किसानों की जमीन
के बहाने अपनी सियासी जमीन पुख्ता करने का मंच सजा हुआ था। ‘आप’ के नेता किसानों की बदहाली पर तकरीरें दे रहे थे। मंच से चंद कदमों की दूरी
पर खड़े नीम के पेड़ पर गजेंद्र सिंह एक हाथ में झाड़ू और दूसरे हाथ में अपने गले
का अंगोछा लेकर खुदकुशी की तैयारी में थे। दौसा से आए गजेंद्र अपना सुसाइड नोट
नीचे फेंक चुके थे जो आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के हाथों से होता हुआ मंच तक
पहुंच चुका था। मंच पर ‘आप’ के आशुकवि
नेता कुमार विश्वास हाथों में माइक थामे हुए थे।
कुमार पूरे विश्वास से कह रहे थे, ‘देश का अन्नदाता संकट में है। जो भी हमारा साथी पेड़ पर चढ़ गया है, उससे ये कहना है कि वो नीचे आ जाए। वो अगर नीचे आ जाएगा तो ज्यादा बेहतर होगा। मंच पर आ जाए। आपसे मुख्यमंत्री मिल लेंगे। उपमुख्यमंत्री मिल लेंगे। मैं संगठन के लोगों से कहता हूं। हां... आ गया कि नहीं... पुलिस के साथियो से अनुरोध है उनसे अनुरोध करें कि वो नीचे आ जाए। वो ऐसा कोई काम ना करे जिससे बात खराब हो। वो मंच पर आ सकते हैं। अपनी बात कह सकते हैं। उप मुख्यमंत्री यहां पर हैं। उप मुख्यमंत्री यहां पर हैं। वो कृपापूर्वक नीचे आ जाएं।’
कुमार पूरे विश्वास से कह रहे थे, ‘देश का अन्नदाता संकट में है। जो भी हमारा साथी पेड़ पर चढ़ गया है, उससे ये कहना है कि वो नीचे आ जाए। वो अगर नीचे आ जाएगा तो ज्यादा बेहतर होगा। मंच पर आ जाए। आपसे मुख्यमंत्री मिल लेंगे। उपमुख्यमंत्री मिल लेंगे। मैं संगठन के लोगों से कहता हूं। हां... आ गया कि नहीं... पुलिस के साथियो से अनुरोध है उनसे अनुरोध करें कि वो नीचे आ जाए। वो ऐसा कोई काम ना करे जिससे बात खराब हो। वो मंच पर आ सकते हैं। अपनी बात कह सकते हैं। उप मुख्यमंत्री यहां पर हैं। उप मुख्यमंत्री यहां पर हैं। वो कृपापूर्वक नीचे आ जाएं।’
मंच के नीचे ‘केजरीवाल जिंदाबाद... जिंदाबाद जिंदाबाद’ के नारे गूंज रहे थे। ‘आप’ के कुछ कार्यकर्ता नीम के पेड़ से लेकर मंच तक दौड़-भाग कर रहे थे और हालात
का ब्योरा अपने नेताओं तक पहुंचा रहे थे। तभी किसी कार्यकर्ता ने खबर दी कि उसने
तो फंदा लगा लिया। ‘हं...लटक गया! मर गया?’ कुमार विश्वास ने यह इशारों में पूछा था। उनके मुंह से कोई शब्द नहीं निकला,
लेकिन मंच की ओर लगे कैमरों ने सब पकड़ लिया। गर्दन की ओर उठते हाथों ने कुमार
विश्वास के इरादों की चुगली कर दी।
दौसा के गजेंद्र
की मौत की खबर दिल्ली के नेताओं को मिल चुकी थी। किसान की मौत के बावजूद किसान
रैली जारी रही। लेकिन बोल बदल गए। माइक अब भी कुमार विश्वास के हाथों में ही था। अब
वे कह रहे थे, ‘जो भी
प्रशासन-शासन के लोग उनकी सहायता कर सकते हों, वो तुरंत उसे नीचे लेकर आएं और
किसानों के हित की इस लड़ाई को दागदार ना होने दें। इसको बदनुमा ना होने दें। और
पुलिस यहां पर थी। जब पुलिस को सूचना है तो दिल्ली पुलिस क्या कर रही है? इसका मतलब क्या है? यह योजनाबद्ध तरीके से काम हो रहा है? क्या यह योजनाबद्ध तरीके से काम हो रहा है? किसानों के हित की बात को दबाने के लिए, आम आदमी पार्टी को
बदनाम करने के लिए। पिछले दो महीने से केंद्र की सरकार परेशान है कि किसी प्रकार
से अरविंद केजरीवाल की सरकार को बदनाम किया जा सके। हम सबसे बात करने के लिए तैयार
हैं। हम लगातार संवाद करने के लिए तैयार हैं। कृपापूर्वक आप कोई ऐसी बात ना करें।
जो भी हमारा साथी हो, उसको नीचे लेकर आएं।’
अब तक मंच पर
चुपचाप बैठे अरविंद केजरीवाल भी अब निर्देश देने लगे थे। वे इशारा कर रहे थे और
कुमार विश्वास उनके इशारों पर बोले जा रहे थे, ‘पुलिस ऊपर चढ़े और उस साथी को मनाकर नीचे लेकर आएं। पुलिस
के जो साथी हैं, वे उसको लेकर आएं नीचे... और पुलिस की प्रेजेंस में अगर वह ऊपर
गया है तो पुलिस इस बात का जवाब दे कि आपके सामने ऐसा क्यों हुआ।’ पार्टी के कार्यकर्ता मंच तक लगातार संदेश पहुंचा रहे थे
और विश्वास कहे जा रहे थे, ‘पुलिस वहां पर है, नीचे बैठी है। इसका मतलब क्या आप योजनापूर्वक यह काम कर रहे
हैं? आप किसानों की
लाशों पर खेलते हैं। हिंदुस्तान की लाशों पर खेलते हैं आप। दिल्ली पुलिस से हमारा
अनुरोध है कि वह कृपापू्र्वक ऐसे काम न करे।’
गजेंद्र सिंह के
फांसी के फंदे पर झूल जाने के बाद भी 72 मिनट तक आम आदमी पार्टी की रैली चलती रही।
केजरीवाल ‘किसानों के
हक’ के लिए केंद्र
सरकार पर हमला बोलते रहे। गजेंद्र के लटक जाने, उनके मर जाने का पता तो पहले ही चल
चुका था, लेकिन रैली खराब ना हो इसके लिए उनकी मौत की खबर को दबाकर रखा गया। पेड़
से उतारकर जो चीज राम मनोहर लोहिया अस्पताल भेजी गई, वह सिर्फ लाश थी। गजेंद्र तो
पहले ही सियासत की भेंट चढ़ चुके थे। अब आरोपों और प्रति-आरोपों का सिलसिला चलेगा।
कल रात नेताओं को नींद आई। जी नहीं, गजेंद्र ने उनकी नींद नहीं छीनी। वे तो सुबह की सियासत की तैयारियां
करते रहे।


2 टिप्पणियां:
कुमार विश्वास को आशुकवि कहना ग़लत है...वो तो मंझा हुआ कवि है...आशुकवि, यानी taking baby steps
आंखोंदेखा हाल
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