यहां कुछ लिखने या कहने की जरूरत ही नहीं है। तस्वीर खुद बोल रही है। भारतीय
जनता पार्टी के पूर्व महासचिव संजय जोशी की तस्वीर वाला यह होर्डिंग नागपुर में
लगा है। वही नागपुर, जहां केंद्र की सरकार चला रही भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय है। संजय जोशी इसी संघ के प्रचारक हैं, जैसे कभी
नरेंद्र मोदी हुआ करते थे। मोदी आज प्रधानमंत्री हैं और संजय जोशी कहीं नहीं हैं।
अब इसमें कोई राज़ नहीं है कि नरेंद्र मोदी संजय जोशी को पसंद नहीं करते। संजय
जोशी से मिलना या उनसे बातें करना तो दूर, उनका नाम लिया जाना भी मोदीजी को पसंद
नहीं। अब चूंकि भाजपा में इन दिनों मोदी का कहा ही आखिरी सत्य है, इसलिए पार्टी
में भी संजय जोशी का नाम लेने पर रोक है।
फिर भी कुछ लोग हैं जो सारे खतरे उठाकर भी संजय जोशी को याद रखे हुए हैं। इनमें
मोदी सरकार के कुछ मंत्री भी हैं। उन्होंने संजय जोशी के जन्मदिन पर बधाई संदेश
भिजवाए तो पार्टी ने उनसे इस हुक्मउदूली का कारण पूछ लिया। लेकिन इससे भाजपा में संजय
जोशी के प्रति प्यार कम नहीं हुआ। दिल्ली में भाजपा मुख्यालय और इसके बड़े नेताओं
के घर-दफ्तर के बाहर संजय जोशी के पोस्टर लगा दिए गए, जिसमें उनकी घर वापसी कराने
की मांग की गई। दिल्ली के बाद अब नागपुर में इसी तरह के पोस्टर और होर्डिंग्स लगे हैं।
यहां सवाल यह नहीं है कि संजय जोशी के पोस्टर कौन लगा रहा है। सवाल यह है कि ‘सरकार’ उसका पता क्यों नहीं लगा पा रहे? ‘सरकार’ तो
सर्वशक्तिमान हैं। उनके पास पुलिस के लंबे हाथ हैं। उनके पास खुफिया विभाग की
असंख्य आंखें हैं। उनके पास जासूसों का दिमाग है। फिर भी यह पता नहीं चल पा रहा कि
ये पोस्टर कौन लगाता है? वह कहां से आता है और पोस्टर लगाकर कहां चला जाता है? ये पोस्टर कहां छपते हैं? उनके ऑर्डर कौन देता है? कौन उनका मजमून बनाता है? इनका फ्रेम या निगेटिव कहां तैयार होता है? पोस्टरों के छपने पर उनकी डिलीवरी कौन लेता है और पोस्टरों
को चिपकाने कौन जाता है?
यह तो आप मानेंगे ही कि ‘सरकार’ चाहे तो 2 घंटे के अंदर इसके पीछे लगे लोगों का पता लगा लें। पुलिस चाहे तो उसे
अंदर कर दे। आईबी चाहे तो पल भर में उसे ठिकाने लगा दे। लेकिन ‘सरकार’ ऐसा कुछ नहीं कर रहे। आखिर क्यों? क्या संजय जोशी ‘सरकार’ का डर हैं?
संजय जोशी वही व्यक्ति हैं जिनके भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रहने तक नरेंद्र
मोदी दिल्ली आने से कतरा रहे थे। 2012 के चुनाव में वे यूपी में प्रचार करने नहीं
गए थे। उसी साल भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक से ठीक पहले संजय जोशी से
जुड़ी एक सीडी सामने आई और उन्हें भाजपा के महासचिव पद से इस्तीफा देना पड़ा। संजय
जोशी के इस्तीफे के बाद ही मोदी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में शरीक
हुए और फिर दिल्ली दरबार की सियासत का श्रीगणेश किया।
सीडी कांड में संजय
जोशी को क्लीन चिट मिल चुकी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें फिर से अपना
लिया, लेकिन भाजपा ने उनसे दूरी कम करने की कोई कोशिश नहीं की। भाजपा नेताओं की
बैठकों में, इसके दफ्तरों में, यहां तक कि राज्य इकाइयों में भी संजय जोशी का नाम
लेने पर अघोषित पाबंदी है। तो फिर संजय जोशी की वापसी कौन चाहता है?
क्या यह भाजपा को
भरमाने की कांग्रेसी (या किसी और पार्टी की) साजिश है? इस संभावना से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता। किंतु
यदि ऐसा होता तो कम से कम उन मोहरों को तो पकड़ ही लिया जाता जिनका इस खेल में
इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है और एक शहर के बाद
दूसरे शहर में, एक जगह के बाद दूसरी जगह पर पोस्टर चिपकाए जा रहे हैं। यानी इस खेल
में किसी और पार्टी का हाथ होने की संभावना नहीं के बराबर है।
तो क्या बीजेपी के ही लोग संजय जोशी की वापसी चाहते हैं? इसी संभावना में बल है। क्योंकि सिर्फ यही एक संभावना है जिसमें ‘सरकार’ चाहकर भी उन लोगों पर कार्रवाई नहीं कर पा रहे जो पोस्टर लगा रहे हैं। क्योंकि अगर वे ऐसा करेंगे तो एक ‘अदने’ से पूर्व संगठन महासचिव के प्रति उनकी खुन्नस जाहिर हो जाएगी और महामानव का जो तिलिस्म तैयार किया गया है, वह टूट जाएगा। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ शीर्षक कविता में गजानन माधव मुक्तिबोध ने रात के अंधेरे में पोस्टर लगाने वाले कुछ रहस्यमय लोगों का चित्र खींचा है। इसी कविता में मुक्तिबोध ने लिखा है-
‘आदमी की दर्द-भरी गहरी पुकार सुन
पड़ता है दौड़ जो
आदमी है वह खूब
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
बूढ़ी मां के झुर्रीदार
चेहरे पर छाये हुए
आंखों में डूबे हुए
जिंदगी के तजुर्बात
बोलते हैं एक साथ
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी’
पड़ता है दौड़ जो
आदमी है वह खूब
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
बूढ़ी मां के झुर्रीदार
चेहरे पर छाये हुए
आंखों में डूबे हुए
जिंदगी के तजुर्बात
बोलते हैं एक साथ
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी’
लेकिन ‘सरकार’ के लिए उनमें और दूसरे आदमियों में फर्क है। यही फर्क
भाजपा के नेताओं को अंदर-अंदर साल रहा है। घर वापसी के पोस्टर लगवाने में खुद संजय
जोशी का हाथ भले ना हो, लेकिन भाजपा में दूसरे दर्जे के नेता बना दिए गए नेताओं का
दर्द जरूर घुला-मिला है। ‘सरकार’ के लिए खतरा यही है कि यदि किसी नेता के खिलाफ कार्रवाई
हुई तो ‘सरकार’ के प्रति एकजुट खड़ी दिख रही पार्टी की दरार
भी सामने आ जाएगी। इसलिए ऐसे पोस्टर लगते रहेंगे, जब तक कि ‘सरकार’ का
बनाया इंद्रजाल इतना कमजोर ना हो जाए कि उसे तोड़ना आसान हो।



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उम्दा राजनीतिक समझ
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