किस इंतजार में हैं कॉमरेड?
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीआई (एम) या माकपा को आपने आखिरी
बार सुर्खियों में कब देखा था? इसके कॉमरेड्स को आखिरी बार सड़कों पर कब देखा था? 2015 के चौथे महीने तक तो ऐसा नहीं हुआ। 2014 या 2013 में भी शायद ही ऐसा कोई वाकया याद आता हो, जब किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने से ज्यादा इस पार्टी के
नेताओं की कोई पूछ रही हो। इन दिनों 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ
सियासी माहौल गर्म है, लेकिन ‘गरीबों-मजदूरों
की पार्टी’ सीन से गायब
है। इस कानून के विरोध का नेतृत्व कांग्रेस के हाथों में है, जिसे मार्क्सवादी कॉमरेड कभी जमींदारों की पार्टी कहा करते
थे। चुनावी अखाड़े में मोदी की पार्टी से दो-दो हाथ करने के लिए जनता परिवार के पुराने
घटक दलों ने फिर से हाथ मिलाया है, लेकिन उस सीन में भी माकपा कहीं नहीं है। तो फिर माकपा है कहां?
पिछले कई दिनों से सीपीआई (एम) के कॉमरेड अपनी पार्टी कांग्रेस में व्यस्त थे।
विशाखापत्तनम में हुई पार्टी कांग्रेस में सारे कॉमरेड भविष्य की दिशा तय करने के लिए
जमा हुए थे। यहीं पार्टी का नया महासचिव भी चुना गया। सीपीआई (एम) अब सीताराम के कहे
पर चलेगी। सीताराम यानी सीताराम येचुरी। वे अच्छे वक्ता हैं। पढ़े-लिखे कॉमरेड हैं।
हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर उनकी पकड़ है। वे चुटीली टिप्पणियां करते हैं। संसद
में अच्छा बोलते हैं। लेकिन उनका पोलित ब्यूरो कैसा है? वही पुराने चेहरे, वही पुराने थके-हारे कॉमरेड, जो पिछले कई दशकों से पार्टी चला रहे हैं। वही आगे भी
सीपीआई (एम) को चलाएंगे? पोलित ब्यूरो में चार सदस्यों- हानन मुल्ला (69), मोहम्मद सलीम (58),
सुभासिनी अली (67) और जी रामकृष्णन (65) को पहली बार मौका मिला है। लेकिन इनमें से
कोई भी जमीनी लडा़ई में जनता के बीच उतरकर जनाधार बढ़ाने वाला नेता नहीं है।
पोलित ब्यूरो के नए-पुराने चेहरों को देखने से साफ हो जाता है कि आने वाले
दिनों में भी यह पार्टी कोई आंदोलन खड़ा नहीं करने जा रही। विशाखापत्तनम में
पार्टी महासचिव का चुनाव भी आसानी से नहीं हो पाया। केरल के कॉमरेड किसी तेलूगु
कॉमरेड को कमान देने के हक में नहीं थे। उनका जोर 77 साल के रामचंद्रन पिल्लई को
महासचिव बनाने पर था। कुछ कॉमरेड तो महासचिव चुनने के लिए गुप्त मतदान भी कराना
चाहते थे, जबकि परंपरागत रूप से माकपा महासचिव का चुनाव आम सहमति से ही होता रहा
है।
खैर, किसी तरह सीताराम चुन लिए गए। माकपा के जनरल सेक्रेट्री चुने जाने के बाद
येचुरी ने जो पहला बयान दिया, उसमें उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी केंद्र सरकार की
जनता-विरोधी और मजदूर-विरोधी नीतियों का विरोध करेगी। इसके साथ ही सांप्रदायिकता
के खिलाफ भी लड़ती रहेगी। लेकिन कैसे? यह सब कैसे होगा? पार्टी का आगे का रोडमैप क्या होगा, इस बारे में सीपीआई
(एम) के नेता खामोश हैं।
यूपीए-1 सरकार में लाल सलाम वाली इस पार्टी का जलवा था। लोकसभा में इसके 50 से
ज्यादा सांसद थे और मनमोहन सिंह की सरकार कोई भी बड़ा फैसला इस पार्टी से पूछे
बिना नहीं करती थी। लेकिन 2008 में सरकार ने अमेरिका के साथ न्यूक्लिर डील क्या
