रविवार, 19 अप्रैल 2015

अन-वांटेड !

विचाराधीन... अर्थात् जिन पर विचार किया जा रहा है। शब्द व्यापक है, लेकिन इसका इस्तेमाल प्रायः दो संदर्भों में ही होता है। 'विचाराधीन' का सबसे ज्यादा इस्तेमाल उन योजनाओं या फाइलों के लिए होता है जिन्हें सरकार या सरकारी बाबू किसी ना किसी बहाने लटकाये रखते हैं। विचाराधीन मुकदमे भी होते हैं, जो कोर्ट में लटके रहते हैं। पूछने पर कहा जाता है कि अमुक चीज विचाराधीन है। 'विचाराधीन' शब्द का दूसरा इस्तेमाल उन कैदियों के लिए होता है जो जुर्म साबित हुए बिना जेल में सड़ते रहते हैं। हमारा संदर्भ दूसरे से है।
भारत की अलग-अलग जेलों में करीब पौने चार लाख कैदी बंद हैं, जिनमें से ढाई लाख से ज्यादा कैदी विचाराधीन हैं। इन विचाराधीनों में से कई तो 25-30 साल से जेलों में बंद हैं, क्योंकि उन पर कभी विचार हुआ ही नहीं। इनमें से ज्यादातर कैदी चोरी, बेटिकट यात्रा, नशे में ड्राइविंग या मारपीट जैसे मामूली आरोपों में पकड़े गए हैं। यदि वक्त पर उनके मामलों की सुनवाई हो जाती, उन पर विचार हो जाता तो वे अरसा पहले जेल से बाहर आ चुके होते। क्योंकि जिन आरोपों में उन्हें पकड़ा गया था, उनमें होने वाली अधिकतम सज़ा वे पहले ही जेल में काट चुके हैं।
सिद्धांततः भारतीय कानून कहता है कि किसी बेगुनाह को सज़ा नहीं होनी चाहिए, भले ही कितने ही मुजरिम सज़ा से बच जाएं। लेकिन हम सब जानते हैं कि देश के हर थाने, हर पुलिस चौकी में इसका मखौल उड़ता है। हर जेल में इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ती हैं। लोग 30-30 साल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में गुजार देते हैं और कई तो जेल में ही मर भी जाते हैं, लेकिन उनके मामले पर विचार नहीं हो पाता। ये पता नहीं चल पाता कि असल में उन्होंने कोई अपराध किया भी था या नहीं।


अब जरा मुंबई चलते हैं। यहां की एक अदालत में 13 साल पुराने हादसे का मुकदमा चल रहा है यानी कोर्ट में केस पर विचार चल रहा है। इस मुकदमे के आरोपी हैं सलमान खान। मुकदमे की चार्जशीट के मुताबिक 28 सितंबर 2002 को सलमान खान की टोयोटा लैंड क्रूजर कार सड़क से कूदकर फुटपाथ पर जा चढ़ी थी, जिसमें वहां सो रहे एक मजदूर की मौत हो गई थी और चार दूसरे मजदूर घायल हो गए थे। सलमान पर शराब पीकर लापरवाही से गाड़ी चलाने का केस दर्ज हुआ था। 11 साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद लोअर कोर्ट के जज को लगा कि मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, गैरइरादतन हत्या का है।


