोड़ी अलग किस्म की है। व्यापारिक खबरों और आंकड़ों के व्यापार में शामिल कई संगठन और संस्थाएं इस तरह के आंकड़े जारी करती रहती हैं। उन्हें प्रामाणिक भी मानना चाहिए, क्योंकि जरा सी लापरहवाही होने पर भी उनके खिलाफ किसी निवेशक को मूर्ख बनाने के आरोप में करोड़ों डॉलर के हर्जाने का मुकदमा दायर हो सकता है। ऐसा ही एक संगठन है एएफएल-सीआईओ (AFL-CIO)।



एएफएल-सीआईओ के मुताबिक 2013 में एक औसत अमेरिकी सीईओ की तनख्वाह उसकी कंपनी के बाकी कर्मचारियों की तनख्वाह का 331 गुणा था और सबसे कम तनख्वाह पाने वाले कर्मचारी की आमदनी का 774 गुणा। वॉलमार्ट के सीईओ के एक घंटे की आमदनी की बराबरी करने के लिए इसी कंपनी के किसी आम कर्मचारी को 1372 घंटे काम करने पड़ते हैं। दूसरे शब्दों में 1372 लोग एक घंटे काम करके जितना कमाते हैं, उतना इस कंपनी के सीईओ को बस एक घंटे काम करने के एवज में मिल जाता है। 2014 में आई-फोन बनाने वाली कंपनी एप्पल ने अपने सीईओ टिम कुक को 92 लाख डॉलर की तनख्वाह दी। सैलरी के अलावा टिम कुक को कंपनी के मुनाफे का हिस्सा भी मिला और स्टॉक ऑप्शन के तहत कंपनी के शेयर भी। इन्हें मिलाकर 2014 में टिम कुक ने कुल 11 करोड़ 50 लाख डॉलर (करीब 700 करोड़ रुपये) कमाए, जबकि दक्षिण-एशिया में एप्पल के असेंबलिंग यूनिट्स में काम करने वाले औसत कर्मचारियों को प्रति घंटे 2 डॉलर की रकम पाने के लिए भी हड़ताल पर बैठना पड़ा।

सीईओ और सामान्य मजदूरों की आमदनी में हमेशा अंतर रहा है। लेकिन दिनों-दिन यह अंतर बढ़ता ही जा रहा है। एएफएल-सीआईओ के आंकड़ों के मुताबिक 1968 में यह अनुपात करीब 20 गुणे का था और आज 774 गुणे का है। यानी समय के साथ सीईओ और टॉप मैनेजमेंट की सैलरी बस बढ़ती ही चली जा रही है, मगर औसत कर्मचारियों की पगार नहीं बढ़ रही। कंपनी का मुनाफा बढ़ाने, उत्पादकता बढ़ाने और उसकी ब्रांडिंग सुधारने के लिए शेयर धारक सीईओ या एमडी को मोटी तनख्वाह देने को तैयार रहते हैं लेकिन वही शेयर धारक आम कामगारों की सैलरी बढ़ाने को राजी नहीं होते, क्योंकि कंपनी की माली हालत इसकी इजाजत नहीं देती

2008 में अमेरिका की मंदी (सब-प्राइम क्राइसिस) का खुलासा तब हुआ, जब वहां के इनवेस्टमेंट बैंकर्स ने अपने एक्जीक्यूटिव्स की सैलरी में भारी बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा, जिसे ठुकरा दिया गया। अमेरिका के रियल इस्टेट सेक्टर में पैसा लगाने वाले पांच बड़े बैंक भारी नुकसान झेल रहे थे और हालात बदलने के लिए अपने सीईओ व टॉप एक्जीक्यूटिव्स की सैलरी दोगुनी करके उन्हें प्रोत्साहन देना चाहते थे। यानी जिन सीईओ और एक्जीक्यूटिव्स ने बिजनेस बढ़ाने के नाम पर जोखिम वाले कर्ज बांटे थे, उन्हें ही पुरस्कार मिलने वाला था।