की, कॉमरेड ने हंगामा खड़ा कर दिया। सरकार से समर्थन खींचने की जिद ठान ली और
समर्थन खींच भी लिया। लेकिन सरकार झुकी नहीं। उसने मुलायम सिंह यादव की समाजवादी
पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी को एक साथ साध लिया। सरकार बच गई और
2009 के चुनाव में कॉमरेड को मुंह की खानी पड़ी। 2011 में इस पार्टी का अभेद्य
दुर्ग यानी पश्चिम बंगाल ममता के हाथों में चला गया।
ममता ने राइटर्स बिल्डिंग पर ही कब्जा नहीं किया, बल्कि पश्चिम बंगाल में इस
पार्टी के ढांचे का भी तृणमूलीकरण कर दिया। जमीनी स्तर पर माकपा के लिए काम करने
वाले काडर अब तृणमूल के लिए काम करते हैं। 2011 के बाद से पश्चिम बंगाल में जितने
भी चुनाव हुए हैं, उनमें माकपा कभी तृणमूल को टक्कर भी नहीं दे पाई। पश्चिम बंगाल
के हालिया निकाय चुनावों में माकपा के कार्यकर्ताओं की पिटाई हुई, लेकिन कॉमरेड उसकी
निंदा करने की स्थिति में भी नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में इस पार्टी का काडर बेस
छीज चुका है, इसलिए सड़क पर उतरकर विरोध करने की सोची भी नहीं जा रही। क्या यह
हैरान करने वाली बात नहीं है कि जिस न्यूक्लियर डील के चलते माकपा ने मनमोहन सरकार
से समर्थन वापस खींच लिया था, उस तरह की दो डील मोदी सरकार ने भी कर ली है। एक
फ्रांस के साथ और दूसरे कनाडा के साथ। मगर माकपा की कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दिखी।
माकपा इतनी बेजार, इतनी लाचार कभी नहीं रही। 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट
पार्टी (सीपीआई) से अलग होने के समय भी इस पार्टी का जनाधार आज से कहीं ज्यादा था।
विचारों के स्तर पर माकपा में हमेशा ही उत्तेजना का जोर रहा। दीवारों पर लाल
स्याही से लिखे इसके नारे पश्चिम बंगाल और केरल में ही नहीं, दिल्ली और मुंबई,
यहां तक कि बिहार में भी सियासी चर्चा का मुद्दा बन जाते थे। लेकिन आज इसके धुर
वामपंथी विचारों पर नक्सलवादियों का कब्जा हो चुका है और राजनीतिक सोच पर सियासत
की नासमझी हावी है। ऐसे में थके-हारे-वृद्ध कॉमरेडों के सहारे राजनीतिक परिवर्तन की
उम्मीद करना बेमानी है।
किसी भी राजनीतिक विचारधारा को जनता से खाद-पानी मिलता है। आम लोगों से जितना
ज्यादा संपर्क रहता है, पार्टी उतनी ही जीवंत रहती है। माकपा जनता से कटी हुई है,
इसीलिए उसकी जीवंतता खत्म हो रही है। ऐसे में पार्टी के लिए जरूरी है संवाद, सीधे
जनता से उसका संपर्क। ऐसे समय में जबकि दूसरी पार्टियां संचार के आधुनिक साधनों और
सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके नौजवानों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए मरी जा रही
हैं, माकपा उन सबसे दूर है। थके-हारे-वृद्ध कॉमरेड रातों-रात ट्विटर, फेसबुक और
गूगल प्लस का इस्तेमाल करने लगेंगे, ऐसी उम्मीद भी नहीं की जा सकती। लेकिन यह बात
समझ से परे है कि वे अपनी गतिविधियों को मीडिया से दूर क्यों रखते हैं? माकपा की पार्टी कांग्रेस को भी खबरों में जगह तभी मिली,
जब भाजपा के ‘राम’ से मुकाबले के लिए सीताराम के हाथों में कमान थमाए जाने की
खबर बाहर आई।



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