यह तस्वीर
किसी परिचय या कैप्शन की मोहताज नहीं। इस तस्वीर को आप कई अखबारों के पहले पन्ने
पर देख चुके हैं। हिंदी के हों या अंग्रेजी के, लगभग सभी संपादकों ने
हजारों तस्वीरों में से इस एक तस्वीर को ढूंढ़ निकाला। भूकंप के असर से धराशायी हुई
इमारतों, मलबे में दबे इंसानी शरीरों, राहत
और बचाव के काम में लगे देवदूतों और घर वापस आने के लिए हवाई अड्डे पर इंतजार करते
लोगों की तस्वीरें इसके आगे फीकी पड़ गईं। नेपाल की राजशाही के प्रतीक दरबार हॉल
और नेपाल के कुतुब मीनार कहे जाने वाले भीमसेन टॉवर के भग्नावशेष भी इस तस्वीर के
आगे कहीं नहीं टिके। इस तस्वीर को खींचने के लिए कोई फ्रेम नहीं बनाया गया होगा।
फोटोग्राफर ने 'स्माइल' नहीं बोला
होगा। फिर भी इसमें जिंदगी झलक आई। इस तस्वीर में उम्मीद है। इसमें भविष्य है।
क्या आपने
8 महीने की इस बच्ची की आंखें देखी हैं? उसे नहीं पता कि उसके
देश में क्या हुआ है? भूकंप ने कितने लोगों की जिंदगी छीन ली
है? वो तो अपने पापा के लिए रो रही थी। ऐसा कभी नहीं हुआ कि
उसके पापा उससे इतनी देर तक दूर रहे हों। लेकिन 25 और 26 तारीख को वे चौबीस घंटे
से भी ज्यादा समय तक उसके सामने नहीं आए। वो नहीं जानती कि उसके पापा ईंट और
पत्थरों के नीचे दब गए थे। उनकी अपनी छत उनके लिए कब्र बनने वाली थी। इस बच्ची के
लिए धरती का डोलना 'खबर' नहीं थी। उसके
लिए तो उसके आकाश यानी पापा का दूर चले जाना ही सबसे बड़ा सदमा था। मगर उसके पापा
लौट आए, मौत को मात देकर, करीब 24 घंटे
तक मलबे में दबे रहकर। पिता ने बेटी को देखा तो उनके लिए धरती स्थिर हो गई। बेटी ने पापा को देखा तो उसे आकाश मिल गया।
पापा को देखकर बेटी की आंखें चमक आईं और बिटिया
को देखकर पापा की आंखों से आंसू छलक आए। कोई गिला नहीं, कोई शिकायत नहीं। शिकायत उस
ऊपर वाले से भी नहीं, जिसने पल भर में इनकी दुनिया बदलने का इंतजाम कर दिया था और पल
भर में सारी खुशियां इनकी झोली में उड़ेल दीं। पिता के सिर पर अब भी पट्टी बंधी है
और कलाई की धमनियों में ड्रिप लगा हुआ है, लेकिन उसकी परवाह किसे है। इनके लिए दुनिया
फिर से आबाद हो गई है। भूकंप के दर्द से नेपाल बरसों तक कराहता रहेगा। लेकिन ये तस्वीर
उसे हौसला देगी। हौसला इस बात का कि भविष्य सुरक्षित है। हौसला इस बात का भी कि भविष्य
के बीज को सुरक्षित रखने वाले हाथ भी महफूज हैं। 
2 टिप्पणियां:
सो इमोशनल सर
मानवता का ही एक पहलू
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