मंदी की मार मिडिल क्लास के लाखों लोगों पर पड़ी। उनकी नौकरी चली गई। छोटे-मोटे धंधे बंद हो गए। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए और बीयर स्टेर्न्स, गोल्डमैन सैच्स, लेहमैन ब्रदर्स, मेरिल लिंच और मॉर्गन स्टैनली जैसे बैंकों को सहारा देने के लिए कांग्रेस ने इन बैंकों को 700 अरब डॉलर से भी ज्यादा का राहत पैकेज दिया। लेकिन इस राहत पैकेज की रकम से बिजनेस को पटरी पर लाने से पहले सभी बैंकों ने अपने टॉप एक्जीक्यूटिव्स की सैलरी बढ़ा दी। यहां जो देने वाला था, वही लेने वाला था। यह मामला कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे भारतीय संसद में सांसदों की सैलरी बढ़ाने का फैसला आम राय से हो जाता है। उसी तरह कंपनियों के सीईओ और एमडी अपनी सैलरी बढ़ाने के लिए किसी के मोहताज नहीं रहते।

भारत में उदारीकरण का दौर आए 24 वर्ष गुजर चुके हैं, मगर अब भी ज्यादातर कंपनियां परिवारों के नियंत्रण में हैं। फर्ज कीजिए, किसी कंपनी का सीईओ, सीएमडी का बेटा है और कंपनी के 11 निदेशकों में से 6 एक ही परिवार के हैं। तो उस कंपनी (या परिवार) के लिए सीएमडी, सीईओ और बोर्ड औफ डायरेक्टर्स के सदस्यों का वेतन और भत्ते बढ़ाने में क्या दिक्कत है? भले ही कंपनी के आम कामगारों की सैलरी बढ़ाने के लिए कंपनी के खाते में पैसे ना हो, लेकिन इनकी सैलरी बढ़ जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता।



ऐसी पारिवारिक कंपनियों पर जब भी कोई संकट आता है, तब वे अपने कामगारों को आगे कर देती हैं और हजारों, लाखों लोगों के पेट पर लात ना पड़ जाए, ये दुहाई देते हुए सरकार से राहत की मांग करने लगती हैं। विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर एयरलाइन्स इसकी जबरदस्त मिसाल है। कंपनी डूब रही थी, तब भी इसके बड़े अधिकारियों और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की लाइफ स्टाइल में कोई बदलाव नहीं आया। किंगफिशर के पायलट, क्रू मेंबर, ग्राउंड स्टाफ और सपोर्ट स्टाफ सैलरी के लिए सड़क पर धरना देते रहे और मोटी तनख्वाह पर रखे गए सीईओ और एक्जीक्यूटिव्स प्रोमोटर्स की संपत्ति को नीलाम होने से बचाने का जतन करते रहे।

जिस अर्थव्यवस्था में रोजगार कम हों और बेरोजगार ज्यादा, वहां शर्तें प्रोमोटर्स की चलती हैं। किसी भी तरह एक नौकरी की तलाश में निकलने वाला व्यक्ति नौकरी देने वाली कंपनी के सीईओ की तनख्वाह नहीं पूछ सकता। रिटायरमेंट की अवस्था तक नौकरी करने पर भी शायद वो कभी अपने सीईओ की आमदनी का अंदाज़ा नहीं लगा पाता। यह काम सरकार कर सकती है। सरकार को करना भी चाहिए। पीएफ और पेंशन फंड जैसी स्कीमों में गरीब और मध्य वर्ग के लोगों ने पैसे लगाए हैं। सरकार इसी पैसे से खड़म-खड़म चलती अर्थव्यवस्था को बुलेट ट्रेन बनानी चाहती है। मगर इस पैसे को शेयर बाजार में लगाने से पहले एक शर्त बांधी जा सकती है कि इन फंड्स का पैसा उन्हीं कंपनियों में लगेगा, जिसमें सीईओ और आम कामगार की सैलरी में एक निश्चित अनुपात से ज्यादा का अंतर ना हो। जो कंपनियां इस अनुपात का पालन ना करें, उनमें ना तो पब्लिक फंड का निवेश हो, ना ही उन्हें कोई दूसरी सरकारी मदद मिले। सरकार यदि इतना भी कर दो फिलहाल के लिए काफी होगा।

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