25 जनवरी 2015 को बराक ओबामा गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि बनकर भारत आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर उनकी अगवानी की। ओबामा को रिसीव करने वे खुद एयरपोर्ट पहुंचे और एअरफोर्स वन से उतरते ही ओबामा को गले लगा लिया। ओबामा के साथ गले लगने और उनकी पीठ थपथपाने की मोदी की तस्वीर कुछ ही मिनटों में वायरल हो गई। इंटरनेट ने उन तस्वीरों को होनोलूलू से लेकर मंगोलिया तक फैला दिया। लेकिन उस ‘ऐतिहासिक’ भरत-मिलाप से पहले भी कुछ हुआ था। उस वाकये को एएनआई के कैमरे ने पकड़ भी लिया, लेकिन उसे कहीं तवज्जो नहीं मिली।
हुआ यों कि ‘भरत मिलाप’ की तस्वीरों को कैद करने के लिए जो कैमरे लगे थे, उनके आगे एक ‘बाधा’ आकर खड़ी हो गई थी। दाल-भात में मूसलचंद की तरह एअरफोर्स वन की सीढ़ियों के ठीक सामने अमेरिकी राष्ट्रपति की कार ‘द बीस्ट’ आ खड़ी हुई थी। भारतीय प्रधानमंत्री ने वहां खड़े प्रोटोकॉल अधिकारी से उस कार को थोड़ा साइड में कराने को कहा (ताकि फोटो बढ़िया आए)। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात सीआईए एजेंट ने ‘बीस्ट’ को एक इंच भी खिसकाने से मना कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति को गले लगाने जा रहे प्रधानमंत्री की बात एक अदने से सिक्योरिटी एजेंट ने खारिज कर दी थी, इस बात की खीझ मोदीजी के चेहरे पर तब तक झलकती रही, जब तक ओबामा अपने वीवीआईपी प्लेन से बाहर नहीं आ गए।
दिल्ली एयरपोर्ट की जमीं पर ओबामा के कदम रखते ही प्रधानमंत्री मोदी लपककर उनसे मिले, लेकिन गले लगाने से पहले वो पिक्चर परफेक्ट होने का इंतजार करते रहे। ओबामा जब प्रोटोकॉल अधिकारियों से हाथ मिलाने के बाद अपनी कार की ओर बढ़ने जा रहे थे, तभी मोदी उनका हाथ पकड़कर ‘बीस्ट’ के आगे ले आए, जहां कैमरा और उनके बीच कोई बाधा नहीं थी। अब फ्रेम परफेक्ट था और मोदीजी ने बिना कोई देर किए ओबामा को गले लगा लिया। कैमरे को वो तस्वीर मिल गई, जिसका ‘इंतजार’ था।
हैदराबाद हाउस में मिस्टर प्राइम मिनिस्टर ने शामियाना लगाकर ओबामा के साथ चाय पर चर्चा की। मोदी और ओबामा के लिए हैदराबाद हाउस के लॉन में शामियाना लगाया गया था, जहां भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति को अपने हाथों से चाय सर्व की। ओबामा के साथ इसी वन-टू-वन मुलाकात के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मोदी के निजी संबंधों की गरमाहट की चर्चा होने लगी।
ओबामा से पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए थे, जिनका स्वागत सत्कार अहमदाबाद में साबरमती के किनारे हुआ था। मोदीजी ने ‘अपने गुजरात’ में जिनपिंग को झूला झुलाया। गांधी के साबरमती आश्रम में जिनपिंग को जिन-जिन गलियारों से गुजरना था और जिन-जिन कमरों में जाना था, वहां कैमरे लगे थे। जिनपिंग का चरखा चलाना और मोदी का उन्हें सूत कातना सिखाना सुर्खियों में छाता रहा और पीएम का सीना गर्व से चौड़ा होता रहा।
अभी हाल में मोदी फ्रांस गए तो राष्ट्रपति फ्रास्वां ओलांद के साथ उन्होंने नाव पर चर्चा की। सीन नदी की लहरों पर मोदीजी की नाव हिचकोलें खाती रही और वे चाय की चुस्कियों के साथ राफेल खरीद के पुराने सौदे को रद्द करके नई डील के बारे में बातें करते रहे। जर्मनी में चांसलर एंजेला मर्केल के साथ उन्होंने बालकनी में चर्चा कर ली। हनोवर मेस में मौका मिलते ही सरकारी कैमरामैन ने मेक इन इंडिया प्रोग्राम के लोगो के साथ मर्केल और मोदी की तस्वीर उतार ली और परफेक्ट पिक्चर मिलते ही पीएमओ के ट्विटर हैंडल ने उसे लक्ष्य तक पहुंचा दिया।
भारतीय प्रधानमंत्री जब जापान गए थे तो प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ मछलियों को भोजन कराने निकले थे। मौका मिला तो पीएम ने ड्रम भी बजा लिया था। ऑस्ट्रेलिया में प्रधानमंत्री टोनी एबॉट के साथ वे क्रिकेट वर्ल्ड कप की झलक लेने पहुंच गए थे। ये सारी तस्वीरें सबसे पहले खुद मोदीजी ने दुनिया को दिखाईं। लेकिन क्यों? जरा सोचिए अगर पीएम ने जिनपिंग को झूला ना झुलाया होता तो क्या चीन के साथ भारत के रिश्ते और खराब हो गए होते या झूला झुलाने से चीनी सैनिकों ने घुसपैठ बंद कर दी? अगर मोदी और ओबामा की चाय पर चर्चा शामियाने में ना होकर किसी कमरे में होती और मोदी वहीं चाय सर्व करते तो ओबामा के साथ उनके रिश्ते बिगड़ जाते? अगर फ्रांस में पीएम मोदी राष्ट्रपति ओलांद के साथ नाव पर चर्चा ना करते तो राफेल फाइटर खरीदने का सौदा ना होता?
शरीर की भाषा पढ़ने वाले दुनिया भर के विशेषज्ञ यह बात नोटिस कर चुके हैं कि जब भी कोई तस्वीर क्लिक होती है तो सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी को पता होता है कि कैमरे का फोकस कहां है और खुद कैमरा कहां है। पीएमओ के ट्विटर एकाउंट और फेसबुक पेज पर जो तस्वीरें जारी होतीं हैं, उनमें मोदी सीधे कैमरे की ओर देख रहे होते हैं।
भारत की जनता के बारे में कहा जाता है कि कि उसकी स्मृति क्षणिक है। पब्लिक को यह याद नहीं रहता कि ओबामा भारत आए तो देश को क्या हासिल हो गया या जिनपिंग आए थे तो चीन के साथ रिश्ते कितने बदल गए। मोदी के जापान और ऑस्ट्रेलिया दौरे का हासिल भी लोग भूल चुके हैं। प्रधानमंत्री के फ्रांस, जर्मनी और कनाडा के दौरे से भारत ने क्या पाया, ये भी लोग भूल जाएंगे। लेकिन तस्वीरों को भुलाना उतना आसान नहीं होता। तस्वीरें याद रहती हैं। वे इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। मोदी जी भी इतिहास रच रहे हैं। आने वाला वक्त क्या मोड़ लेगा, शायद कोई नहीं जानता। इतिहास मोदी का आकलन किस रूप में करेगा, यह भी अभी पता नहीं है। लेकिन ये तस्वीरें मोदी को अमर कर देंगी। कोशिश करके भी उन्हें भुलाना संभव नहीं होगा।







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