कोर्ट के आदेश पर मुकदमे की धाराएं बदल गईं और केस सेशन कोर्ट में पहुंच गया। सेशन कोर्ट में भी करीब दो साल से सुनवाई हो रही है। कई बार लगा कि अब तो फैसला आ ही जाएगा। सलमान खान के सिर पर लटक रहे खतरे और उनके जेल जाने की अटकलें शुरू हो गईं। हिसाबी लोगों ने ये गुणा-गणित भी कर लिया कि सलमान सलाखों के पीछे जाएंगे तो हिंदी सिनेमा को कितने सौ करोड़ का नुकसान होगा। लेकिन जिस दिन कोर्ट का फैसला आना था, उसी रोज से सच्चाई बाहर आ रही है।
सलमान खान के वकीलों ने कुछ गवाहों से जिरह ना हो पाने का कानूनी इक्का फेंका और फैसला टल गया। तब से अब तक हम ये जान चुके हैं कि हादसे की रात सलमान खान गाड़ी नहीं चला रहे थे, इसलिए उनके खिलाफ लापरवाही से गाड़ी चलाने का केस नहीं बनता। सलमान ने तो इतनी शराब भी नहीं पी थी कि होश खो बैठें, इसलिए शराब पीकर किसी की जान से खिलवाड़ करने का केस भी झूठा है। गाड़ी तो अशोक सिंह नाम का ड्राइवर चला रहा था और टायर फटने की वजह से गाड़ी सड़क किनारे एक दुकान से जा टकराई थी। यानी गलती ड्राइवर अशोक सिंह की भी नहीं है। तो जी, गलती तो उस टायर की है, जो फट गया था। और हां, वहां कोई फुटपाथ भी नहीं था। गवाहों ने किसी फुटपाथ की बात नहीं की है तो फुटपाथ कहां से आया। असल में चार्जशीट ही झूठी है। गाड़ी तो बस दुकान से टकराई थी। घायल होने वाले मजदूर कहां से आए, ये हमें नहीं पता।
13 साल तक चले मुकदमे में अभियोजन पक्ष की ओर से 27 गवाह पेश किए गए थे, जिन्होंने अपनी आंखों से वो हादसा देखा था, जिन्होंने एक मजदूर को मरते देखा था, सलमान को लड़खड़ाते हुए ड्राइविंग सीट से उतरते देखा था और उन्हें हादसे की जगह से भागते हुए देखा था। 13 साल तक ये मुकदमा हिट एंड रन केस ही कहलाता रहा। लेकिन झूठ! सब झूठ था!


सलमान 'भाई' के वकील श्रीक्रांत शिवड़े ने सच्चाई बता दी है। सलमान ड्राइविंग सीट से इसलिए उतरे थे क्योंकि उनकी तरफ का दरवाजा जाम हो गया था और लड़खड़ा इसलिए रहे थे क्योंकि हादसा देखकर उनका मासूम मन विचलित हो गया था। जहां तक भागने की बात है तो वे अपनी जान बचाने के लिए भागे थे, क्योंकि 50-60 लोगों की भीड़ लाठी-डंडों से लैस होकर सलमान खान को घेर चुकी थी और उनके लिए जान की हिफाजत करना जरूरी था। सबसे बड़ी बात ये कि मजदूर की मौत तो सलमान की लैंड क्रूजर से हुई ही नहीं। वह तो उस क्रेन की गलती से मारा गया था, जो सलमान की गाड़ी को उठाने के लिए वहां बुलाया गया था। क्रेन के ड्राइवर की गलती से सलमान की लैंड क्रूजर कार हवा से जमीन पर आ गिरी थी, जिससे दबकर एक बेचारे मजदूर की मौत हो गई।

13 साल तक ये सच्चाई सामने नहीं आई तो क्या हुआ। अब तो सच्चाई सामने है। किसी बेगुनाह को सज़ा कैसे दी जा सकती है? किसी हिंदी फिल्म के स्क्रिप्ट की तर्ज पर आज कोर्ट का आखिरी सीन रिकॉर्ड होने वाला है। कल फैसले की घड़ी है। सवाल है कि क्या कोर्ट का फैसला भी स्क्रिप्ट के हिसाब से होगा? क्या बेगुनाह सलमान को सज़ा मिलेगी? या असल गुनहगार टायर को तलाशा जाएगा?

1 टिप्पणी:

सुबोध ने कहा…

फुटपाथ पर सोने वाले ने खुदकुशी की थी अब यही सच सामने आना बचा है